RBSE Class 12th 2010 Philosophy-SS-28-1-2010 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2010 |
| Subject | Philosophy-SS-28-1-2010 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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How to practise with this question paper
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RBSE Class 12th 2010 Philosophy-SS-28-1-2010
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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-28-1-2010 2010 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2010
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2010
वैकल्पिक वर्ग I (OPTIONAL GROUP I – Humanities)
दर्शन शास्त्र – प्रथम पत्र
(PHILOSOPHY – First Paper)
समय : 3 घण्टे पूर्णांक : 60
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
Candidate must write first his/her Roll No. on the question paper compulsorily. - प्रश्न पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि/अन्तर/विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें।
If there is any error/difference/contradiction in Hindi and English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid. - प्रश्न पत्र के दोनों खण्ड करने अनिवार्य हैं। खण्ड 'ब' के सभी प्रश्नों में आंतरिक विकल्प हैं।
Both the Sections of the question paper are compulsory. There are internal choices in all the questions of Section B. - प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
Write the answer to each question in the given answer-book only.
SS–28–Philos. I SS-554 [ Turn over
खण्ड 'अ' (Section 'A')
निम्नलिखित में से किन्हीं पाँच पर संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए :
Write short notes on any five of the following: 5×4=20
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(i) कर्म का सिद्धान्त / Law of Karma
कर्म का सिद्धान्त भारतीय दर्शन का मूल आधार है। इसके अनुसार प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है। यह सिद्धान्त जन्म-जन्मान्तरों में आत्मा की यात्रा को नियंत्रित करता है। अच्छे कर्मों से सुख और बुरे कर्मों से दुःख मिलता है। यह नैतिक व्यवस्था का आधार है और मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति जागरूक बनाता है।
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(ii) जीवात्मा / Individual soul (Jivatma)
जीवात्मा चेतन तत्त्व है जो शरीर में निवास करता है। यह अमर, अविनाशी और शाश्वत है। जीवात्मा ही ज्ञान, इच्छा और क्रिया का कर्ता है। यह कर्मों के अनुसार शरीर धारण करती है और मोक्ष प्राप्ति तक जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधी रहती है। विभिन्न दर्शनों में जीवात्मा के स्वरूप पर भिन्न-भिन्न मत हैं।
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(iii) असम्प्रज्ञात समाधि / Asampragyata Samadhi
पतंजलि योग दर्शन में समाधि के दो भेद हैं - सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। असम्प्रज्ञात समाधि में चित्त की सभी वृत्तियाँ पूर्णतः निरुद्ध हो जाती हैं। इसमें किसी विषय का ज्ञान नहीं रहता, केवल संस्कार मात्र शेष रहते हैं। यह समाधि की सर्वोच्च अवस्था है जहाँ पुरुष अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।
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(iv) निर्वाण / Nirvana
निर्वाण बौद्ध दर्शन का परम लक्ष्य है। इसका अर्थ है तृष्णा का पूर्ण क्षय और दुःख से मुक्ति। निर्वाण में जन्म-मृत्यु के चक्र का अंत हो जाता है। यह अवस्था सभी प्रकार के बंधनों और क्लेशों से मुक्त होती है। बुद्ध ने निर्वाण को शांति, आनंद और मोक्ष की परम अवस्था बताया है।
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(v) बंधन / Bondage
बंधन का अर्थ है आत्मा का संसार में बंधा रहना। यह अज्ञान, काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि के कारण होता है। जीव अपने कर्मों के अनुसार बंधन में फँसता है और जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमता रहता है। बंधन से मुक्ति ही मोक्ष है। विभिन्न दर्शनों में बंधन के कारण और मुक्ति के उपाय बताए गए हैं।
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(vi) निष्काम कर्म / Nishkama Karma
निष्काम कर्म गीता का प्रमुख उपदेश है। इसका अर्थ है फल की इच्छा न रखते हुए कर्तव्य का पालन करना। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निष्काम कर्म का उपदेश दिया। इसमें कर्म करना आवश्यक है, लेकिन फल की आसक्ति नहीं होनी चाहिए। यह मनुष्य को बंधन से मुक्त करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
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(vii) पुरुष / Purusa
सांख्य दर्शन में पुरुष चेतन तत्त्व है। यह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभाव का है। पुरुष कर्ता नहीं, केवल द्रष्टा है। यह प्रकृति से भिन्न है और उसके विकारों से प्रभावित नहीं होता। पुरुष की अनुभूति ही मोक्ष है। सांख्य में अनेक पुरुष माने गए हैं, प्रत्येक जीव में एक पुरुष होता है।
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(viii) अनुमान के प्रकार / Kinds of inference
न्याय दर्शन में अनुमान के तीन प्रकार हैं - (1) पूर्ववत् - कारण से कार्य का अनुमान, (2) शेषवत् - कार्य से कारण का अनुमान, (3) सामान्यतोदृष्ट - सामान्य नियम से विशेष का अनुमान। अनुमान प्रमाण का एक महत्वपूर्ण साधन है जो व्याप्ति पर आधारित होता है।
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(ix) न्याय में अलौकिक प्रत्यक्ष / Extra-ordinary perception in Nyaya
न्याय दर्शन में अलौकिक प्रत्यक्ष तीन प्रकार का है - (1) सामान्यलक्षण - एक वस्तु देखकर सभी समान वस्तुओं का ज्ञान, (2) ज्ञानलक्षण - एक इंद्रिय के ज्ञान से दूसरे इंद्रिय के विषय का ज्ञान, (3) योगज - योग साधना से उत्पन्न अलौकिक ज्ञान। यह सामान्य प्रत्यक्ष से भिन्न है।
-
(x) पुद्गल / Pudgala (matter)
जैन दर्शन में पुद्गल द्रव्य का एक भेद है। यह अचेतन, रूपी और स्पर्शनीय है। पुद्गल के परमाणु और स्कंध दो भेद हैं। यह रूप, रस, गंध और स्पर्श से युक्त होता है। कर्म पुद्गल के रूप में आत्मा से बंधते हैं। पुद्गल का क्षय ही मोक्ष का मार्ग है।
खण्ड 'ब' (Section 'B')
निर्देश : सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
Instruction : All questions are compulsory.
1. गीता के तीनों योग — कर्म, ज्ञान, भक्ति पर निबंध लिखिए।
अथवा / OR
कर्म का सिद्धान्त भारतीय दर्शन पर निराशावादी होने का प्रत्यारोप का प्रत्युत्तर कैसे देता है? समझाइए।
गीता के तीन योग — कर्म, ज्ञान, भक्ति
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को तीन प्रमुख योगों का उपदेश दिया है — कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग। ये तीनों योग मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाने वाले मार्ग हैं।
कर्म योग: कर्म योग का अर्थ है फल की आसक्ति के बिना कर्तव्य का पालन करना। गीता में कहा गया है — "मा फलेषु कदाचन" अर्थात फल की इच्छा न रखते हुए कर्म करो। निष्काम कर्म ही कर्म योग का सार है। यह मनुष्य को बंधन से मुक्त करता है।
ज्ञान योग: ज्ञान योग में आत्मा और परमात्मा के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया जाता है। इसमें यह समझाया गया है कि आत्मा अमर, अविनाशी और शाश्वत है। शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं। ज्ञान योग से अज्ञान का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भक्ति योग: भक्ति योग में ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव है। गीता में कहा गया है कि भक्ति से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है। सच्ची भक्ति में अहंकार का त्याग और ईश्वर में पूर्ण समर्पण होता है।
ये तीनों योग परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। कर्म योग से चित्त शुद्ध होता है, ज्ञान योग से आत्मज्ञान प्राप्त होता है और भक्ति योग से ईश्वर प्राप्ति होती है। गीता का संदेश है कि मनुष्य इन तीनों मार्गों से अपनी साधना कर सकता है।
कर्म का सिद्धान्त और निराशावाद का प्रत्युत्तर
भारतीय दर्शन पर कभी-कभी निराशावादी होने का आरोप लगाया जाता है, क्योंकि यह संसार को दुःखमय बताता है। कर्म का सिद्धान्त इस आरोप का प्रभावी प्रत्युत्तर प्रस्तुत करता है।
कर्म सिद्धान्त का आशावादी पक्ष: कर्म का सिद्धान्त यह बताता है कि मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं निर्माता है। यदि वह अच्छे कर्म करेगा तो सुख प्राप्त करेगा और बुरे कर्म करेगा तो दुःख भोगेगा। इस प्रकार मनुष्य के हाथ में अपना भविष्य बनाने की शक्ति है। यह निराशावाद नहीं, बल्कि आशावाद है।
नैतिक उत्तरदायित्व: कर्म सिद्धान्त मनुष्य को नैतिक रूप से उत्तरदायी बनाता है। यह बताता है कि मनुष्य अपने कर्मों के लिए स्वयं जिम्मेदार है। यह उसे सक्रिय और प्रयत्नशील बनाता है।
मोक्ष की संभावना: भारतीय दर्शन संसार को दुःखमय बताने के साथ-साथ मोक्ष का मार्ग भी बताता है। कर्म सिद्धान्त के अनुसार सही कर्मों और ज्ञान से मनुष्य बंधन से मुक्त हो सकता है। यह आशावाद का सबसे बड़ा प्रमाण है।
निष्कर्ष: कर्म का सिद्धान्त भारतीय दर्शन को निराशावादी नहीं, बल्कि यथार्थवादी और आशावादी बनाता है। यह मनुष्य को उसकी शक्ति और उत्तरदायित्व का बोध कराता है तथा मोक्ष की संभावना प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 2
बौद्ध दर्शन के भव-चक्र का विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिए।
अथवा
जैन दर्शन के अनुसार जीव की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
Explain in detail the twelve links or Bhava-Chakra of Buddhism.
OR
According to Jain Philosophy, Describe the chief characteristic features of Jiva.
उत्तर (बौद्ध दर्शन का भव-चक्र):
बौद्ध दर्शन में भव-चक्र (भवचक्र) को संसार के दुःखों के चक्र के रूप में समझाया गया है। यह बारह अंगों (द्वादश निदान) से मिलकर बना है, जो जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र को दर्शाते हैं। ये बारह अंग एक-दूसरे से श्रृंखलाबद्ध रूप से जुड़े हुए हैं। इनका विवरण इस प्रकार है:
- अविद्या (Ignorance): यह सबसे पहला कारण है। अविद्या का अर्थ है सत्य (चार आर्य सत्य) के प्रति अज्ञानता।
- संस्कार (Mental Formations): अविद्या के कारण मन में कर्म-संस्कार (वासना) उत्पन्न होते हैं, जो भविष्य के जीवन को निर्धारित करते हैं।
- विज्ञान (Consciousness): संस्कारों के कारण पुनर्जन्म लेने वाली चेतना (विज्ञान) उत्पन्न होती है।
- नाम-रूप (Mind and Body): विज्ञान के साथ नाम (मानसिक अवयव) और रूप (शारीरिक अवयव) का संयोग होता है।
- षडायतन (Six Sense Organs): नाम-रूप से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन (छठी इन्द्रिय) विकसित होते हैं।
- स्पर्श (Contact): इन्द्रियों का विषयों के साथ संपर्क (स्पर्श) होता है।
- वेदना (Sensation): स्पर्श से सुख, दुःख या उदासीनता की अनुभूति (वेदना) उत्पन्न होती है।
- तृष्णा (Craving): वेदना से तृष्णा (इच्छा) उत्पन्न होती है, जो सुख को पकड़ने और दुःख को दूर करने की चाह रखती है।
- उपादान (Clinging): तृष्णा के बल पर उपादान (आसक्ति) उत्पन्न होती है, जो वस्तुओं और भावनाओं से चिपके रहने की प्रवृत्ति है।
- भव (Becoming): उपादान से भव (नए जन्म की संभावना) उत्पन्न होती है, जो पुनर्जन्म का कारण बनती है।
- जाति (Birth): भव से जाति (जन्म) होता है।
- जरा-मरण (Old Age and Death): जन्म के बाद जरा (बुढ़ापा) और मरण (मृत्यु) अनिवार्य रूप से आते हैं।
इस प्रकार, यह चक्र अविद्या से शुरू होकर जरा-मरण तक चलता है और फिर पुनः अविद्या से जुड़ जाता है। बौद्ध दर्शन का लक्ष्य इस चक्र को तोड़ना और निर्वाण प्राप्त करना है।
उत्तर (जैन दर्शन के अनुसार जीव की विशेषताएँ):
जैन दर्शन में जीव (आत्मा) को चेतन तत्व माना गया है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- चेतना (Consciousness): जीव का मुख्य गुण चेतना है। यह ज्ञान, दर्शन और आनंद से युक्त होता है।
- अमूर्तता (Non-corporeality): जीव अमूर्त है, अर्थात इसका कोई भौतिक रूप नहीं है। यह पुद्गल (पदार्थ) से भिन्न है।
- कर्तृत्व और भोक्तृत्व (Agency and Enjoyment): जीव अपने कर्मों का कर्ता और उनके फलों का भोक्ता है। यह कर्मों के बंधन और मोक्ष के लिए उत्तरदायी है।
- अनादि और अनंत (Eternal): जीव अनादि (जिसका कोई आदि नहीं) और अनंत (जिसका कोई अंत नहीं) है। यह संसार में अनंत काल से भ्रमण कर रहा है।
- प्रमाण और अप्रमाण (Finite and Infinite): संसारी अवस्था में जीव का ज्ञान सीमित (प्रमाण) होता है, जबकि मुक्त अवस्था में यह अनंत ज्ञान (केवल ज्ञान) प्राप्त कर लेता है।
- सुख-दुःख का अनुभव (Experience of Pleasure and Pain): जीव अपने कर्मों के अनुसार सुख और दुःख का अनुभव करता है।
- अनेकता (Plurality): जैन दर्शन में अनेक जीवों का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। प्रत्येक जीव स्वतंत्र और भिन्न है।
जैन दर्शन के अनुसार, जीव का लक्ष्य कर्मों के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष (सिद्धत्व) प्राप्त करना है।
प्रश्न 3
प्रकृति के स्वरूप एवं अस्तित्व के लिए प्रमाणों का विवेचन कीजिए।
अथवा
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः को समझाइए।
Describe the nature of Prakriti and proofs for its existence.
OR
Yoga means deliverance from the various Chittavrittis. Explain.
उत्तर (प्रकृति का स्वरूप और प्रमाण):
प्रकृति का स्वरूप: सांख्य दर्शन के अनुसार, प्रकृति जड़ जगत का मूल कारण है। यह तीन गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) से बनी है। प्रकृति नित्य, अनादि, अव्यक्त (अप्रकट) और सर्वव्यापी है। यह पुरुष (चेतन तत्व) के साथ संयोग करके सृष्टि की रचना करती है।
प्रकृति के अस्तित्व के प्रमाण:
- अनुमान प्रमाण: सभी वस्तुएँ परिणामी (बदलने वाली) हैं, इसलिए उनका कोई न कोई मूल कारण होना चाहिए। यह मूल कारण प्रकृति है।
- आगम प्रमाण: वेदों और उपनिषदों में प्रकृति का उल्लेख मिलता है, जो इसके अस्तित्व का प्रमाण है।
- सामान्य अनुभव: संसार में हर वस्तु में तीन गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) का संतुलन देखा जाता है, जो प्रकृति की उपस्थिति को दर्शाता है।
- कार्य-कारण नियम: प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण होता है। जगत के सभी कार्यों का मूल कारण प्रकृति है।
उत्तर (योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः):
पतंजलि योग दर्शन के अनुसार, "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" का अर्थ है कि योग चित्त की वृत्तियों (मानसिक गतिविधियों) का निरोध (रोकना) है। चित्त की पाँच प्रमुख वृत्तियाँ होती हैं:
- प्रमाण (Right Knowledge): प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम से प्राप्त सही ज्ञान।
- विपर्यय (Wrong Knowledge): गलत या भ्रामक ज्ञान।
- विकल्प (Imagination): शब्दों या कल्पना पर आधारित ज्ञान, जो वास्तविक नहीं है।
- निद्रा (Sleep): मानसिक गतिविधियों का अभाव, जो एक प्रकार की वृत्ति है।
- स्मृति (Memory): पूर्व अनुभवों का स्मरण।
योग का उद्देश्य इन वृत्तियों को नियंत्रित करके चित्त को शांत और स्थिर करना है। जब चित्त की सभी वृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं, तब साधक को आत्म-साक्षात्कार (समाधि) प्राप्त होता है। यही योग का अंतिम लक्ष्य है।
प्रश्न 4
अनुमान के स्वरूप व विभिन्न प्रकारों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
न्याय दर्शन की ज्ञान-मीमांसा पर संक्षिप्त निबंध लिखें।
Throw light on the nature and various kinds of inference.
OR
Write a brief essay on epistemology of Nyaya Philosophy.
उत्तर (अनुमान का स्वरूप और प्रकार):
अनुमान का स्वरूप: न्याय दर्शन में अनुमान (Inference) को प्रमाण का एक महत्वपूर्ण साधन माना गया है। अनुमान का अर्थ है किसी व्याप्ति (सामान्य नियम) के आधार पर अप्रत्यक्ष वस्तु का ज्ञान प्राप्त करना। उदाहरण के लिए, धुआँ देखकर आग का अनुमान लगाना। अनुमान में तीन अंग होते हैं: पक्ष (जिसके बारे में अनुमान किया जाए), साध्य (जिसे सिद्ध करना है), और हेतु (कारण या चिह्न)।
अनुमान के प्रकार: न्याय दर्शन में अनुमान को मुख्यतः दो प्रकारों में बाँटा गया है:
- स्वार्थानुमान (Inference for oneself): जब कोई व्यक्ति स्वयं किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है, बिना दूसरों को बताए। यह मानसिक प्रक्रिया है।
- परार्थानुमान (Inference for others): जब अनुमान को दूसरों को समझाने के लिए प