RBSE Class 10th 2010 Hindi-S-01-2010 Previous Year Papers
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 10th |
| Exam year | 2010 |
| Subject | Hindi-S-01-2010 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 10th 2010 Hindi-S-01-2010
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Rajasthan Board Class 10th Hindi-S-01-2010 2010 solved Previous Year Question Papers
माध्यमिक परीक्षा, 2010
हिन्दी (HINDI)
समय : 3 घण्टे 15 मिनट पूर्णांक : 80
नामांक : ___________ Roll No. : ___________
No. of Questions — 30 S—01—Hindi No. of Printed Pages — 7
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न हल करने अनिवार्य हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिस प्रश्न के एक से अधिक समान अंकवाले भाग हैं, उन सभी भागों का हल एक साथ सतत् लिखें।
- प्रश्न क्रमांक 2 व 3 अति लघु उत्तरात्मक हैं।
- प्रश्न क्रमांक 1 के चार भाग (i, ii, iii तथा iv) हैं। प्रत्येक भाग के उत्तर के चार विकल्प (क, ख, ग एवं घ) हैं। सही विकल्प का उत्तराक्षर उत्तर-पुस्तिका में निम्नानुसार तालिका बनाकर लिखें :
| प्रश्न क्रमांक | सही उत्तर का क्रमाक्षर |
|---|---|
| 1. (i) | |
| 1. (ii) | |
| 1. (iii) | |
| 1. (iv) |
[ 5—07 ] [ Turn over ]
प्रश्न 1 (i)
सन्त जम्भेश्वर जी के अनुयायियों ने प्रकृति की रक्षा हेतु जहाँ बलिदान दिया, वह है
- नायासर
- पीपासर
- लालसर
- खेजड़ली
व्याख्या: सन्त जम्भेश्वर जी के अनुयायियों (बिश्नोई समाज) ने खेजड़ली गाँव में वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था।
प्रश्न 1 (ii)
“नींव की ईंट” निबन्ध के अनुसार समाज की आधारशिला है
- सतत जनसम्पर्क
- अथक जनजागरण
- मौन-मूक शहादत
- अथक समाज सेवा
व्याख्या: निबन्ध के अनुसार समाज की नींव मौन-मूक शहादत (बिना किसी प्रचार के किया गया बलिदान) है, जो समाज को मजबूत बनाती है।
प्रश्न 1 (iii)
“देख वीर बालक के इस औद्धत्य को, लगी गरजने भरी सिंहिनी क्रोध में”
उपर्युक्त पंक्तियों में 'वीर बालक' प्रयुक्त हुआ है
- राम के लिए
- भरत के लिए
- लक्ष्मण के लिए
- अर्जुन के लिए
व्याख्या: ये पंक्तियाँ लक्ष्मण के साहस और उद्दण्डता का वर्णन करती हैं, जब उन्होंने सीता हरण के समय रावण को ललकारा था।
प्रश्न 1 (iv)
“उनके बच्चे हों अथवा हों मछलियाँ, कभी नहीं उनको कलपाना चाहिये”
उपर्युक्त कथन में सीता का भाव व्यक्त हुआ है
- क्षमा-भाव
- प्रेम-भाव
- उपेक्षा-भाव
- दया-भाव
व्याख्या: सीता का यह कथन सभी प्राणियों (बच्चों और मछलियों) के प्रति दया और करुणा का भाव दर्शाता है, कि किसी को भी दुःख नहीं देना चाहिए।
प्रश्न 1: “उज्ज्वल” शब्द का संधि-विच्छेद कीजिए।
उत्तर: “उज्ज्वल” शब्द का संधि-विच्छेद है: उत् + ज्वल। यहाँ ‘त्’ का ‘ज्’ में परिवर्तन हुआ है, जो व्यंजन संधि का उदाहरण है।
प्रश्न 2: कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की दो काव्य-कृतियों के नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर: कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की दो प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं:
- प्रियप्रवास
- वैदेही-वनवास
प्रश्न 3: “पर ये थोड़े-से मनुष्य ही हैं, जो संसार को हिला देते हैं।” लेखक किन थोड़े से मनुष्यों की ओर संकेत करता है? 'लक्ष्यवेध' पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए।
उत्तर: 'लक्ष्यवेध' पाठ के अनुसार, लेखक उन थोड़े-से मनुष्यों की ओर संकेत करता है जो अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पित होते हैं, कठिनाइयों से नहीं डरते, और अपने दृढ़ संकल्प से संसार को बदलने की क्षमता रखते हैं। ये वे लोग हैं जो अपने प्रयासों से इतिहास रचते हैं।
प्रश्न 4: निम्नलिखित सामासिक पदों का विग्रह कर उनमें निहित समास का नाम लिखिए:
- सुहासिनी – विग्रह: सुन्दर हासिनी (सुन्दर हास्य वाली) – समास: कर्मधारय समास
- राजमाता – विग्रह: राजा की माता – समास: षष्ठी तत्पुरुष समास
प्रश्न 5: संज्ञा पद के पद-परिचय हेतु कोई चार बिन्दु लिखिए।
उत्तर: संज्ञा पद के पद-परिचय हेतु चार बिन्दु निम्नलिखित हैं:
- पद का प्रकार (जातिवाचक, व्यक्तिवाचक, भाववाचक, द्रव्यवाचक)
- लिंग (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग)
- वचन (एकवचन, बहुवचन)
- कारक (कर्ता, कर्म, करण, आदि)
प्रश्न 6: “यह पुस्तक मेरे छोटे भाई ने भेजी थी।” उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित पदों के पद-परिचय से सम्बन्धित दो-दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर: रेखांकित पद “पुस्तक” और “भाई” हैं।
- पुस्तक: (i) जातिवाचक संज्ञा, (ii) स्त्रीलिंग, एकवचन, कर्म कारक
- भाई: (i) जातिवाचक संज्ञा, (ii) पुल्लिंग, एकवचन, कर्ता कारक
प्रश्न 7: “जो परिश्रम करते हैं वे सफल होते हैं।” उपर्युक्त वाक्य रचना के आधार पर किस प्रकार का वाक्य है? उसकी परिभाषा लिखिए।
उत्तर: यह वाक्य संयुक्त वाक्य है।
परिभाषा: जिस वाक्य में दो या दो से अधिक स्वतंत्र उपवाक्य किसी समुच्चयबोधक अव्यय (जैसे- और, या, पर, इसलिए) से जुड़े हों, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं। यहाँ “जो परिश्रम करते हैं” और “वे सफल होते हैं” दो स्वतंत्र उपवाक्य हैं जो अर्थ से जुड़े हैं।
प्रश्न 8: “मन्त्री-मण्डल की गठन आज होगा।” उपर्युक्त वाक्य को शुद्ध कर पुनः लिखिए।
उत्तर: शुद्ध वाक्य: मन्त्री-मण्डल का गठन आज होगा।
(यहाँ ‘की’ के स्थान पर ‘का’ का प्रयोग उचित है क्योंकि ‘गठन’ पुल्लिंग है।)
प्रश्न 9: “तरणि” तथा “अनल” शब्दों का अर्थ-भेद स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
- तरणि: इसका अर्थ है ‘सूर्य’ या ‘नाव’।
- अनल: इसका अर्थ है ‘अग्नि’।
इन दोनों शब्दों के अर्थ में भिन्नता है – तरणि का सम्बन्ध प्रकाश या जलयान से है, जबकि अनल का सम्बन्ध आग से।
प्रश्न 10: “माता-पिता का सन्तान के प्रति प्रेम” का अर्थद्योतक एक शब्द लिखिए।
उत्तर: वात्सल्य
प्रश्न 11: “जिसकी लाठी उसकी भैंस” लोकोक्ति का आशय लिखिए।
उत्तर: इस लोकोक्ति का आशय है कि जिसके पास शक्ति या अधिकार होता है, वही नियम बनाता है और उसी का वर्चस्व होता है। यह बल या प्रभाव की प्रधानता को दर्शाता है।
प्रश्न 12: “थोथी कल्पना करना” का अर्थद्योतक मुहावरा लिखिए।
उत्तर: हवाई किले बनाना
प्रश्न 13: शब्द-शक्ति किसे कहते हैं? इसके प्रकारों का नामोल्लेख कीजिए।
उत्तर: शब्द-शक्ति किसी शब्द के अर्थ को प्रकट करने की क्षमता को कहते हैं। इसके तीन प्रकार हैं:
- अभिधा शक्ति (सीधा अर्थ)
- लक्षणा शक्ति (लक्षित अर्थ)
- व्यंजना शक्ति (व्यंग्यार्थ)
प्रश्न 14: “बन्दा बैरागी से भेंट” कविता के मूल प्रतिपाद्य को लगभग 35 शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस कविता का मूल प्रतिपाद्य यह है कि सच्चा बैरागी वही है जो संसार के मोह-माया से दूर रहकर ईश्वर की भक्ति में लीन रहता है। कविता में बैरागी और सांसारिक व्यक्ति के भेद को दर्शाते हुए आध्यात्मिक ज्ञान और वैराग्य के महत्व पर बल दिया गया है।
प्रश्न 15: “किन्तु जग के पंथ पर यदि, स्वर्ण दो तो सत्य दो” – उपर्युक्त कवितांश में निहित भावार्थ स्पष्ट कीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 35 शब्द)
उत्तर: इस कवितांश का भावार्थ है कि संसार के मार्ग पर चलते हुए यदि किसी को धन (स्वर्ण) और सत्य में से एक चुनना हो, तो उसे सत्य का चयन करना चाहिए। सत्य ही सर्वोपरि है, जो मनुष्य को सही मार्ग दिखाता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है।
20.
कवि हरिवंश राय ‘बच्चन’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय लगभग 35 शब्दों में लिखिए।
हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे। उनका जन्म 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद में हुआ। वे ‘मधुशाला’ जैसी कालजयी रचनाओं के लिए जाने जाते हैं। उनकी कविता में जीवन और दर्शन का गहरा चित्रण मिलता है।
21.
“अगर मुझे मालूम होता कि मेरी कश्मीर-यात्रा इतनी महँगी पड़ेगी, तो उधर जाने का नाम न लेता।” “प्रेरणा” कहानी के आधार पर सूर्य प्रकाश के उक्त कथन का कारण लिखिए। (उत्तर सीमा लगभग 25 शब्द)
सूर्य प्रकाश को कश्मीर यात्रा के दौरान अपनी पत्नी की बीमारी और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा, जिससे यात्रा बहुत महँगी साबित हुई।
22.
“मारो, देखूँ, कैसे मारती हो? मुझे वह बहू न समझ लेना जो सास की मार चुपचाप सह लेती है।” उपर्युक्त कथन किसने, किससे और कब कहा? (उत्तर सीमा लगभग 20 शब्द)
यह कथन ‘माता का अंचल’ पाठ में भोलानाथ ने अपनी माँ से तब कहा जब माँ उसे डांट रही थी।
23.
रामचरण द्वारा अपनी कॉपी पर लिखे गये आप्त वाक्य से कौन-सा सत्य उद्घाटित हुआ? (उत्तर सीमा लगभग 25 शब्द)
रामचरण की कॉपी पर लिखे आप्त वाक्य से यह सत्य उद्घाटित हुआ कि वह स्वयं को बड़ा और दूसरों को छोटा समझता था, जो उसके अहंकार को दर्शाता है।
24.
‘शिवाजी का सच्चा स्वरूप’ एकांकी में निहित उद्देश्य को लगभग 60 शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
इस एकांकी का उद्देश्य शिवाजी के सच्चे स्वरूप को उजागर करना है। इसमें दिखाया गया है कि शिवाजी एक न्यायप्रिय, धर्मनिष्ठ और दयालु शासक थे। वे अपने राज्य की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते थे और उनमें देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी।
25.
“प्रकृतिदत्त श्वान-गुणों का उसमें सर्वथा अभाव है।” उक्त पंक्ति का आशय ‘नीलू’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए। (उत्तर सीमा लगभग 35 शब्द)
इस पंक्ति का आशय है कि नीलू कुत्ता होते हुए भी उसमें कुत्तों के स्वाभाविक गुण जैसे भौंकना, काटना या आक्रामकता नहीं थे। वह बिल्कुल शांत और मिलनसार था।
26.
महाराज दाहर सेन के चरित्र की चार विशेषताओं को लगभग 35 शब्दों में लिखिए।
महाराज दाहर सेन के चरित्र की चार विशेषताएँ हैं: (1) वे न्यायप्रिय थे, (2) दयालु और परोपकारी, (3) साहसी और वीर, तथा (4) अपनी प्रजा के प्रति समर्पित शासक थे।
27.
‘15 अगस्त’ शीर्षक कविता के माध्यम से कवि देश के नव-युवकों को क्या संदेश देना चाहते हैं? (उत्तर सीमा लगभग 80 शब्द)
‘15 अगस्त’ कविता में कवि देश के नव-युवकों को संदेश देते हैं कि वे देश की आजादी के महत्व को समझें और उसे बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहें। कवि युवाओं से आह्वान करते हैं कि वे देश की उन्नति के लिए कार्य करें, एकता बनाए रखें और राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें। उन्हें आलस्य और नकारात्मकता से दूर रहकर देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
28.
‘झाँसी की रानी की समाधि’ कविता का मूल भाव लगभग 80 शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
‘झाँसी की रानी की समाधि’ कविता का मूल भाव रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान और वीरता की गाथा है। कवि ने इस कविता में रानी के साहस, देशभक्ति और अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष को चित्रित किया है। कविता में यह भाव व्यक्त किया गया है कि रानी की समाधि आज भी हमें उनके अदम्य साहस और स्वतंत्रता के लिए किए गए बलिदान की याद दिलाती है। यह कविता राष्ट्रप्रेम और शौर्य की प्रेरणा देती है।
23. निम्नलिखित अवतरण का संक्षेपण लगभग एक-तिहाई शब्दों में कीजिए :
जीवन का उद्देश्य आनंद है, जो मनुष्य को रत्न, द्रव्य, परिवार, भवन या ऐश्वर्य में मिलता है। किंतु साहित्य का आनंद इनसे ऊँचा और पवित्र है, क्योंकि वह सुंदर और सत्य पर आधारित है। साहित्य का उद्देश्य इसी आनंद को दर्शाना और उत्पन्न करना है, जबकि ऐश्वर्य या भोग के आनंद में ग्लानि छिपी होती है।
24. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों का नाम लिखते हुए उनके लक्षण लिखिए :
-
पंक्ति: “माला फेरत जुग भया, फिरा न मनका फेर ।
कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ॥”अलंकार: श्लेष अलंकार
लक्षण: जहाँ एक ही शब्द के अनेक अर्थ हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। यहाँ 'मनका' शब्द के दो अर्थ हैं – (1) माला का मनका (कर का मनका) और (2) मन का मनका (मन की वृत्ति)।
-
पंक्ति: “हँसने लगे तब हरि अहा ! पूर्णेन्दु सा मुख खिल गया ।”
अलंकार: उपमा अलंकार
लक्षण: जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति की तुलना किसी दूसरी वस्तु या व्यक्ति से की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है। यहाँ हरि के मुख की तुलना पूर्ण चंद्रमा (पूर्णेन्दु) से की गई है।
25. निम्नलिखित पद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर पूछे गये प्रश्नों का उत्तर दीजिए :
कुछ काम करो, कुछ काम करो;
जग में रह कर निज नाम करो ।
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो,
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो ।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को,
नर हो, न निराश करो मन को ।
-
उपर्युक्त पद्यांश का उचित शीर्षक लिखिए :
शीर्षक: कर्म का महत्व / नर हो, न निराश करो मन को
-
कवि किसे व्यर्थ नहीं करने देना चाहता ?
कवि इस जन्म (मानव जीवन) को व्यर्थ नहीं करने देना चाहता।
-
मनुष्य को अपने मन में कौन-सी भावना नहीं लानी चाहिए ?
मनुष्य को अपने मन में निराशा की भावना नहीं लानी चाहिए।
-
उपर्युक्त पद्यांश का भावार्थ लिखिए :
इस पद्यांश में कवि मनुष्य को प्रेरित करता है कि वह संसार में रहकर कुछ ऐसा कार्य करे जिससे उसका नाम अमर हो जाए। मानव जीवन बहुमूल्य है, इसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। अपने शरीर का सदुपयोग करना चाहिए और मन में कभी निराशा नहीं लानी चाहिए। मनुष्य को सदैव कर्मशील और आशावान रहना चाहिए।
26. अपने आपको राघव वुन्देला, भावनगर निवासी मानते हुए अपने मित्र भरत कुमार, वीरपुर निवासी को अपने परिवार में होने वाले दुर्गा-पूजा समारोह का वर्णन करते हुए उसमें भाग लेने हेतु निमन्त्रण पत्र लिखिए | (उत्तर सीमा लगभग 100 शब्द)
प्रिय मित्र भरत कुमार,
सप्रेम नमस्ते।
आशा है तुम सकुशल होगे। यहाँ भावनगर में हमारे परिवार में इस वर्ष दुर्गा-पूजा का भव्य आयोजन किया जा रहा है। पूजा का आरंभ 10 अक्टूबर से होगा और 13 अक्टूबर को विसर्जन होगा। इस अवसर पर पंडाल सजाया गया है, भजन-कीर्तन का आयोजन है, और प्रसाद वितरण भी होगा। मैं चाहता हूँ कि तुम इस समारोह में अवश्य शामिल होओ। तुम्हारे आने से हमारी खुशी दोगुनी हो जाएगी। कृपया अपनी सहमति जल्द भेजो।
तुम्हारा मित्र,
राघव वुन्देला
भावनगर
27. “इसमें संदेह नहीं कि गाँव आज जैसा है, वैसा ही यदि रहता है तो नगरीकरण की प्रवृत्ति रोकी नहीं जा सकती ।” “ग्राम विकास की अवधारणा” निबन्ध के आधार पर उक्त कथन का आशय लगभग 100 शब्दों में स्पष्ट कीजिए ।
इस कथन का आशय यह है कि यदि गाँव अपनी वर्तमान स्थिति में ही बने रहेंगे, तो लोगों का शहरों की ओर पलायन रुकेगा नहीं। गाँवों में बुनियादी सुविधाओं (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली आदि) का अभाव है, जिसके कारण लोग बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर जाते हैं। नगरीकरण को रोकने के लिए ग्रामीण विकास आवश्यक है। गाँवों को आत्मनिर्भर बनाना होगा, जिससे लोगों को शहर जाने की आवश्यकता न रहे। इसलिए गाँवों का सर्वांगीण विकास किए बिना नगरीकरण की प्रवृत्ति को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
28. निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या लगभग 50 शब्दों में कीजिए :
गद्यांश: "मस्जिद का दरवाजा उतना ही पवित्र है जितना तुम्हारे मन्दिर का कलश ! जमीन पर गिरा हुआ कुरान का एक-एक पन्ना शिवा ने अपनी तलवार से उठाकर मौलवियों के सिर पर रख दिया है । मेरे लिए धर्म के ख्याल से हिन्दू और मुसलमान में कोई फर्क नहीं है । मैंने हमेशा इस बात का ख्याल रखा है कि चोट पहले मेरे कलेजे में पड़ेगी बाद को मसजिद की दीवाल में, फिर मेरे सेनापति होकर तुमने मेरे सिद्धान्तों के विरुद्ध ऐसा काम क्यों किया ?"
सन्दर्भ: यह गद्यांश किसी पाठ से लिया गया है जिसमें शिवा (शिवाजी) के धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांतों का वर्णन है।
प्रसंग: शिवा अपने सेनापति को फटकार रहे हैं जिसने धार्मिक भेदभाव किया। वे कहते हैं कि मस्जिद और मंदिर दोनों पवित्र हैं, और उन्होंने कुरान का सम्मान किया। उनके लिए हिंदू-मुस्लिम में कोई अंतर नहीं है। वे पहले खुद को कष्ट सहने को तैयार हैं, फिर किसी धार्मिक स्थल को। सेनापति ने उनके इस सिद्धांत के विरुद्ध काम किया, जिससे वे नाराज हैं।
व्याख्या: शिवा धार्मिक समानता और सहिष्णुता पर बल देते हैं। वे कहते हैं कि उनके लिए सभी धर्म समान हैं और वे किसी भी धर्म के प्रति अनादर बर्दाश्त नहीं करेंगे। सेनापति के कृत्य से उनके सिद्धांतों को ठेस पहुंची है।
अथवा
गद्यांश: "सबसे बड़ी बात यह है कि झूठ का त्याग करना पड़ता है । भगत झूठ नहीं बोल सकता । साधारण मनुष्य को अगर झूठ का एक दण्ड मिले, तो भगत को एक लाख से कम नहीं मिल सकता । अज्ञान की अवस्था में कितने ही अपराध क्षम्य हो जाते हैं । ज्ञानी के लिए क्षमा नहीं है, प्रायश्चित्त नहीं है, यदि है, तो बहुत ही कठिन ।"
सन्दर्भ: यह गद्यांश किसी पाठ से लिया गया है जिसमें सत्य और झूठ के महत्व पर चर्चा है।
प्रसंग: यहाँ भगत (एक सत्यनिष्ठ व्यक्ति) के बारे में बताया गया है कि वह झूठ नहीं बोल सकता। सामान्य व्यक्ति की तुलना में भगत के लिए झूठ का दंड अधिक गंभीर है। अज्ञानी के अपराध क्षम्य हो सकते हैं, पर ज्ञानी के लिए क्षमा या प्रायश्चित्त बहुत कठिन है।
व्याख्या: लेखक कहता है कि सत्य का पालन करने वाले व्यक्ति (भगत) के लिए झूठ बोलना असंभव है। यदि सामान्य व्यक्ति झूठ बोलने पर एक दंड का भागी होता है, तो भगत को लाख गुना दंड मिलेगा क्योंकि उससे अधिक अपेक्षा की जाती है। अज्ञानी व्यक्ति के अपराध क्षमा किए जा सकते हैं, लेकिन ज्ञानी व्यक्ति के लिए कोई क्षमा नहीं है; यदि है भी तो बहुत कठिन। इसका तात्पर्य है कि ज्ञान और सत्यनिष्ठा के साथ बड़ी जिम्मेदारी आती है।
29. निम्नलिखित पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या लगभग 25 शब्दों में कीजिए :
प्रथम पद्यांश:
“तेरी सहायता से जय तो मैं अनायास पा जाऊँगा।
आने वाली मानवता को लेकिन, क्या मुख दिखाऊँगा?
संसार कहेगा जीवन या सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया,
प्रतिभट के वध के लिए सर्प का पापी ने साहाय्य किया।”
व्याख्या: यहाँ कर्ण कहता है कि तुम्हारी सहायता से मैं आसानी से जीत जाऊँगा, लेकिन आने वाली मानवता को मैं क्या मुँह दिखाऊँगा? संसार कहेगा कि कर्ण ने अपने सारे पुण्य नष्ट कर दिए और शत्रु को मारने के लिए सर्प (अधर्म) का सहारा लिया।
द्वितीय पद्यांश:
“हा गुरु देव मचा दी तुमने
शान्त हृदय में कैसी क्रान्ति?
अब तक मानों मैं भ्रम में था
तुमने आज मिटा दी भ्रान्ति।
आया नहीं एक क्षण को भी
इन बातों का मुझको ध्यान
दुःखपूर्ण है सदा आदि में
सुखमय रहे अन्त में ज्ञान।”
व्याख्या: शिष्य गुरु से कहता है कि आपने मेरे शांत हृदय में कैसी क्रांति ला दी! अब तक मैं भ्रम में था, आपने आज वह भ्रांति दूर कर दी। मुझे एक क्षण भी इस बात का ध्यान नहीं था कि आरंभ में सदा दुःख होता है, पर अंत में ज्ञान सुखमय होता है।
30. निम्नलिखित विषयों में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों में निबंध लिखिए :
- (अ) मेरी अविस्मरणीय यात्रा
- (ब) जीवन में खेलों का महत्व
- (स) श्रम ही सब मिलत है बिनु श्रम मिले ना काहि
- (द) वर्तमान प्रदूषण एवं निराकरण में युवाओं का योगदान
(नोट: उपरोक्त चार विषयों में से किसी एक पर 8 अंकों का निबंध लिखना है।)