RBSE Class 12th 2010 Hindi Sahitya-SS-21-2-2010 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2010 |
| Subject | Hindi Sahitya-SS-21-2-2010 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2010 Hindi Sahitya-SS-21-2-2010
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Rajasthan Board Class 12th Hindi Sahitya-SS-21-2-2010 2010 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2010
वैकल्पिक समूह I (OPTIONAL GROUP I – HUMANITIES)
हिन्दी साहित्य – द्वितीय पत्र
(HINDI SAHITYA – Second Paper)
समय : 3 घण्टे पूर्णांक : 60
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्नपत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं। प्रश्न संख्या 23, 24 एवं 25 में आंतरिक विकल्प हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिस प्रश्न के एक से अधिक समान अंकवाले भाग हैं, उन सभी भागों का हल एक साथ लिखें।
- प्रश्न क्रमांक 1 के चार भाग (i, ii, iii, iv) हैं। प्रत्येक भाग के उत्तर के चार विकल्प (अ, ब, स एवं द) हैं। सही विकल्प का उत्तराक्षर उत्तर-पुस्तिका में निम्नानुसार तालिका बनाकर लिखें :
| प्रश्न क्रमांक | सही उत्तर का क्रमाक्षर |
|---|---|
| 1. (i) | |
| 1. (ii) | |
| 1. (iii) | |
| 1. (iv) |
SS–21–2–Hindi Sah. II [ Turn over ]
प्रश्न पत्र – हिंदी साहित्य (SS-21-2-2010) – पृष्ठ 2
1. “रसात्मकं काव्यम्” यह वाक्य किस आचार्य की परिभाषा है?
- (अ) आचार्य जगन्नाथ
- (ब) आचार्य विश्वनाथ
- (स) आचार्य भामह
- (द) आचार्य मम्मट
सही उत्तर: (अ) आचार्य जगन्नाथ
स्पष्टीकरण: आचार्य जगन्नाथ ने 'रसगंगाधर' में काव्य को 'रसात्मकं काव्यम्' कहा है, अर्थात काव्य रसात्मक होता है।
2. निम्नलिखित में से कौन सा महाकाव्य नहीं है?
- (अ) रामचरितमानस
- (ब) साकेत
- (स) विनयपत्रिका
- (द) कामायनी
सही उत्तर: (स) विनयपत्रिका
स्पष्टीकरण: 'विनयपत्रिका' तुलसीदास द्वारा रचित भक्ति काव्य है, जो महाकाव्य नहीं बल्कि स्तुति काव्य है। शेष तीनों महाकाव्य हैं।
3. निम्नलिखित पंक्तियों में निहित रस है:
हाहाकार हुआ, कठिन वज्र होते थे चूर,
हुए बधिर भीषण रव बार-बार होता था क्रूर।
- (अ) वीर
- (ब) करुण
- (स) भयानक
- (द) हास्य
सही उत्तर: (स) भयानक
स्पष्टीकरण: पंक्तियों में 'हाहाकार', 'वज्र चूर होना', 'बधिर कर देने वाला भीषण रव' आदि शब्द भय और आतंक का वातावरण उत्पन्न करते हैं, जो भयानक रस के स्थायी भाव 'भय' पर आधारित है।
4. महाकाव्य की प्रमुख विशेषता मानी जाती है:
- (अ) छोटा कथानक
- (ब) विस्तृत कथानक
- (स) सर्गों की न्यूनता
- (द) गद्य-पद्यात्मक शैली
सही उत्तर: (ब) विस्तृत कथानक
स्पष्टीकरण: महाकाव्य की प्रमुख विशेषता उसका विस्तृत कथानक होता है, जिसमें अनेक सर्ग होते हैं और जीवन के विविध पक्षों का चित्रण मिलता है।
निर्देश: प्रश्न संख्या 2 से 5 तक के उत्तर लगभग 20 शब्दों में दीजिए।
2. काव्य के भेदों के नाम लिखिए।
काव्य के मुख्य भेद हैं: (1) श्रव्य काव्य (दृश्य काव्य के विपरीत) और (2) दृश्य काव्य (नाटक)। श्रव्य काव्य के दो भेद हैं: प्रबंध काव्य (महाकाव्य, खंडकाव्य) और मुक्तक काव्य।
3. काव्य में भावपक्ष के तत्त्व कौन-कौन से हैं?
काव्य में भावपक्ष के तत्त्व हैं: रस, भाव, विभाव, अनुभाव, संचारी भाव, स्थायी भाव, सात्त्विक भाव आदि। ये सभी काव्य में भावात्मक अभिव्यक्ति के आधार हैं।
4. उद्दीपन विभाव किसे कहते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उद्दीपन विभाव वे कारण हैं जो स्थायी भाव को उद्दीप्त (जागृत) करते हैं। जैसे नायक-नायिका के गुण, चाँदनी, बगीचा, कोकिला का स्वर आदि। ये आलंबन विभाव (जिसके आश्रय से भाव जागे) को उत्तेजित करते हैं।
5. रस-निष्पत्ति के चार वादों के प्रवर्तकों के नाम लिखिए।
रस-निष्पत्ति के चार वाद और उनके प्रवर्तक हैं: (1) उत्पत्तिवाद – भरतमुनि, (2) अभिव्यक्तिवाद – आचार्य अभिनवगुप्त, (3) अनुमितिवाद – आचार्य भट्टनायक, (4) भुक्तिवाद – आचार्य भट्टलोल्लट।
निर्देश : प्रश्न संख्या 6 से 10 तक के लिए उत्तर-सीमा 50 शब्द है।
6. नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल
अलि कली ही सों बंध्यों, आगे कौन हवाल॥
उपर्युक्त पंक्तियों में निहित अलंकार का नामोल्लेख करते हुए लक्षण लिखिए।
अलंकार का नाम: श्लेष अलंकार
लक्षण: जहाँ एक ही शब्द के अनेक अर्थ हों, वहाँ श्लेष अलंकार होता है। यहाँ 'अलि' शब्द के दो अर्थ हैं – भ्रमर (भौंरा) और अलि (प्रियतम)। 'कली' के भी दो अर्थ हैं – फूल की कली और कलियुग। 'बंध्यों' का अर्थ बँध गया और बंधन में पड़ गया। इस प्रकार एक ही शब्द के अनेक अर्थों के कारण श्लेष अलंकार है।
7. करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान
रसरी आवत-जात से, सिल पर परत निसान॥
उपर्युक्त पंक्तियों में निहित अलंकार का नाम एवं लक्षण लिखिए।
अलंकार का नाम: दृष्टान्त अलंकार
लक्षण: जहाँ किसी बात को सिद्ध करने के लिए उसी प्रकार का कोई उदाहरण दिया जाए, वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है। यहाँ अभ्यास से जड़मति के सुजान होने की बात को सिद्ध करने के लिए रस्सी के आने-जाने से पत्थर पर निशान पड़ने का उदाहरण दिया गया है।
8. अलंकार का अर्थ बताते हुए उसके भेदों के नाम लिखिए।
अलंकार का अर्थ: 'अलंकार' का शाब्दिक अर्थ है – आभूषण या गहना। काव्य में अलंकार वे शब्द या अर्थ होते हैं जो कविता की शोभा बढ़ाते हैं, जैसे आभूषण शरीर की शोभा बढ़ाते हैं।
अलंकार के भेद: अलंकार के मुख्यतः दो भेद हैं –
- शब्दालंकार – जहाँ शब्दों के प्रयोग से चमत्कार उत्पन्न होता है (जैसे अनुप्रास, यमक, श्लेष)।
- अर्थालंकार – जहाँ अर्थ के माध्यम से चमत्कार उत्पन्न होता है (जैसे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति)।
9. लख कर मुख सूखा सूखता है कलेजा
उर विचलित होता है विलोके दुःखों को।
सिर पर सुत के जो आपदा नाथ आई,
यह अवनि फटेगी, औ समा जाऊँगी मैं॥
उपर्युक्त पंक्तियों में वर्णों की गणना कर बताइए कि यह कौन-सा छंद है।
वर्ण गणना: प्रत्येक पंक्ति में 14-14 वर्ण हैं। वर्ण विभाजन इस प्रकार है –
- पहली पंक्ति: लख/कर/मुख/सू/खा/सू/खता/है/क/ले/जा (14 वर्ण)
- दूसरी पंक्ति: उर/वि/च/लित/हो/ता/है/वि/लो/के/दुः/खों/को (14 वर्ण)
- तीसरी पंक्ति: सिर/पर/सु/त/के/जो/आ/प/दा/ना/थ/आ/ई (14 वर्ण)
- चौथी पंक्ति: यह/अ/व/नि/फ/टे/गी/औ/स/मा/जा/ऊँ/गी/मैं (14 वर्ण)
छंद का नाम: यह चौपाई छंद है। चौपाई में प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं, किंतु यहाँ वर्णों की गणना के अनुसार यह 14 वर्णों का छंद है, जो दोहा या सोरठा नहीं है। वास्तव में यह चौपाई छंद है जिसमें प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं और अंत में गुरु-लघु का क्रम होता है।
10. वसन्ततिलका छंद के लक्षण स्पष्ट करते हुए उदाहरण दीजिए।
वसन्ततिलका छंद के लक्षण:
- यह एक समवृत्त छंद है, अर्थात इसके चारों चरण समान होते हैं।
- प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं।
- वर्ण-विन्यास: नजभजजगा (न, ज, भ, ज, ज, गा) – अर्थात प्रत्येक चरण में क्रमशः नगण, जगण, भगण, जगण, जगण, गुरु वर्ण होते हैं।
- यति (विराम) प्रत्येक चरण में 8वें और 14वें वर्ण के बाद होती है।
उदाहरण:
नजभजजगा यति 8 पर
श्रीरामचन्द्र कृपया सुखदायकाय
निर्वाणमार्ग पर चलो सब मानव जाय।
(यहाँ प्रत्येक चरण में 14 वर्ण और नजभजजगा का क्रम है।)
प्रश्न पत्र – हिंदी साहित्य (SS-21-2-2010) – पृष्ठ 4
प्रश्न 1. "हो समय कैसा ही कठिन, दृढ़ चित्त होकर मत डरो। लाखों विघ्न पर, कर्त्तव्य तुम अपना करो। कहते न तुम घर-घर फिरो, बाधा हरो, बाधा हरो। निज बाहु-बल से नाव लेकर, दुःख का सागर तरो।" उपर्युक्त छंद का नामोल्लेख करते हुए उसके लक्षण बताइए।
उत्तर: यह छंद ‘दोहा’ है।
लक्षण: दोहे में चार चरण होते हैं। पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। अंत में गुरु-लघु का क्रम होता है। प्रस्तुत पंक्तियाँ इसी लक्ष्य के अनुरूप हैं।
प्रश्न 2. ‘शृंगार रस’ का स्थायी भाव बताते हुए उदाहरण लिखिए।
उत्तर: शृंगार रस का स्थायी भाव ‘रति’ (प्रेम/आनंद) है।
उदाहरण: "मोहन मुरली बजाए, गोपियाँ नाचें रिझाए।" – यहाँ रति भाव (प्रेम) विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से पुष्ट होकर शृंगार रस में परिणत होता है।
प्रश्न 3. “आली, म्हाने लागे वृन्दावन नीको” उक्त पंक्ति के आधार पर बताइए कि मीरा को वृन्दावन अच्छा क्यों लगता है?
उत्तर: मीरा को वृन्दावन इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि यह स्थान श्रीकृष्ण की लीलाभूमि है। यहाँ की गलियाँ, यमुना तट और वन-उपवन उन्हें कृष्ण की स्मृति दिलाते हैं। मीरा के लिए वृन्दावन आध्यात्मिक प्रेम और भक्ति का केंद्र है, जहाँ वे अपने प्रभु के सान्निध्य का अनुभव करती हैं।
प्रश्न 4. “एक बिना सब लागत फीका” – कवि सुन्दरदास की उक्त पंक्ति का मूल भाव समझाइए।
उत्तर: इस पंक्ति का मूल भाव यह है कि संसार की सभी वस्तुएँ और सुख तब तक नीरस और फीके लगते हैं जब तक उनमें ईश्वर या परम सत्य का अंश न हो। सुन्दरदास के अनुसार, बिना परमात्मा के सब कुछ व्यर्थ है। यह भक्ति और आध्यात्मिकता की प्रधानता को दर्शाता है।
प्रश्न 5. “बन ज्योतिर्मय दीप जलो रे” कविता में बद्रीप्रसाद पंचोली भारतवासियों को क्या सन्देश देना चाहते हैं?
उत्तर: बद्रीप्रसाद पंचोली भारतवासियों को प्रेरित करना चाहते हैं कि वे अज्ञान और अंधकार के समय में ज्ञान और प्रकाश के दीपक बनें। वे देशवासियों से आह्वान करते हैं कि वे अपने कर्तव्यों का पालन करें, समाज में सकारात्मकता फैलाएँ और राष्ट्र की उन्नति के लिए स्वयं को समर्पित करें।
प्रश्न 6. 'सौगंध-उठाएँ' कविता में कवि ने कब-कब सौगन्ध उठाने की बात कही है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कवि ने निम्नलिखित अवसरों पर सौगंध उठाने की बात कही है:
- देश की रक्षा के लिए: जब देश पर संकट आए, तब प्राणों की बाजी लगाने की सौगंध उठाएँ। उदाहरण: "सीमा पर खड़े होकर, शत्रु को न झुकने देंगे।"
- सत्य और न्याय के लिए: अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की सौगंध। उदाहरण: "झूठ के आगे न झुकेंगे, सत्य का पथ न छोड़ेंगे।"
- समाज सेवा के लिए: गरीबों और पीड़ितों की सहायता करने की सौगंध। उदाहरण: "भूखे को अन्न, नंगे को वस्त्र देंगे।"
प्रश्न 7. “दिनकर” की काव्यगत विशेषताओं का सोदाहरण वर्णन कीजिए। (उत्तर-सीमा: 80 से 100 शब्द)
उत्तर: रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- राष्ट्रीयता और वीरता: उनकी कविताओं में देशभक्ति और वीर रस की प्रधानता है। उदाहरण: “कलम, आज उनकी जय बोल” में शहीदों का गुणगान।
- ओजस्वी शैली: भाषा में ओज और प्रवाह है। उदाहरण: “हिमालय के शिखरों पर, बैठी है आज प्रभात की बेला।”
- दार्शनिकता: जीवन और मृत्यु पर गहन चिंतन। उदाहरण: “उर्वशी” में प्रेम और आत्मा का दार्शनिक विवेचन।
- प्रकृति चित्रण: प्रकृति के विविध रूपों का सजीव वर्णन। उदाहरण: “पर्वत प्रदेश में पावस” में बादलों और बारिश का चित्रण।
प्रश्न 8. सुमित्रानन्दन पंत को प्रकृति का सुकुमार कवि क्यों कहा गया है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। (उत्तर-सीमा: 80 से 100 शब्द)
उत्तर: सुमित्रानन्दन पंत को ‘प्रकृति का सुकुमार कवि’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने प्रकृति के कोमल, मधुर और सूक्ष्म रूपों का अत्यंत संवेदनशील चित्रण किया है। वे प्रकृति के हर तत्व – फूल, पत्ती, बूँद, किरण – में सौंदर्य और भावना ढूँढ़ते हैं।
उदाहरण: “पल्लव” कविता में वे लिखते हैं: “धरती के फूल खिले, अम्बर के तारे झिलमिलाए।” यहाँ प्रकृति के सुकुमार रूप को देखा जा सकता है। उनकी भाषा में लालित्य और चित्रात्मकता है, जो प्रकृति के प्रति उनके गहरे प्रेम को दर्शाती है।
प्रश्न 20
“पूँजीवादी शोषण का संकट आज गहराता जा रहा है ।” 'एक बोध' कविता के आधार पर सविस्तार लिखिए ।
'एक बोध' कविता में कवि ने पूँजीवादी शोषण की विकरालता को उजागर किया है। कविता के अनुसार, पूँजीवादी व्यवस्था में धन का संकेंद्रण कुछ हाथों में हो जाता है, जिससे श्रमिक वर्ग का शोषण बढ़ता है। कवि ने दिखाया है कि यह शोषण आज और गहराता जा रहा है, क्योंकि पूँजीपति अपने स्वार्थ के लिए मजदूरों की मेहनत का उचित मूल्य नहीं देते। कविता में इस संकट को सामाजिक असमानता और आर्थिक विषमता के रूप में चित्रित किया गया है, जो मानवता के लिए खतरा बन गया है। कवि का संदेश है कि इस शोषण से मुक्ति के लिए समाज में जागरूकता और संघर्ष आवश्यक है।
प्रश्न 21
भवानीप्रसाद मिश्र की 'लुहार' कविता में कौन-से मनोभाव प्रकट होते हैं ? स्पष्ट कीजिए ।
भवानीप्रसाद मिश्र की 'लुहार' कविता में मुख्यतः निम्नलिखित मनोभाव प्रकट होते हैं:
- श्रम का गौरव: लुहार अपने काम पर गर्व करता है और उसे समाज के लिए आवश्यक मानता है।
- स्वाभिमान: वह अपनी मेहनत से जीवनयापन करता है और किसी के सामने झुकना नहीं चाहता।
- संघर्षशीलता: कविता में लुहार के निरंतर परिश्रम और कठिनाइयों से जूझने का भाव है।
- आशावाद: कठिन परिस्थितियों में भी वह उम्मीद नहीं छोड़ता और अपने काम में लगा रहता है।
ये मनोभाव लुहार के चरित्र को सशक्त और प्रेरणादायक बनाते हैं।
प्रश्न 22
यदि “श्रद्धा' के स्थान पर आप होते तो 'aa’ के प्रति आपके मन में क्या भाव उत्पन्न होते, कल्पना के आधार पर उत्तर दीजिए ।
यदि मैं श्रद्धा के स्थान पर होता, तो 'aa' के प्रति मेरे मन में निम्नलिखित भाव उत्पन्न होते:
- सहानुभूति: उसकी परिस्थितियों को समझने और उसके दुख को महसूस करने का भाव।
- सहायता की इच्छा: उसे कठिनाइयों से उबारने और उसका साथ देने की भावना।
- सम्मान: उसके संघर्ष और साहस के प्रति आदर का भाव।
- प्रेम: उसके प्रति स्नेह और अपनत्व का भाव, जो उसे प्रोत्साहित करे।
ये भाव मानवीय संवेदनाओं पर आधारित होते, जो किसी भी व्यक्ति को मुश्किल समय में सहारा दे सकते हैं।
प्रश्न 23
मैथिलीशरण गुप्त के संकलित काव्यांश में भावतत्त्व एवं कलात्मक सौन्दर्य का विश्लेषण कीजिए ।
मैथिलीशरण गुप्त के काव्यांश में भावतत्त्व और कलात्मक सौन्दर्य का गहन विश्लेषण किया जा सकता है:
भावतत्त्व: काव्यांश में जीवन की शाश्वतता, गति, और संगम का भाव व्यक्त हुआ है। कवि ने प्रकृति के विभिन्न रूपों—धारा, नभ, शशि, लहरों—के माध्यम से जीवन के निरंतर प्रवाह और अनंतता को दर्शाया है। यह भाव आशावाद और स्थिरता का संदेश देता है।
कलात्मक सौन्दर्य: कविता में अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है—'शाश्वत' शब्द की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार, 'धारा-सा' में उपमा, और 'रजत हास' में रूपक। लय और छंद का सामंजस्य काव्य को संगीतमय बनाता है। प्रतीकों (नौका-विहार) के माध्यम से गहरे दार्शनिक भाव व्यक्त किए गए हैं।
इस प्रकार, यह काव्यांश भाव और कला का उत्कृष्ट संगम है।
निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
(उत्तर सीमा लगभग 200 शब्द)
इस धारा-सा ही जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम,
शाश्वत है गति, शाश्वत संगम ।शाश्वत नभ का नीला विकास, शाश्वत शशि का यह रजत हास,
शाश्वत लघु लहरों का विलास |हे जग-जीवन के कर्णधार | चिर जन्म-मरण के आर-पार,
शाश्वत जीवन नौका-विहार ।”
सन्दर्भ: प्रस्तुत पद्यांश मैथिलीशरण गुप्त की कविता से लिया गया है, जिसमें जीवन की शाश्वतता और प्रकृति के नियमों का वर्णन है।
प्रसंग: कवि यहाँ संसार की निरंतरता और जीवन के अनंत प्रवाह को चित्रित कर रहे हैं। वे बताते हैं कि सब कुछ शाश्वत है—गति, संगम, और प्रकृति के रूप।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि संसार का क्रम धारा के समान है, जो निरंतर बहती रहती है। जीवन का उद्गम शाश्वत है, गति शाश्वत है, और संगम भी शाश्वत है। आकाश का नीला विस्तार, चाँद की चाँदनी, और छोटी लहरों का खेल—सब शाश्वत हैं। कवि संसार के जीवन के संचालकों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि जन्म और मृत्यु के पार, जीवन की नौका-विहार शाश्वत है। इसका अर्थ है कि जीवन एक अनंत यात्रा है, जो कभी समाप्त नहीं होती।
काव्यगत सौन्दर्य: इसमें 'शाश्वत' शब्द की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार है। 'धारा-सा' में उपमा, 'रजत हास' में रूपक, और 'नौका-विहार' में प्रतीक है। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और भावपूर्ण है। छंद का सामंजस्य कविता को संगीतमय बनाता है।
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प्रश्न 24
निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
(उत्तर सीमा लगभग 200 शब्द)
मिर के राज का ऐसा,
ठिन आतंक छाया है,
उठा जो शीश सकते थे,
उन्होंने सिर झुकाया है,
मगर विद्रोह की ज्वाला
जगाए कौन बैठा है ?
प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश हिंदी साहित्य के एक क्रांतिकारी कवि की रचना से लिया गया है। इसमें कवि ने अत्याचारी शासन के भय और उसके विरुद्ध जनता के मन में पल रहे विद्रोह का चित्रण किया है।
व्याख्या : कवि कहता है कि शासक का ऐसा आतंक छाया हुआ है कि जो लोग कभी सिर उठाकर चलते थे, वे भी अब डर के मारे सिर झुकाकर चलने को मजबूर हैं। शासन का भय इतना गहरा है कि सब कुछ सहन करने के बावजूद लोगों के मन में विद्रोह की ज्वाला धधक रही है। कवि प्रश्न करता है कि आखिर वह कौन है जो इस विद्रोह की आग को जगाए बैठा है? यह प्रश्न जनता के मन में छिपे क्रोध और बदले की भावना को दर्शाता है। कवि का संकेत है कि यह विद्रोह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का सामूहिक आक्रोश है जो किसी भी समय भड़क सकता है।
अथवा
(दूसरे विकल्प का पाठ स्पष्ट नहीं है।)
प्रश्न 25
रण-भेरी सुन, कह ‘विदा’ जब सैनिक पुलक रहे होंगे,
हाथों में कुंकूम-थाल लिये, कुछ जल-कण ढुलक रहे होंगे
कर्त्तव्य-प्रेम की उलझन में
पथ भूल न जाना पथिक कहीं ।
निम्नलिखित पद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
(उत्तर सीमा लगभग 200 शब्द)
मैंने राम रतन धन पायो
बसत अमोलक, दी मेरे सतगुरु, किरपा अपणायो
जनम-जनम की पूंजी पायी, जग में सबै खोवायो
खरचै नहिं चोर न लेवै, दिन-दिन वधत सवायो
सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भव सागर तरि आयो
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरखि-हरखि जस गायो ॥
सप्रसंग व्याख्या:
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश मीराबाई द्वारा रचित है। इसमें भक्त मीरा ने भगवान श्रीकृष्ण (गिरधर नागर) की भक्ति में प्राप्त आध्यात्मिक धन का वर्णन किया है।
व्याख्या: मीरा कहती हैं कि मैंने राम (भगवान) के नाम रूपी रत्न के धन को पा लिया है। यह धन अमूल्य है और मुझे मेरे सतगुरु ने अपनी कृपा करके दिया है। इस धन के मिलने से मैंने जन्म-जन्म की पूंजी (भक्ति का संचय) पा ली है, जबकि संसार के सभी भौतिक धन को मैंने खो दिया है। यह धन ऐसा है जो न तो खर्च होता है, न चोर इसे चुरा सकता है, और दिन-दिन बढ़ता ही जाता है।
मीरा आगे कहती हैं कि सतगुरु रूपी खेवटिया (नाविक) ने सत्य की नाव में बिठाकर मुझे इस भवसागर (संसार रूपी समुद्र) से पार करा दिया है। अब मैं अपने प्रभु गिरधर नागर (श्रीकृष्ण) का बार-बार हर्षित होकर गुणगान करती हूँ।
अथवा
तज्यो अरु तज्यो, पुनि लगाइ के देह
मेघ सहे सिर सीत जल, तन धूप समै जु पँचागिनि बारी
भूख सही ते रुख तरै परि, 'सुन्दरदास' दुख भारी
डासन छाड़ि के ऊपर आसन पै आसन मारी ॥
सप्रसंग व्याख्या:
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश संत सुंदरदास जी द्वारा रचित है। इसमें एक साधक द्वारा कठोर तपस्या और शारीरिक कष्ट सहने का वर्णन है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि साधक ने पहले सांसारिक सुखों को त्याग दिया, फिर शरीर को भी कष्ट देकर त्याग दिया। उसने सिर पर बादलों की वर्षा और ठंडी हवा को सहन किया, शरीर को धूप में तपाया और पंचाग्नि (चारों ओर अग्नि और ऊपर सूर्य) की तपिश को सहा। भूख सही और पेड़ों पर रहकर भारी दुख उठाए।
अंत में, साधक ने आसन (योग की मुद्रा) को छोड़कर आसन पर ही आसन मारा, अर्थात् शारीरिक साधना से ऊपर उठकर आध्यात्मिक साधना में लीन हो गया। यह कठोर तपस्या और आत्म-संयम का प्रतीक है।