RBSE Class 11th 2017 Hindi-A-11-28-2017 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 11th |
| Exam year | 2017 |
| Subject | Hindi-A-11-28-2017 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 11th 2017 Hindi-A-11-28-2017
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Rajasthan Board Class 11th Hindi-A-11-28-2017 2017 solved Previous Year Question Papers
वार्षिक परीक्षा सत्र 2016-2017
कक्षा – XI (ग्यारहवीं)
विषय – हिन्दी
समय : 3.5 घंटे | पूर्णांक : 100
निर्देश:
- सभी प्रश्न हल करना अनिवार्य है।
- विद्यार्थी अपना नामांक प्रश्न पत्र पर अनिवार्यतः लिखें।
- जिस प्रश्न के एक से अधिक भाग हैं, उन सभी भागों का उत्तर एक साथ ही लिखें, भिन्न-भिन्न दो स्थानों पर नहीं लिखें।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर पुस्तिका में ही लिखें।
- प्रत्येक प्रश्न के अंक प्रश्न के सामने अंकित हैं।
खण्ड – ॥
4. निम्न अपठित गद्यांश को पढ़कर नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए – 5
“संस्कृति” शब्द का सम्बन्ध संस्कार से है, जिसका अर्थ है – संशोधन करना, उत्तम बनाना, परिष्कार करना। संस्कार व्यक्ति के भी होते हैं और जाति के भी। जातीय संस्कारों को ही संस्कृति कहते हैं। जलवायु के अनुकूल रहन-सहन की विधियाँ और विचार परम्पराएँ जाति के लोगों में दृढ़मूल हो जाने से जाति के संस्कार बन जाते हैं। इनको प्रत्येक व्यक्ति अपनी निजी प्रकृति के अनुकूल न्यूनाधिक मात्रा में सम्पत्ति के रूप में प्राप्त करता है। ये संस्कार व्यक्ति के घरेलू जीवन तथा सामाजिक जीवन में परिलक्षित होते हैं। मनुष्य अकेला रहकर भी इनसे छुटकारा नहीं पा सकता।
संस्कृति का बाह्य पक्ष भी होता है और आन्तरिक भी। उसका बाह्य पक्ष आन्तरिक का प्रतिबिम्ब नहीं तो उससे सम्बन्धित अवश्य रहता है। संस्कृति एक देश विदेश की उपज होती है, उसका सम्बन्ध देश के भौतिक वातावरण और उसमें पालित, पोषित एवं परिवर्द्धित विचारों से होता है। हमारी संस्कृति के आन्तरिक अंगों को लेकर मनुस्मृति आदि धर्मग्रन्थों की रचना की गई है, जिसमें अच्छे मनुष्यों के जो अच्छे लक्षण बताये गये हैं वे जब भारतीयों की मानसिक एवं आध्यात्मिक संस्कृति के परिचायक हैं।
(i) संस्कृति शब्द का अर्थ क्या बताया गया है?
उत्तर: गद्यांश के अनुसार, “संस्कृति” शब्द का सम्बन्ध संस्कार से है, जिसका अर्थ है – संशोधन करना, उत्तम बनाना, परिष्कार करना।
(ii) संस्कृति किसे कहा जाता है?
उत्तर: गद्यांश के अनुसार, जातीय संस्कारों को ही संस्कृति कहा जाता है।
प्रश्न 3
(iii) जातीय संस्कार कैसे बनते हैं?
जातीय संस्कार व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के विभिन्न संस्कारों (जैसे नामकरण, उपनयन, विवाह आदि) के माध्यम से बनते हैं। ये संस्कार समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर विकसित होते हैं।
(iv) जातीय संस्कार व्यक्ति के किस जीवन में परिलक्षित होते हैं?
जातीय संस्कार व्यक्ति के सामाजिक जीवन में परिलक्षित होते हैं। ये उसके आचरण, व्यवहार, रहन-सहन और परंपराओं में दिखाई देते हैं।
(v) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक बताइए।
उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक "जातीय संस्कार और उनका महत्व" हो सकता है।
काव्यांश पर आधारित प्रश्न
उठे राष्ट्र तेरे कन्धों पर, बढ़े प्रगति के प्रांगण में,
पृथ्वी को रख दिया उठाकर तूने नभ के आँगन में।
तेरे प्राणों के ज्वारों पर, लहराते हैं देश सभी
चाहे जिसे इधर कर दे तू चाहे जिसे उधर क्षण में।
विजय वैजयन्ती फहरी जो, जग के कोने-कोने में,
उनमें तेरा नाम लिखा है जीने में बलि होने में।
घहरे रन घनघोर बढ़ी सेनाएँ तेरा बल पाकर,
स्वर्ण-मुकुट आ गए चरंण-तल तेरे शस्त्र संजोने में।
तेरे बाहुदण्ड में वह बल, जो के हरि-कटि तोड़ सके,
तेरे दृढ़ हृदय में वह बल, जो गिरि से ले होड़ सके।
(i) 'उठे राष्ट्र तेरे कन्धों पर' - इसमें 'तेरे' किसके लिए कहा गया है?
इसमें 'तेरे' शब्द युवाओं (तरुणों) के लिए कहा गया है। कवि युवाओं को संबोधित करते हुए कहता है कि राष्ट्र उनके कंधों पर उठा है।
(ii) प्रस्तुत काव्यांश का मूल भाव क्या है? लिखिए।
प्रस्तुत काव्यांश का मूल भाव युवाओं की शक्ति और उनके राष्ट्र निर्माण में योगदान का वर्णन है। कवि युवाओं को प्रेरित करता है कि वे अपने बल और साहस से राष्ट्र को प्रगति के पथ पर ले जाएँ और विजय प्राप्त करें।
(iii) प्रस्तुत काव्यांश में कवि को तरुणों से क्या-क्या अपेक्षाएँ हैं?
कवि को तरुणों से निम्नलिखित अपेक्षाएँ हैं:
- वे राष्ट्र को अपने कंधों पर उठाकर प्रगति की ओर ले जाएँ।
- वे अपने प्राणों के बल से देशों को प्रभावित करें।
- वे युद्ध में अपने बल से विजय प्राप्त करें।
- वे अपने बाहुबल और दृढ़ हृदय से कठिनाइयों को पार करें।
(iv) 'के हरि-कटि' से कवि का क्या आशय है?
'के हरि-कटि' से कवि का आशय भगवान विष्णु के कटि (कमर) क्षेत्र से है। यहाँ कवि युवाओं के बाहुबल की तुलना उस शक्ति से करता है जो भगवान विष्णु की कमर को भी तोड़ सके, अर्थात अत्यधिक शक्तिशाली।
(v) 'विजय वैजयन्ती फहरी' से कवि का क्या तात्पर्य है?
'विजय वैजयन्ती फहरी' से कवि का तात्पर्य विजय के झंडे का फहराना है। यह संकेत करता है कि युवाओं के बल और साहस से दुनिया के कोने-कोने में विजय प्राप्त होती है और उनका नाम अमर हो जाता है।
खण्ड-2
1. वाक्यांश के लिए एक शब्द बताइए:
(i) वह जो बाह्य जगत् के ज्ञान से अनभिज्ञ हो।
उत्तर: अज्ञ
(ii) वह जो दूर की बात न सोच सके।
उत्तर: अदूरदर्शी
2. निम्न तत्सम शब्दों के तद्भव रूप बताइए:
(i) अग्नि
उत्तर: आग
(ii) मस्तक
उत्तर: माथा
3. 'जो परिश्रम करते हैं, वे सफल होते हैं' - उपर्युक्त वाक्य रचना के आधार पर किस प्रकार का वाक्य है? परिभाषा लिखिए।
यह वाक्य संयुक्त वाक्य है।
परिभाषा: जिस वाक्य में दो या दो से अधिक स्वतंत्र उपवाक्य किसी योजक (जैसे 'और', 'तथा', 'परंतु', 'इसलिए' आदि) से जुड़े हों, उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं। यहाँ 'जो परिश्रम करते हैं' और 'वे सफल होते हैं' दो स्वतंत्र उपवाक्य हैं जो अर्थ के आधार पर जुड़े हैं।
4. निम्न वाक्यों में उचित विराम चिन्हों का प्रयोग करके पुनः लिखिए:
(i) स्वदेश प्रेम की व्यंजना देश सेवा से होती है
उत्तर: स्वदेश प्रेम की व्यंजना देश सेवा से होती है।
(ii) अरे सुख दुःख में क्यों घबराते हो
उत्तर: अरे! सुख-दुःख में क्यों घबराते हो?
5. निम्न काव्य सूक्ति का भाव विस्तार/पल्लवन लिखिए:
"करत-करत अभ्यास के, जड़मति होय सुजान।"
भाव विस्तार: इस सूक्ति का अर्थ है कि निरंतर अभ्यास करने से मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान बन सकता है। यह कहावत हमें सिखाती है कि किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए लगातार प्रयास और अभ्यास आवश्यक है। जैसे कोई व्यक्ति पढ़ाई, खेल या कला में बार-बार अभ्यास करके निपुण हो जाता है, वैसे ही जड़बुद्धि व्यक्ति भी अभ्यास से ज्ञानी बन सकता है। यह संदेश देता है कि प्रतिभा से अधिक महत्वपूर्ण है निरंतरता और मेहनत।
खण्ड - 3
निम्न विषयों में से किसी एक पर सारगर्भित निबन्ध लिखिए- 8
- राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान
- आतंकवाद: एक विकराल समस्या
- विद्यार्थी जीवन में इन्टरनेट की भूमिका
- बेरोजगारी: एक विकराल समस्या
पठित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
पद्यांश:
हरि! तुम हरो जन की भीर।
द्रोपदी को लाज राखी, तुरत बढ़ायो चीर।
भक्त कारण रूप नरहरि, धरयो आप सरीर।
हिरण्यकश्यप मार लीनो, धरयो नाहिन धीर।
बूडते गज ग्राह मार्यो, कियो बाहर तीर।
दासी मीरा लाल गिरधर, दुःख जहाँ तहाँ।
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित भक्तिकालीन कवि मीराबाई के पद से लिया गया है।
प्रसंग: मीराबाई अपने आराध्य श्रीकृष्ण से प्रार्थना कर रही हैं कि वे अपने भक्तों के सभी कष्टों को हर लेते हैं। वे विभिन्न उदाहरणों द्वारा श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन करती हैं।
व्याख्या: मीरा कहती हैं कि हे हरि! आप अपने भक्तों के सभी संकटों को दूर करते हैं। आपने द्रौपदी की लाज रखने के लिए तुरंत उनके चीर को बढ़ाया था। भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए आपने नरसिंह का रूप धारण किया और हिरण्यकश्यप का वध किया, बिना कोई धीरज धरे। डूबते हुए गजराज (हाथी) को मगरमच्छ से मुक्त करके आपने उसे किनारे पर पहुँचाया। मीरा कहती हैं कि वे आपकी दासी हैं और गिरधर लाल (कृष्ण) ही उनके सभी दुखों का निवारण करते हैं, चाहे वे कहीं भी हों।
अथवा
पद्यांश:
लक्ष्मी नहीं, सर्वस्व जावे, सत्य छोड़ेंगे नहीं,
अरे बने पर सत्य से सम्बन्ध तोड़ेंगे नहीं।
निज सुत-मरण स्वीकार है पर वचन की रक्षा रहे,
है कौन जो उन पूर्वजों के शील की सीमा कहे।
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कविता से लिया गया है।
प्रसंग: कवि सत्य की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सत्य का पालन करने वाले व्यक्ति किसी भी संकट में सत्य का त्याग नहीं करते।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि चाहे धन-सम्पत्ति नष्ट हो जाए या सब कुछ चला जाए, परन्तु सत्य को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य से संबंध नहीं तोड़ना चाहिए। पूर्वजों ने अपने पुत्र के मरण को भी स्वीकार कर लिया, ताकि उनके वचन की रक्षा हो सके। ऐसे पूर्वजों के शील और सत्यनिष्ठा की सीमा को कौन निर्धारित कर सकता है? यह अत्यंत प्रशंसनीय है।
पठित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
गद्यांश:
सत्संगति की महिमा कम से कम इस देश में अज्ञात नहीं रह गई है और मैं तो व्याकुलता के साथ अनुभव कर रहा हूँ कि सत्संगति ने मेरे अन्तरतम को आलोकित कर रखा है। भीतर की आवाज केवल आदत का नतीजा है। इस खास ढंग से सोचते रहने वाला आदमी उसी ढंग की आवाज सुना करता है। जिन लोगों की वाणी पर विश्वास करके आज तक चलता रहा हूँ वे ऐसा नहीं मानते। रवीन्द्रनाथ ने कहा कि तू लोगों की बात पर मान न दे, हजार-हजार आकर्षण से खिंचा-खिंचा।
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित 'सत्संगति' नामक पाठ से लिया गया है।
प्रसंग: लेखक सत्संगति के महत्व पर विचार कर रहे हैं और बता रहे हैं कि कैसे सत्संगति मनुष्य के आंतरिक जीवन को प्रभावित करती है।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि सत्संगति की महिमा भारत देश में किसी से छिपी नहीं है। वे स्वयं व्याकुलता के साथ अनुभव कर रहे हैं कि सत्संगति ने उनके अंतरतम (हृदय) को प्रकाशित कर रखा है। लेखक के अनुसार, भीतर की आवाज (अंतरात्मा) केवल आदत का परिणाम है। जो व्यक्ति जिस प्रकार का विचार करता है, वह उसी प्रकार की आवाज सुनता है। जिन लोगों के कथन पर विश्वास करके वे आज तक चलते रहे हैं, वे इस बात को नहीं मानते। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है कि तू दूसरे लोगों की बातों पर ध्यान न दे, चाहे वह हजारों आकर्षणों से तुझे खींचे।
अथवा
गद्यांश:
बाबाजी भी मनुष्य ही थे। अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय भी अधीर हो गया। घोड़े को खोल कर बाहर लाये और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। एकाएक उचककर सवार हो गए। घोड़ा वायु-वेग से उड़ने लगा। उसकी चाल देखकर उसकी गति देखकर खड्गसिंह के हृदय में लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाये, उस पर अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था, और आदमी थे। जाते-जाते उसने कहा- बाबाजी! मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।
सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित 'घोड़ा और डाकू' नामक कहानी से लिया गया है।
प्रसंग: बाबाजी अपने घोड़े की प्रशंसा सुनने के लिए उसे दिखाने लगते हैं, जिसे देखकर डाकू खड्गसिंह उसे लेने की धमकी देता है।
व्याख्या: बाबाजी भी सामान्य मनुष्य ही थे। उनका हृदय अपनी वस्तु (घोड़े) की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए अधीर हो गया। उन्होंने घोड़े को खोलकर बाहर निकाला और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। फिर अचानक वे उछलकर उस पर सवार हो गए। घोड़ा वायु के समान वेग से दौड़ने लगा। उसकी चाल और गति को देखकर खड्गसिंह का हृदय लोट गया (वह मोहित हो गया)। खड्गसिंह एक डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाती, उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल (शारीरिक शक्ति) और आदमी (साथी) थे। जाते-जाते उसने बाबाजी से कहा कि वह इस घोड़े को उनके पास नहीं रहने देगा, अर्थात वह इसे छीन लेगा।
प्रश्न: "अयोध्या से बाहर वन मार्ग में दो कदम चलते ही सीताजी की दशा कैसी हो गयी?" वर्णन कीजिए। 5
अयोध्या से बाहर वन मार्ग में दो कदम चलते ही सीताजी की दशा अत्यंत करुणाजनक हो गई। वे नगर की सुख-सुविधाओं और महल के ऐश्वर्य में पली-बढ़ी थीं, परंतु वन में पैर रखते ही उन्हें कठोर भूमि, धूल-मिट्टी और असुविधाओं का सामना करना पड़ा। उनके कोमल पैरों में छाले पड़ गए और वे चलने में असमर्थ हो गईं। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे और वे श्रीराम की ओर दुखभरी दृष्टि से देखने लगीं। उनका श्रृंगार बिखर गया और वे मार्ग की कठिनाइयों से व्याकुल हो गईं। उनकी यह दशा देखकर श्रीराम का हृदय भी द्रवित हो गया और उन्होंने सीताजी को सांत्वना दी।
खण्ड - 4
प्रश्न 72. शिव पूजन सहाय की दृष्टि से 'प्रसाद जी' महान् साहित्यकार के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ थे। स्पष्ट कीजिए।
शिव पूजन सहाय के अनुसार, प्रसाद जी केवल महान साहित्यकार ही नहीं, बल्कि एक महान मानवतावादी, दार्शनिक, और समाज सुधारक भी थे। वे भारतीय संस्कृति के गहरे ज्ञाता थे और उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों का प्रचार किया। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था, जिसमें कवि, नाटककार, उपन्यासकार, निबंधकार और पत्रकार सभी समाहित थे।
प्रश्न 73. आवाजी सोनदेव शिवाजी को सबसे बड़ा तोहफा क्या देना चाहते थे और क्यों?
आवाजी सोनदेव शिवाजी को 'स्वराज्य' का तोहफा देना चाहते थे। वे चाहते थे कि शिवाजी एक स्वतंत्र हिंदू राज्य की स्थापना करें, जहाँ लोग मुगलों के अत्याचार से मुक्त होकर अपनी संस्कृति और धर्म के अनुसार जीवन जी सकें। यह तोहफा उनके लिए सबसे बड़ा था क्योंकि यह पूरे राष्ट्र की आज़ादी और गौरव से जुड़ा था।
प्रश्न 74. पारस पत्थर की अमूल्यता किसमें है?
पारस पत्थर की अमूल्यता इस बात में है कि वह लोहे को सोने में बदलने की क्षमता रखता है। यह एक काल्पनिक पत्थर है जिसके स्पर्श मात्र से धातुएँ सोने में परिवर्तित हो जाती हैं, इसलिए इसे अमूल्य माना जाता है।
प्रश्न 75. सुधा बीज बोने वालों को कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है?
सुधा बीज बोने वालों को अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें समाज के विरोध, उपहास, और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। उनके कार्यों की सराहना नहीं होती, बल्कि उन्हें अक्सर गलत समझा जाता है। उन्हें अपने विचारों और कार्यों के लिए संघर्ष करना पड़ता है और कभी-कभी उन्हें अपने प्राणों की भी बाजी लगानी पड़ती है।
प्रश्न 76. हल्दीघाटी का भेरवपथ खून से क्यों रंग दिया था?
हल्दीघाटी का भेरवपथ खून से इसलिए रंग दिया गया था क्योंकि वहाँ महाराणा प्रताप और मुगल सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ था। इस युद्ध में असंख्य वीर सैनिक शहीद हुए थे, जिनके खून से पूरा मैदान लाल हो गया था। यह युद्ध स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए लड़ा गया था।
प्रश्न 77. अग्नि की उड़ान के लेखक का परिचय दीजिए।
'अग्नि की उड़ान' के लेखक स्वर्गीय डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हैं। वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति और एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे। उन्होंने भारत के मिसाइल कार्यक्रम में महत्वपूर्ण योगदान दिया और उन्हें 'मिसाइल मैन' के नाम से जाना जाता है। यह पुस्तक उनकी आत्मकथा है जिसमें उन्होंने अपने जीवन के संघर्षों और सफलताओं का वर्णन किया है।
प्रश्न 78. रसखान रस की खान है। कैसे?
रसखान को 'रस की खान' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उनकी कविताओं में प्रेम, भक्ति, और सौंदर्य का अद्भुत रस भरा हुआ है। वे कृष्ण भक्ति के श्रेष्ठ कवि थे और उनकी रचनाओं में भक्ति रस की प्रधानता है। उनकी भाषा सरल और सहज है, जो सीधे हृदय को छूती है। उन्होंने अपनी कविताओं में प्रेम और भक्ति के विभिन्न रसों का ऐसा मिश्रण किया है कि वे सचमुच 'रस की खान' कहलाते हैं।
प्रश्न 79. ब्रज भूमिके ग्रतिकविका प्रेम किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है?
ब्रज भूमि के प्रति कवियों का प्रेम विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। कुछ कवियों ने ब्रज की प्राकृतिक सुंदरता, यमुना के किनारे, वृंदावन के वनों और गोपियों के प्रेम का वर्णन किया है। कुछ ने कृष्ण की लीलाओं और उनके प्रति अपनी भक्ति को व्यक्त किया है। वहीं कुछ कवियों ने ब्रज की संस्कृति, रीति-रिवाजों और वहाँ के लोगों के जीवन को अपनी रचनाओं का विषय बनाया है। इस प्रकार ब्रज भूमि के प्रति प्रेम विविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ है।
प्रश्न 80. डाकू खड्गसिंह ने किस विधि से बाबा भारती से घोड़ा प्राप्त किया?
डाकू खड्गसिंह ने बाबा भारती से घोड़ा प्राप्त करने के लिए छल का सहारा लिया। उसने बाबा भारती के भोलेपन का फायदा उठाया और उन्हें धोखा देकर घोड़ा हथिया लिया। वह बाबा भारती के पास एक साधु के वेश में गया और उनका विश्वास जीतकर घोड़ा लेकर भाग गया।
खण्ड - 5
प्रश्न 6. खेल कहानी का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए समीक्षा कीजिए।
खेल कहानी का उद्देश्य खेलों के माध्यम से जीवन के मूल्यों और सिद्धांतों को प्रस्तुत करना है। यह खेल भावना, टीम वर्क, अनुशासन, और निष्ठा जैसे गुणों को विकसित करने पर जोर देती है। खेल कहानियाँ पाठकों को प्रेरित करती हैं कि वे जीवन में चुनौतियों का सामना करें और हार न मानें।
समीक्षा: खेल कहानियाँ मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा भी प्रदान करती हैं। ये युवा पीढ़ी को सकारात्मक दिशा देने में सहायक होती हैं। हालाँकि, कुछ खेल कहानियों में अत्यधिक नाटकीयता और अवास्तविकता होती है, जो उनकी विश्वसनीयता को कम करती है। फिर भी, ये कहानियाँ खेलों के प्रति रुचि जगाने और नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रश्न 7. 'पंचतत्व के एक पुतले को अत्याचार के उपासकों ने तोप से उड़ा दिया।' देवताओं पर इस बलिदान की क्या प्रतिक्रिया हुई और क्यों?
इस बलिदान की प्रतिक्रिया में देवता अत्यंत क्रोधित और दुखी हुए। उन्होंने इसे मानवता पर एक गंभीर आघात माना। देवताओं की प्रतिक्रिया इसलिए इतनी तीव्र थी क्योंकि यह बलिदान अत्याचार और अन्याय के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विद्रोह था। पंचतत्व के पुतले का तोप से उड़ाया जाना यह दर्शाता है कि अत्याचारी शक्तियाँ किसी भी हद तक जा सकती हैं। देवता इस बात से स्तब्ध थे कि मनुष्य अपने ही भाइयों के प्रति इतना क्रूर हो सकता है।
प्रश्न 8. निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
(क) बालिका सूरबाला मनोहर के बारे में अपने मन में क्या सोचती थी?
बालिका सूरबाला मनोहर के बारे में यह सोचती थी कि वह एक अच्छा और सहानुभूतिपूर्ण व्यक्ति है। वह उसे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखती थी जो दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहता है। उसके मन में मनोहर के प्रति सम्मान और विश्वास की भावना थी।
(ख) देशभक्त को सम्राट के लोगों ने किस प्रकार गिरफ्तार किया?
सम्राट के लोगों ने देशभक्त को छल और धोखे से गिरफ्तार किया। उन्होंने उसे एक जाल में फंसाया, जहाँ वह अपना बचाव नहीं कर सका। वे उसे रात के अंधेरे में या किसी एकांत स्थान पर घेरकर पकड़ ले गए। उन्होंने उसकी देशभक्ति और साहस को कुचलने के लिए इस तरह की कायरतापूर्ण चाल का सहारा लिया।
(ग) चेतना लौटने के बाद कोबायाशी ने अपने चारों ओर किस प्रकार का वातावरण देखा?
चेतना लौटने के बाद कोबायाशी ने अपने चारों ओर विनाश और तबाही का वातावरण देखा। चारों ओर मृत शरीर, टूटी-फूटी इमारतें और धुआँ ही धुआँ था। वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था और हर तरफ मौत का मंज़र था। यह युद्ध की भयावहता का एक भयानक दृश्य था, जिसने उसे झकझोर दिया।
(घ) रतनसिंह ने राजकुमारी को सावधान करते हुए शत्रु के सम्बन्ध में क्या कहा?
रतनसिंह ने राजकुमारी को सावधान करते हुए कहा कि शत्रु बहुत चालाक और कपटी है। उसने राजकुमारी को शत्रु पर विश्वास न करने की सलाह दी और कहा कि शत्रु किसी भी समय धोखा दे सकता है। उसने राजकुमारी को सतर्क रहने और शत्रु की हर चाल को समझने की आवश्यकता पर बल दिया।