RBSE Class 12th 2010 History Of Music (Compulsory)-SS-56-2010 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2010 |
| Subject | History Of Music (Compulsory)-SS-56-2010 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2010 History Of Music (Compulsory)-SS-56-2010
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Rajasthan Board Class 12th History Of Music (Compulsory)-SS-56-2010 2010 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2010
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2010
( अकादमिक )
वैकल्पिक वर्ग — ललित कला ( OPTIONAL GROUP — FINE ARTS )
संगीत का इतिहास ( अनिवार्य )
HISTORY OF MUSIC ( Compulsory )
समय — 3¼ घण्टे पूर्णांक — 70
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
Candidate must write first his/her Roll No. on the question paper compulsorily. - प्रश्न पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि / अन्तर / विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें।
If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid. - सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
All the questions are compulsory. - प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
Write the answer to each question in the given answer-book only. - जिस प्रश्न के एक से अधिक समान अंक वाले भाग हैं, उन सभी भागों का हल एक साथ सतत् लिखें।
For questions having more than one part carrying similar marks, the answers of those parts are to be written together in continuity.
No. of Questions — 7 SS—56—Hist. of Music
No. of Printed Pages — 3
मध्यकालीन युग के भारतीय संगीत का संक्षिप्त इतिहास लिखिए।
Write in short about history of the Indian music in the medieval period.
उत्तर: मध्यकालीन युग (लगभग 12वीं से 18वीं शताब्दी) में भारतीय संगीत में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इस काल में मुस्लिम शासकों के संरक्षण में संगीत का विकास हुआ। अमीर खुसरो (13वीं शताब्दी) ने ख्याल, तराना, कव्वाली जैसी शैलियों का विकास किया और सितार, तबला जैसे वाद्य यंत्रों का आविष्कार किया। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने संगीत को जन-जन तक पहुँचाया। मीराबाई, तुलसीदास, सूरदास जैसे संतों ने भजनों की रचना की। मुगल काल में तानसेन (अकबर के दरबार में) ने रागों को नई ऊँचाई दी। इस युग में राग-रागिनी पद्धति का विकास हुआ और संगीत ग्रंथों की रचना हुई।
“राग-रागिनी पद्धति” का विस्तार से वर्णन कीजिए।
Describe in detail the 'Rag-Ragini system'.
उत्तर: राग-रागिनी पद्धति भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक प्राचीन वर्गीकरण प्रणाली है। इसके अनुसार, रागों को पुरुष (राग) और स्त्री (रागिनी) के रूप में विभाजित किया गया। प्रमुख राग (पुरुष) 6 माने गए हैं—भैरव, मालकोश, हिंडोल, दीपक, श्री, मेघ। प्रत्येक राग की 5 रागिनियाँ (स्त्री) होती हैं, इस प्रकार कुल 30 रागिनियाँ बनती हैं। इसके अलावा, राग और रागिनियों के पुत्र (उपराग) भी माने गए हैं। यह पद्धति मध्यकालीन संगीत ग्रंथों (जैसे संगीत दर्पण, संगीत रत्नाकर) में विकसित हुई। हालाँकि, आधुनिक युग में पंडित भातखंडे ने इसे थाट प्रणाली से बदल दिया, लेकिन राग-रागिनी पद्धति ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय संगीत में क्या विशेष प्रगति हुई है? अपना लेख लिखिए।
Write about the development of music in India after independence. Write in your way.
उत्तर: स्वतंत्रता प्राप्ति (1947) के बाद भारतीय संगीत में अनेक विशेष प्रगतियाँ हुईं:
- संस्थागत विकास: सरकार ने संगीत नाटक अकादमी (1952), राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, और अनेक संगीत विश्वविद्यालयों की स्थापना की।
- शिक्षा का विस्तार: विश्वविद्यालयों में संगीत को एक विषय के रूप में मान्यता मिली, जिससे शास्त्रीय और लोक संगीत का अध्ययन बढ़ा।
- प्रसारण माध्यम: आकाशवाणी और दूरदर्शन ने संगीत को घर-घर पहुँचाया।
- फ्यूजन और प्रयोग: शास्त्रीय संगीत का पश्चिमी संगीत से मेल (फ्यूजन) हुआ, जैसे रविशंकर और अली अकबर खान के प्रयोग।
- लोक संगीत का संरक्षण: लोक गीतों और वाद्य यंत्रों को संरक्षित करने के प्रयास हुए।
- अंतर्राष्ट्रीय पहचान: भारतीय संगीतकारों ने विश्व मंच पर पहचान बनाई।
इस प्रकार, स्वतंत्रता के बाद भारतीय संगीत ने नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं।
वीणा के तार पर शुद्ध स्वरों के स्थानों के विषय में पंडित श्रीनिवास तथा पंडित भातखंडे के विचारों का वर्णन कीजिए।
Describe the views of Pt. Srinivas and Pt. Bhatkhande about the places of Shuddha Swaras on the string of a Veena.
उत्तर: वीणा के तार पर शुद्ध स्वरों के स्थानों को लेकर दो विद्वानों के भिन्न विचार हैं:
- पंडित श्रीनिवास के विचार: उन्होंने वीणा के तार पर 22 श्रुतियों के आधार पर स्वर स्थान निर्धारित किए। उनके अनुसार, शुद्ध स्वरों (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) के बीच निश्चित श्रुति अंतराल होते हैं। उन्होंने स्वरों को 22 श्रुतियों में विभाजित करके उनके स्थान बताए।
- पंडित भातखंडे के विचार: उन्होंने शुद्ध स्वरों के स्थानों को 12 स्वरों (सप्तक) के आधार पर सरल बनाया। उन्होंने वीणा के तार पर स्वरों के स्थानों को मापकर (जैसे सा से रे तक की दूरी) निर्धारित किया। भातखंडे ने शुद्ध स्वरों को 7 मुख्य स्वरों में रखा और विकृत स्वरों (कोमल, तीव्र) को अलग स्थान दिया।
दोनों विद्वानों ने वीणा के तार पर स्वर स्थानों को वैज्ञानिक रूप से समझाने का प्रयास किया, लेकिन श्रीनिवास श्रुति-आधारित थे जबकि भातखंडे स्वर-आधारित।
चैती, लावणी और सावन गीत किन-किन विशेष अवसरों पर गाए जाते हैं? इनमें से किसी एक गीत के प्रकार का सम्पूर्ण वर्णन कीजिए।
Geet like Chaiti, Lavani and Sawan are sung on which different ceremonies in India? Describe in detail one of the kind of geet.
उत्तर: ये गीत विभिन्न अवसरों पर गाए जाते हैं:
- चैती: चैत मास (मार्च-अप्रैल) में, विशेषकर होली और वसंत ऋतु में गाया जाता है। यह उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकप्रिय है।
- लावणी: महाराष्ट्र में, विशेषकर शादी-विवाह, त्योहारों और नाट्य प्रस्तुतियों में गाया जाता है। यह तेज लय और नृत्य के साथ प्रस्तुत होता है।
- सावन गीत: सावन मास (जुलाई-अगस्त) में, बारिश के मौसम में गाया जाता है। यह प्रेम, विरह और प्रकृति से संबंधित होता है।
चैती गीत का विस्तृत वर्णन: चैती गीत चैत मास में गाया जाने वाला एक लोक गीत है। यह मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में प्रचलित है। इसकी विशेषताएँ:
- समय: चैत मास (मार्च-अप्रैल) में, फसल कटाई और वसंत ऋतु के अंत में।
- विषय: प्रेम, विरह, प्रकृति की सुंदरता, और होली के रंग।
- शैली: यह धीमी लय में शुरू होता है और धीरे-धीरे तेज होता है। इसमें ढोलक, हारमोनियम और मंजीरे का साथ होता है।
- प्रकार: चैती के दो मुख्य प्रकार हैं—एक जो होली से संबंधित है (रंग भरी चैती) और दूसरा जो विरह से संबंधित है (विरह चैती)।
- प्रसिद्ध गायक: पंडित छन्नूलाल मिश्रा, शोभा गुर्टू जैसे कलाकारों ने चैती को लोकप्रिय बनाया।
चैती गीत भारतीय लोक संगीत की एक समृद्ध परंपरा है।
प्रश्न 6
“भारतीय संगीत में नवरस” विषय पर अपने विचार लिखिए।
Write down your views on the subject “Navras in Indian music.”
उत्तर: भारतीय संगीत में नवरस (नौ रस) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। रस का अर्थ है आनंद या भाव का चरमोत्कर्ष। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार, संगीत और नृत्य के माध्यम से दर्शकों में विभिन्न भावों का संचार होता है। नवरस निम्नलिखित हैं:
- शृंगार रस: प्रेम और सौंदर्य का भाव।
- हास्य रस: हँसी और मनोरंजन का भाव।
- करुण रस: शोक और दुख का भाव।
- रौद्र रस: क्रोध और आक्रोश का भाव।
- वीर रस: साहस और उत्साह का भाव।
- भयानक रस: भय और आतंक का भाव।
- वीभत्स रस: घृणा और अरुचि का भाव।
- अद्भुत रस: आश्चर्य और विस्मय का भाव।
- शांत रस: शांति और समता का भाव।
संगीत में रागों, तालों और गायन शैलियों के माध्यम से इन रसों की अभिव्यक्ति होती है। उदाहरण के लिए, राग यमन शृंगार रस को, राग भैरवी शांत रस को, और राग दरबारी कनाड़ा करुण रस को उजागर करता है। इस प्रकार, नवरस भारतीय संगीत की आत्मा हैं, जो श्रोता को भावनात्मक और आध्यात्मिक आनंद प्रदान करते हैं।
प्रश्न 7
पं. श्रीनिवास तथा मानसिंह तोमर के संगीत के क्षेत्र में योगदान की चर्चा कीजिए।
Discuss the contribution of Pt. Srinivas and Mansingh Tomar in the field of music.
उत्तर:
पं. श्रीनिवास (Pt. Srinivas): पं. श्रीनिवास भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक प्रसिद्ध विद्वान और वीणा वादक थे। उन्होंने मुख्यतः दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत परंपरा में योगदान दिया। उनके प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं:
- उन्होंने वीणा वादन को एक नई ऊँचाई प्रदान की और इस वाद्य के माध्यम से रागों की गहन अभिव्यक्ति की।
- वे संगीत शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी थे और उन्होंने अनेक शिष्यों को प्रशिक्षित किया।
- उनके द्वारा रचित कई कृतियाँ और राग विकास की तकनीकें आज भी प्रासंगिक हैं।
मानसिंह तोमर (Mansingh Tomar): मानसिंह तोमर मध्यकालीन भारत के एक प्रसिद्ध शासक और संगीत प्रेमी थे, जिन्होंने ग्वालियर राज्य पर शासन किया। उनका संगीत के क्षेत्र में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है:
- उन्होंने “मानकुतूहल” नामक एक प्रसिद्ध संगीत ग्रंथ की रचना की, जिसमें रागों, तालों और गायन शैलियों का विस्तृत वर्णन है।
- वे ध्रुपद गायन शैली के संरक्षक थे और उन्होंने इस शैली को राजकीय संरक्षण प्रदान किया।
- उनके दरबार में अनेक विद्वान और कलाकार संगीत साधना में लीन रहते थे, जिससे ग्वालियर घराने की नींव पड़ी।
इस प्रकार, पं. श्रीनिवास ने वादन और शिक्षा के क्षेत्र में, जबकि मानसिंह तोमर ने सैद्धांतिक और संरक्षण के क्षेत्र में भारतीय संगीत को समृद्ध किया।