RBSE Class 12th 2014 Philosophy-SS-85-2014 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2014 |
| Subject | Philosophy-SS-85-2014 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2014 Philosophy-SS-85-2014
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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-85-2014 2014 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2014
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2014
दर्शनशास्त्र
PHILOSOPHY
समय : 3 घण्टे 15 मिनट | पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्नपत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
Candidate must write first his / her Roll No. on the question paper compulsorily. - सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
All the questions are compulsory. - प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
Write the answer to each question in the given answer-book only. - जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
For questions having more than one part, the answers to those parts are to be written together in continuity. - प्रश्न-पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि / अन्तर / विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें।
If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.
No. of Questions — 30 | No. of Printed Pages — 7
Roll No. : ____________________
SS—85—PHILOSOPHY | [ SS - 5585 ] | [ Turn over ]
खण्ड - अ / SECTION - A
| खण्ड | प्रश्न संख्या | प्रति प्रश्न अंक | उत्तर की शब्द सीमा |
|---|---|---|---|
| अ (A) | 1 – 10 | 1 | 20 शब्द |
| ब (B) | 11 – 20 | 2 | 50 शब्द |
| स (C) | 21 – 30 | 3 | 50 शब्द |
प्रश्न संख्या 21 से 30 तक में आंतरिक विकल्प हैं।
There are internal choices for Q. Nos. 21 to 30.
निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिए :
Define each of the following :
-
ऋत (Rta)
परिभाषा : ऋत का अर्थ है ब्रह्मांडीय नैतिक व्यवस्था या सत्य का शाश्वत नियम। यह वैदिक दर्शन में प्रकृति और नैतिकता के नियमों को संदर्भित करता है जो ब्रह्मांड को संचालित करते हैं।
Definition : Rta refers to the cosmic moral order or the eternal law of truth. In Vedic philosophy, it denotes the laws of nature and morality that govern the universe.
-
स्वधर्म (Svadharma)
परिभाषा : स्वधर्म का अर्थ है व्यक्ति का अपना कर्तव्य या धर्म, जो उसकी जाति, वर्ण, आश्रम और स्वभाव के अनुसार निर्धारित होता है। गीता के अनुसार, पराये धर्म से अच्छा अपना धर्म ही है, भले ही वह दोषपूर्ण क्यों न हो।
Definition : Svadharma means one's own duty or dharma, determined according to one's caste, varna, ashrama, and nature. According to the Gita, one's own dharma, even if imperfect, is better than another's dharma.
-
प्रकृति (Prakriti)
परिभाषा : सांख्य दर्शन में प्रकृति मूल प्रकृति या जड़ जगत का मूल कारण है। यह तीन गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) से युक्त अव्यक्त तत्त्व है, जिससे समस्त भौतिक जगत की उत्पत्ति होती है।
Definition : In Samkhya philosophy, Prakriti is the primordial nature or the root cause of the material world. It is an unmanifest principle comprising three gunas (sattva, rajas, tamas), from which the entire physical universe evolves.
-
अनेकान्तवाद (Anekantavada)
परिभाषा : जैन दर्शन का सिद्धांत है कि वास्तविकता अनेक पहलुओं वाली है और किसी एक दृष्टिकोण से पूर्ण सत्य नहीं जाना जा सकता। यह सापेक्ष बहुलवाद (relative pluralism) का सिद्धांत है।
Definition : Anekantavada is the Jain doctrine that reality has many aspects and cannot be fully known from a single viewpoint. It is the principle of relative pluralism.
-
समवाय पदार्थ (Samvaya Padartha)
परिभाषा : वैशेषिक दर्शन में समवाय एक अविभाज्य संबंध (inseparable relation) है जो दो पदार्थों के बीच स्थायी रूप से विद्यमान रहता है, जैसे गुण और द्रव्य का संबंध, या कारण और कार्य का संबंध।
Definition : In Vaisheshika philosophy, Samvaya is an inseparable relation that permanently exists between two substances, such as the relation between quality and substance, or cause and effect.
-
समानान्तरवाद (Parallelism)
परिभाषा : समानान्तरवाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जो मानता है कि मानसिक और भौतिक घटनाएँ समानांतर रूप से घटित होती हैं, बिना एक-दूसरे को प्रभावित किए। यह द्वैतवाद का एक रूप है, जिसे स्पिनोज़ा और लाइबनिज़ जैसे दार्शनिकों ने प्रतिपादित किया।
Definition : Parallelism is a philosophical doctrine holding that mental and physical events occur in parallel without influencing each other. It is a form of dualism, advocated by philosophers like Spinoza and Leibniz.
खण्ड-ब / SECTION - B
7. संशयवाद (Scepticism) – ह्यूम (Hume)
संशयवाद एक दार्शनिक दृष्टिकोण है जो ज्ञान की संभावना पर संदेह करता है। ह्यूम के अनुसार, मनुष्य अपने अनुभवों से परे किसी भी वस्तु के अस्तित्व या कार्य-कारण संबंध को निश्चित रूप से नहीं जान सकता। वह कहते हैं कि हम केवल आदत या संस्कार के कारण कार्य-कारण संबंध मान लेते हैं, जबकि वास्तव में इसका कोई तार्किक प्रमाण नहीं है।
8. आकारिक कारण (Formal cause)
अरस्तू के अनुसार, आकारिक कारण किसी वस्तु का वह स्वरूप या सार है जो उसे वह बनाता है जो वह है। यह वस्तु की परिभाषा या आदर्श रूप को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, मूर्ति का आकारिक कारण उसका डिज़ाइन या रूप है।
9. संवेदन (Sensation)
संवेदन इंद्रियों द्वारा बाह्य वस्तुओं के गुणों का प्रत्यक्ष अनुभव है। यह ज्ञान का प्रारंभिक स्रोत है, जिसमें हम रंग, गंध, स्वाद, स्पर्श और ध्वनि जैसे मूल गुणों को ग्रहण करते हैं।
10. जल प्रदूषण (Water pollution)
जल प्रदूषण का अर्थ है जल स्रोतों (नदियों, झीलों, भूजल) में हानिकारक पदार्थों के मिलने से जल की गुणवत्ता का बिगड़ना। यह मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है।
11. निष्काम कर्म को समझाइये। (Explain Nishkama Karma.)
निष्काम कर्म का अर्थ है फल की इच्छा न रखते हुए कर्तव्य का पालन करना। गीता के अनुसार, व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी व्यक्तिगत लाभ या फल की आकांक्षा के करना चाहिए। यह कर्मयोग का मूल सिद्धांत है, जो आसक्ति रहित होकर कर्म करने पर बल देता है। इससे मन शुद्ध होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
12. लोकसंग्रह से आप क्या समझते हैं? (What do you understand by Lok-samgraha?)
लोकसंग्रह का अर्थ है समाज के कल्याण और व्यवस्था के लिए कार्य करना। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि महापुरुषों को लोकसंग्रह के लिए कर्म करना चाहिए, ताकि सामान्य लोग उनका अनुसरण करें और समाज में व्यवस्था बनी रहे। यह सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक आदर्श का प्रतीक है।
13. प्रतीत्य समुत्पाद क्या है? समझाइये। (What is Pratitya samutpada? Explain.)
प्रतीत्य समुत्पाद बौद्ध दर्शन का मूल सिद्धांत है, जिसका अर्थ है "कारणों के आधार पर उत्पन्न होना"। इसके अनुसार, सभी घटनाएँ और वस्तुएँ परस्पर कारण-कार्य संबंधों से उत्पन्न होती हैं। कोई भी वस्तु स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं आती। यह सिद्धांत दुःख के कारणों और निर्वाण के मार्ग को समझाने के लिए प्रयुक्त होता है। इसे बारह अंगों (निदानों) की श्रृंखला के रूप में समझाया जाता है।
14. पुरुष की अनेकता के सिद्धान्त को समझाइये। (Explain the theory of plurality of Purusha.)
सांख्य दर्शन के अनुसार, पुरुष (चेतन तत्व) अनेक हैं, एक नहीं। प्रत्येक जीव में एक अलग पुरुष होता है। यह बहुत्व का सिद्धांत इसलिए आवश्यक है ताकि जन्म, मृत्यु, सुख-दुःख आदि के विभिन्न अनुभवों की व्याख्या की जा सके। यदि पुरुष एक होता, तो सभी जीवों के अनुभव समान होते। पुरुष की अनेकता ही व्यक्तिगत चेतना और विविधता को स्पष्ट करती है।
15. निर्गुण ब्रह्म से क्या तात्पर्य है? समझाइये। (What is the meaning of Nirguna Brahman? Explain.)
निर्गुण ब्रह्म का अर्थ है वह परम सत्य जो सभी गुणों, रूपों और सीमाओं से परे है। अद्वैत वेदांत के अनुसार, ब्रह्म निराकार, निर्विकार, अद्वितीय और अवर्णनीय है। यह सगुण ब्रह्म (ईश्वर) से भिन्न है, जिसमें गुण और रूप कल्पित किए जाते हैं। निर्गुण ब्रह्म को केवल ज्ञान और ध्यान के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है।
16. लाइबनिज के पूर्व स्थापित सामंजस्य के प्रत्यय को समझाइये। (Explain the concept of pre-established harmony of Leibnitz.)
लाइबनिज के अनुसार, संसार में प्रत्येक मोनैड (आत्मिक इकाई) स्वतंत्र रूप से कार्य करता है, फिर भी उनमें एक पूर्व-स्थापित सामंजस्य है। ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में ही सभी मोनैडों की गतिविधियों को इस प्रकार समायोजित कर दिया कि वे एक-दूसरे के साथ सामंजस्य में रहें। यह सिद्धांत बताता है कि शरीर और आत्मा के बीच का संबंध भी इसी सामंजस्य के कारण है, न कि किसी पारस्परिक प्रभाव के कारण।
7. कारणता का अनुसरण सिद्धान्त क्या है ? समझाइये |
What is the entailment theory of causation ? Explain.
कारणता का अनुसरण सिद्धान्त (Entailment Theory of Causation): यह सिद्धान्त कारण और कार्य के बीच तार्किक अनिवार्यता पर बल देता है। इसके अनुसार, कारण और कार्य के बीच एक तार्किक सम्बन्ध होता है, जहाँ कारण से कार्य का अनुसरण (entailment) होता है। दूसरे शब्दों में, यदि कारण घटित होता है, तो कार्य का घटित होना तार्किक रूप से अनिवार्य है। यह सिद्धान्त डेविड ह्यूम के कारणता के विश्लेषण की प्रतिक्रिया में विकसित हुआ, जो कारणता को केवल नियमित संयोग मानता था। अनुसरण सिद्धान्त के अनुसार, कारणता केवल नियमितता नहीं, बल्कि एक तार्किक सम्बन्ध है।
8. बर्कले के “दृष्टि ही सत् है” की व्याख्या कीजिये ।
Explain Berkeley's ‘esse est percipii’.
बर्कले का सिद्धान्त "अस्तित्व का अर्थ ग्रहण किया जाना है" (Esse est Percipi): जॉर्ज बर्कले के अनुसार, किसी वस्तु का अस्तित्व उसके ग्रहण किए जाने (perception) पर निर्भर करता है। उनका कहना है कि "अस्तित्व का अर्थ ग्रहण किया जाना है" (esse est percipi)। इसका तात्पर्य है कि कोई भी वस्तु तब तक अस्तित्व में नहीं रह सकती जब तक उसे कोई चेतन मन (mind) ग्रहण न करे। बर्कले भौतिक पदार्थ (material substance) के अस्तित्व को नकारते हैं और कहते हैं कि वस्तुएँ केवल मन में विद्यमान विचारों (ideas) का समूह हैं। उदाहरण के लिए, एक सेब का अस्तित्व उसके रंग, स्वाद, गंध आदि संवेदनाओं के समूह के रूप में है, जो मन द्वारा ग्रहण किए जाते हैं। यदि कोई मन उन्हें ग्रहण न करे, तो वे अस्तित्व में नहीं रह सकते। हालाँकि, बर्कले ईश्वर को एक सार्वभौमिक मन मानते हैं जो सभी वस्तुओं को सदैव ग्रहण करता है, जिससे वस्तुओं का निरंतर अस्तित्व बना रहता है।
9. डेकार्ट के अनुसार ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिये सृष्टिमूलक प्रमाण को समझाइये ।
Explain the cosmological argument to prove the existence of God according to Descartes.
डेकार्ट का सृष्टिमूलक प्रमाण (Cosmological Argument): रेने डेकार्ट ने ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए सृष्टिमूलक प्रमाण प्रस्तुत किया। यह प्रमाण इस प्रकार है:
- आत्मा का अस्तित्व: डेकार्ट को अपने अस्तित्व पर संदेह है, लेकिन वह जानता है कि वह एक संदेह करने वाला, सोचने वाला प्राणी है। इस प्रकार, उसके मन में ईश्वर का विचार (idea of God) विद्यमान है।
- कारण का सिद्धान्त: डेकार्ट के अनुसार, किसी भी विचार का एक कारण होना चाहिए। ईश्वर का विचार एक अनंत, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ सत्ता का विचार है।
- अपर्याप्तता: डेकार्ट स्वयं एक सीमित, अपूर्ण प्राणी है। वह अपने मन में अनंत और पूर्ण सत्ता के विचार का कारण स्वयं नहीं हो सकता, क्योंकि कारण में उतनी ही वास्तविकता होनी चाहिए जितनी कार्य में होती है।
- निष्कर्ष: इसलिए, ईश्वर के विचार का कारण स्वयं ईश्वर होना चाहिए। अतः ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। यह प्रमाण ब्रह्मांड की सृष्टि और उसके कारण के रूप में ईश्वर की ओर संकेत करता है।
10. पर्यावरणीय नीतिशास्त्र क्या है ? समझाइये ।
What is environmental ethics ? Explain.
पर्यावरणीय नीतिशास्त्र (Environmental Ethics): पर्यावरणीय नीतिशास्त्र दर्शन की वह शाखा है जो मनुष्य और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच नैतिक सम्बन्धों का अध्ययन करती है। यह इस बात पर विचार करता है कि मनुष्य का प्रकृति, जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, पारिस्थितिकी तंत्रों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति क्या नैतिक कर्तव्य हैं। इसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रश्नों पर चर्चा की जाती है:
- क्या प्रकृति का अपना आंतरिक मूल्य (intrinsic value) है, या केवल मनुष्य के लिए उपयोगिता के आधार पर मूल्य है?
- क्या मनुष्य को पर्यावरण संरक्षण की नैतिक जिम्मेदारी है?
- जीव-जंतुओं और पारिस्थितिकी तंत्रों के अधिकार क्या हैं?
- पर्यावरणीय संकटों (जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन) के समाधान में नैतिक सिद्धांतों की भूमिका क्या है?
पर्यावरणीय नीतिशास्त्र का उद्देश्य मनुष्य और प्रकृति के बीच एक नैतिक और टिकाऊ सम्बन्ध स्थापित करना है।
SECTION - B
2. भारतीय दर्शन के अनुसार मोक्ष के स्वरूप को समझाइये |
Explain the nature of Moksha according to Indian Philosophy.
भारतीय दर्शन में मोक्ष का स्वरूप: भारतीय दर्शन में मोक्ष (मुक्ति) को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। यह जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्ति और आत्मा का परमात्मा से मिलन है। विभिन्न दर्शनों में मोक्ष के स्वरूप की अलग-अलग व्याख्या है:
- वेदांत दर्शन: मोक्ष का अर्थ है आत्मा और ब्रह्म की एकता का अनुभव करना। यह अज्ञान (अविद्या) के नाश और आत्म-साक्षात्कार से प्राप्त होता है। मोक्ष में आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप (सच्चिदानंद) को पहचान लेती है।
- सांख्य दर्शन: मोक्ष का अर्थ है पुरुष (चेतन तत्व) का प्रकृति (जड़ तत्व) से पूर्ण पृथक्करण। यह विवेक-ज्ञान से प्राप्त होता है, जिसमें पुरुष अपनी शुद्ध चेतना को पहचान लेता है।
- योग दर्शन: मोक्ष (कैवल्य) का अर्थ है चित्त की वृत्तियों के निरोध से पुरुष का अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होना।
- न्याय-वैशेषिक: मोक्ष का अर्थ है दुखों का पूर्ण अभाव और आत्मा का अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होना।
- जैन दर्शन: मोक्ष का अर्थ है कर्मों के बंधन से मुक्ति और आत्मा का सिद्धशिला (लोक के शिखर) पर पहुँचना, जहाँ वह अनंत ज्ञान, दर्शन, सुख और शक्ति प्राप्त करती है।
सभी दर्शनों में मोक्ष को दुखों से मुक्ति, आनंद की प्राप्ति और आत्मा की पूर्णता की अवस्था माना गया है।
अथवा
कर्म के सिद्धान्त को समझाते हुए कर्म के विभिन्न प्रकारों को बताइये ।
Explain the theory of Karma and its different kinds.
कर्म का सिद्धान्त (Theory of Karma): कर्म का सिद्धान्त भारतीय दर्शन का एक मूलभूत सिद्धान्त है। इसके अनुसार, प्रत्येक कर्म (कार्य) का एक फल (परिणाम) होता है, और यह फल जीव के भविष्य को निर्धारित करता है। कर्म का सिद्धान्त कार्य-कारण के नियम पर आधारित है, जहाँ अच्छे कर्मों का अच्छा फल और बुरे कर्मों का बुरा फल मिलता है। यह जन्म-मृत्यु के चक्र को समझाने में सहायक है।
कर्म के विभिन्न प्रकार:
- संचित कर्म (Sanchita Karma): ये वे सभी कर्म हैं जो पिछले जन्मों में किए गए हैं और जिनका फल अभी तक भोगा नहीं गया है। यह कर्मों का संग्रह है।
- प्रारब्ध कर्म (Prarabdha Karma): यह संचित कर्म का वह भाग है जो वर्तमान जन्म में फल देने के लिए तैयार है। यह वर्तमान जीवन के सुख-दुख का कारण बनता है और इसे बदला नहीं जा सकता, केवल भोगा जा सकता है।
- क्रियमाण कर्म (Kriyamana Karma): ये वे कर्म हैं जो वर्तमान जन्म में किए जा रहे हैं और जिनका फल भविष्य में मिलेगा। ये भविष्य के संचित कर्म का निर्माण करते हैं।
- आगामी कर्म (Agami Karma): ये वे कर्म हैं जो वर्तमान जन्म में किए जाने वाले हैं और जिनका फल भविष्य के जन्मों में भोगा जाएगा।
इस प्रकार, कर्म का सिद्धान्त जीव के नैतिक विकास और मोक्ष की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
खण्ड – स (Section – C)
22. गीता में कर्मयोग से आप क्या समझते हैं ? समझाइये ।
अथवा
गीता के अनुसार स्थित प्रज्ञ के प्रत्यय को समझाइये ।
What do you understand by Karmayoga in Gita ? Explain.
OR
Explain the concept of Sthita Pragya according to Gita.
उत्तर (कर्मयोग): गीता में कर्मयोग का अर्थ है—फल की आसक्ति को त्यागकर कर्तव्य का पालन करना। यह निष्काम कर्म का सिद्धांत है। श्रीकृष्ण के अनुसार, मनुष्य को अपने स्वधर्म (कर्तव्य) का पालन बिना फल की इच्छा के करना चाहिए। कर्मयोगी समत्व बुद्धि से सुख-दुख, लाभ-हानि को समान समझता है। इससे मन शुद्ध होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
उत्तर (स्थितप्रज्ञ): गीता के अनुसार स्थितप्रज्ञ वह व्यक्ति है जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है। वह सभी इच्छाओं का त्याग कर देता है, न सुख में हर्षित होता है न दुख में विषाद। वह राग-द्वेष से मुक्त रहता है और आत्मा में स्थित रहता है। ऐसा व्यक्ति सभी प्राणियों में समभाव रखता है और ब्रह्म में लीन रहता है।
23. बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग के सिद्धान्त को समझाइये ।
अथवा
जैन दर्शन के अनुसार स्याद्वाद के सिद्धान्त को समझाइये ।
Explain Buddha’s theory of Eight-fold path.
OR
Explain the theory of Syadvada according to Jain philosophy.
उत्तर (आष्टांगिक मार्ग): बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग (अष्टांगिक मार्ग) को मध्यम मार्ग भी कहा जाता है। यह दुख से मुक्ति का मार्ग है। इसके आठ अंग हैं:
- सम्यक दृष्टि – सही दृष्टिकोण (चार आर्य सत्यों को समझना)
- सम्यक संकल्प – सही विचार (अहिंसा, त्याग, करुणा)
- सम्यक वाक् – सही वाणी (झूठ, चुगली, कठोर वचन से बचना)
- सम्यक कर्मांत – सही आचरण (हिंसा, चोरी, व्यभिचार से बचना)
- सम्यक आजीव – सही जीविका (अनैतिक व्यवसाय से बचना)
- सम्यक व्यायाम – सही प्रयास (अकुशल धर्मों को रोकना, कुशल धर्मों को बढ़ाना)
- सम्यक स्मृति – सही स्मृति (शरीर, वेदना, चित्त, धर्म का निरीक्षण)
- सम्यक समाधि – सही समाधि (ध्यान के चार चरण)
उत्तर (स्याद्वाद): जैन दर्शन में स्याद्वाद का अर्थ है—"शायद" या "अनेकांत" का सिद्धांत। इसके अनुसार किसी भी वस्तु के अनेक पहलू होते हैं, और हम एक ही दृष्टिकोण से पूर्ण सत्य नहीं जान सकते। स्याद्वाद सप्तभंगी नय पर आधारित है, जिसमें सात प्रकार से कथन किया जाता है: (1) स्यात् अस्ति, (2) स्यात् नास्ति, (3) स्यात् अस्ति-नास्ति, (4) स्यात् अवक्तव्य, (5) स्यात् अस्ति-अवक्तव्य, (6) स्यात् नास्ति-अवक्तव्य, (7) स्यात् अस्ति-नास्ति-अवक्तव्य। यह सापेक्षता और अहिंसक दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
24. वैशेषिक दर्शन के अनुसार गुण व कर्म में क्या भेद है ? समझाइये ।
अथवा
अष्टांग योग के विभिन्न अंगों की व्याख्या कीजिये ।
What is the difference between Guna and Karma according to Vaiseshika philosophy ? Explain.
OR
Explain the different parts of Ashtanga Yoga.
उत्तर (गुण और कर्म में भेद – वैशेषिक): वैशेषिक दर्शन के अनुसार गुण और कर्म में निम्नलिखित भेद हैं:
| क्र. | गुण | कर्म |
|---|---|---|
| 1. | गुण द्रव्य में स्थित रहता है, परंतु वह स्वयं निष्क्रिय होता है। | कर्म द्रव्य में स्थित रहता है और वह सक्रिय (गतिशील) होता है। |
| 2. | गुण द्रव्य का स्थायी गुणधर्म है (जैसे रंग, रस, गंध)। | कर्म अस्थायी होता है और द्रव्य में परिवर्तन लाता है (जैसे गति, उठाना, गिराना)। |
| 3. | गुण का स्वयं कोई कार्य नहीं होता, वह केवल द्रव्य का वर्णन करता है। | कर्म का कार्य होता है—वह द्रव्य को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाता है या उसमें परिवर्तन करता है। |
| 4. | गुण के 24 भेद हैं (जैसे रूप, रस, गंध, स्पर्श, संख्या, परिमाण आदि)। | कर्म के 5 भेद हैं—उत्क्षेपण (ऊपर फेंकना), अवक्षेपण (नीचे गिराना), आकुंचन (सिकोड़ना), प्रसारण (फैलाना), गमन (चलना)। |
उत्तर (अष्टांग योग के अंग): पतंजलि के अष्टांग योग के आठ अंग हैं:
- यम – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
- नियम – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान
- आसन – शारीरिक मुद्राएँ (स्थिर और सुखद)
- प्राणायाम – श्वास नियंत्रण
- प्रत्याहार – इंद्रियों को विषयों से हटाना
- धारणा – मन को एक स्थान पर केंद्रित करना
- ध्यान – निरंतर चिंतन (एकाग्रता)
- समाधि – आत्मा और परमात्मा का मिलन (चित्त की पूर्ण शांति)
प्रश्न 25
वेदान्त में ब्रह्म के स्वरूप को समझाइये ।
अथवा
क्या आप यह मानते हैं कि विवेकानन्द का वेदान्त दर्शन आधुनिक युग में प्रासंगिक है ? अपने उत्तर के लिये तर्क दीजिये ।
Explain the nature of Brahman in Advaita Vedanta.
OR
Do you think that Vivekananda’s Vedanta Philosophy is relevant in modern age ? Give arguments for your answer.
उत्तर (विकल्प 1 – वेदान्त में ब्रह्म का स्वरूप):
अद्वैत वेदान्त के अनुसार ब्रह्म एकमेवाद्वितीय (एक और अद्वितीय) है। ब्रह्म का स्वरूप सत्-चित्-आनन्द (सत्य, चेतना और आनन्द) है। यह निर्गुण (गुणों से रहित), निराकार (आकारहीन) और निर्विशेष (विशेषताओं से रहित) है। ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, और जगत मिथ्या (भ्रम) है। ब्रह्म अजन्मा, अविनाशी और सर्वव्यापी है। इसे 'नेति नेति' (यह नहीं, यह नहीं) के माध्यम से समझा जाता है, क्योंकि यह मन और वाणी से परे है।
उत्तर (विकल्प 2 – विवेकानन्द के वेदान्त की प्रासंगिकता):
हाँ, विवेकानन्द का वेदान्त दर्शन आधुनिक युग में अत्यधिक प्रासंगिक है। इसके पक्ष में तर्क:
- सार्वभौमिक भाईचारा: विवेकानन्द ने सभी धर्मों और मानवों की एकता पर बल दिया, जो आज के वैश्विक संघर्षों में शांति का मार्ग दिखाता है।
- आत्मविश्वास और सशक्तिकरण: उनका कहना था कि प्रत्येक व्यक्ति में दिव्यता है, जो आधुनिक मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: वेदान्त तर्क और अनुभव पर आधारित है, जो आधुनिक विज्ञान के अनुकूल है।
- सामाजिक सुधार: उन्होंने जाति-पाति, गरीबी और अशिक्षा के खिलाफ आवाज उठाई, जो आज भी प्रासंगिक है।
- व्यावहारिक आध्यात्मिकता: उन्होंने धर्म को कर्म और सेवा से जोड़ा, जो आधुनिक जीवन में संतुलन लाने में सहायक है।
प्रश्न 26
डेकार्ट की दार्शनिक पद्धति क्या है ? समझाइये ।
अथवा
स्पिनोजा के द्रव्य सिद्धान्त को समझाइये ।
What is Descartes’ philosophical method ? Explain.
OR
Explain Spinoza’s theory of Substance.
उत्तर (विकल्प 1 – डेकार्ट की दार्शनिक पद्धति):
डेकार्ट ने अपनी दार्शनिक पद्धति को 'संशयवादी पद्धति' (Methodic Doubt) कहा। इसके मुख्य चरण:
- संशय (Doubt): सभी पूर्व मान्यताओं पर संदेह करना, यहाँ तक कि इंद्रियों और गणितीय सत्यों पर भी।
- स्पष्ट और विशिष्ट धारणा (Clear and Distinct Perception): केवल उन्हीं सत्यों को स्वीकार करना जो स्पष्ट और विशिष्ट रूप से ज्ञात हों।
- विश्लेषण (Analysis): जटिल समस्याओं को सरल भागों में विभाजित करना।
- संश्लेषण (Synthesis): सरल से जटिल की ओर बढ़ना।
- पुनरीक्षण (Enumeration): यह सुनिश्चित करना कि कुछ भी छूट न गया हो।
इस पद्धति का अंतिम परिणाम 'कोगिटो एर्गो सुम' (Cogito ergo sum – मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ) है, जो निस्संदेह सत्य है।
उत्तर (विकल्प 2 – स्पिनोजा का द्रव्य सिद्धान्त):
स्पिनोजा के अनुसार, द्रव्य (Substance) वह है जो स्वयं में है और स्वयं के द्वारा समझा जाता है। उनके सिद्धांत की मुख्य बातें:
- एकमात्र द्रव्य: ईश्वर या प्रकृति (Deus sive Natura) ही एकमात्र द्रव्य है। यह अनंत, स्वतंत्र और स्वयं-कारण (causa sui) है।
- गुण (Attributes): द्रव्य के अनंत गुण हैं, जिनमें से मनुष्य केवल दो – चिंतन (Thought) और विस्तार (Extension) – को जान सकता है।
- रूप (Modes): सभी व्यक्तिगत वस्तुएँ और विचार द्रव्य के रूप (modes) हैं, जो द्रव्य पर निर्भर हैं।
- नियतिवाद (Determinism): सब कुछ ईश्वरीय नियमों के अनुसार होता है, कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है।
स्पिनोजा ने द्रव्य को एकात्मक और सर्वव्यापी माना, जो अद्वैत वेदान्त के ब्रह्म से मिलता-जुलता है।
प्रश्न 27
बर्कले भौतिक पदार्थ के खण्डन के लिये क्या तर्क देते हैं ? उत्तर दीजिये ।
अथवा
लॉक जन्मजात प्रत्ययों का खण्डन किस प्रकार करते हैं ? उत्तर दीजिये ।
What are the arguments given by Berkeley to reject physical substance ? Give answer.
OR
How does Locke reject innate ideas ? Give answer.
उत्तर (विकल्प 1 – बर्कले के तर्क):
बर्कले ने भौतिक पदार्थ (Material Substance) के अस्तित्व को नकारने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए:
- अस्तित्व = अनुभव (Esse est percipi): बर्कले का मुख्य सिद्धांत है कि "अस्तित्व का अर्थ अनुभव किया जाना है।" कोई भी वस्तु तभी अस्तित्व में है जब उसे कोई आत्मा (mind) अनुभव करे। भौतिक पदार्थ, जो अनुभव से परे है, अस्तित्वहीन है।
- प्राथमिक और द्वितीयक गुणों में कोई अंतर नहीं: लॉक ने प्राथमिक गुण (जैसे आकार, गति) को वस्तु में निहित और द्वितीयक गुण (जैसे रंग, स्वाद) को मन में माना। बर्कले ने तर्क दिया कि दोनों प्रकार के गुण अनुभव पर निर्भर हैं, इसलिए भौतिक पदार्थ की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है।
- अमूर्त धारणाओं की असंभवता: हम किसी वस्तु को उसके सभी गुणों से अलग करके नहीं सोच सकते। 'पदार्थ' एक अमूर्त धारणा है जिसका कोई अनुभवजन्य आधार नहीं है।
- ईश्वर की धारणा: बर्कले ने कहा कि वस्तुएँ तब भी अस्तित्व में रहती हैं जब मनुष्य उन्हें नहीं देख रहा, क्योंकि ईश्वर (अनंत आत्मा) उन्हें सदैव अनुभव करता है। इस प्रकार भौतिक पदार्थ की आवश्यकता नहीं है।
उत्तर (विकल्प 2 – लॉक का जन्मजात प्रत्ययों का खण्डन):
लॉक ने अपनी पुस्तक 'Essay Concerning Human Understanding' में जन्मजात प्रत्ययों (Innate Ideas) का खण्डन निम्नलिखित तर्कों से किया:
- सार्वभौमिक सहमति का अभाव: यदि कोई प्रत्यय जन्मजात होता, तो सभी मनुष्यों में उस पर सार्वभौमिक सहमति होती। लेकिन बच्चों, मूर्खों और विभिन्न संस्कृतियों में ऐसी कोई सार्वभौमिक सहमति नहीं पाई जाती।
- बालकों और अशिक्षितों में अनुपस्थिति: बच्चे और अशिक्षित लोग नैतिक या तार्किक सिद्धांतों (जैसे 'जो है, वह है') को नहीं जानते, जबकि यदि वे जन्मजात होते तो उन्हें जानना चाहिए था।
- अनुभव से उत्पत्ति: लॉक ने तर्क दिया कि सभी प्रत्यय अनुभव (संवेदना और चिंतन) से उत्पन्न होते हैं। मन जन्म के समय एक 'टैबुला रासा' (कोरी स्लेट) होता है, जिस पर अनुभव लिखता है।
- ईश्वर का प्रत्यय: यदि ईश्वर का प्रत्यय जन्मजात होता, तो सभी संस्कृतियों में एक समान होता, लेकिन ईश्वर की विभिन्न धारणाएँ पाई जाती हैं, जो अनुभव से सीखी गई हैं।
प्रश्न 28
काण्ट का समीक्षावाद क्या है ? समझाइये।
अथवा
क्या पूर्वानुभविक संश्लेषणात्मक निर्णय संभव हैं ? काण्ट के दर्शन के अनुसार उत्तर दीजिए।
What is Kant’s critical philosophy ? Explain.
OR
Are synthetic a priori judgements possible ? Answer according to Kant’s philosophy.
उत्तर: काण्ट का समीक्षावाद (Critical Philosophy) ज्ञान की सीमाओं और संभावनाओं की जांच करता है। काण्ट के अनुसार, पूर्वानुभविक संश्लेषणात्मक निर्णय (Synthetic a priori judgements) संभव हैं। ये निर्णय अनुभव से स्वतंत्र होते हैं (पूर्वानुभविक) और ज्ञान में वृद्धि करते हैं (संश्लेषणात्मक)। उदाहरण के लिए, गणित के सिद्धांत (जैसे 7+5=12) और प्राकृतिक विज्ञान के नियम (जैसे कार्य-कारण का नियम) पूर्वानुभविक संश्लेषणात्मक निर्णय हैं। काण्ट ने सिद्ध किया कि ये निर्णय मानव बुद्धि की संरचना के कारण संभव हैं, जो अनुभव को संभव बनाती है।
प्रश्न 29
ह्यूम के कारणता सिद्धान्त को समझाइये।
अथवा
अरस्तु के चतुर्विध कारण सिद्धान्त को समझाइये।
Explain Hume’s theory of Causation.
OR
Explain Aristotle's theory of four-fold causation.
उत्तर (ह्यूम का कारणता सिद्धान्त): ह्यूम के अनुसार, कारणता (Causation) का ज्ञान अनुभव से उत्पन्न होता है। हम कारण और कार्य के बीच नियमित संयोग (constant conjunction) देखते हैं, जैसे आग और गर्मी। इससे हमारे मन में आदत (habit) बनती है कि एक घटना के बाद दूसरी घटना घटित होगी। ह्यूम कारणता को कोई आवश्यक संबंध नहीं मानते, बल्कि यह मानसिक आदत का परिणाम है।
उत्तर (अरस्तु का चतुर्विध कारण सिद्धान्त): अरस्तु के अनुसार, किसी भी वस्तु के अस्तित्व और परिवर्तन को समझने के लिए चार कारण आवश्यक हैं: (1) उपादान कारण (Material cause) – वस्तु जिससे बनी है, जैसे मूर्ति के लिए मिट्टी। (2) निमित्त कारण (Efficient cause) – वस्तु को बनाने वाला, जैसे मूर्तिकार। (3) रूप कारण (Formal cause) – वस्तु का स्वरूप या आकार, जैसे मूर्ति का डिज़ाइन। (4) प्रयोजन कारण (Final cause) – वस्तु का उद्देश्य, जैसे मूर्ति का धार्मिक उपयोग। ये चारों कारण मिलकर किसी वस्तु की पूर्ण व्याख्या करते हैं।
प्रश्न 30
व्यवसाय सम्बन्धी नैतिकता क्या है ? समझाइये।
अथवा
शिक्षा दर्शन के मुख्य कार्य क्या हैं ? समझाइये।
What is professional ethics ? Explain.
OR
What are the major functions of Philosophy of Education ? Explain.
उत्तर (व्यवसाय सम्बन्धी नैतिकता): व्यवसाय सम्बन्धी नैतिकता (Professional ethics) उन नैतिक सिद्धांतों और मानकों का समूह है जो किसी विशेष व्यवसाय में कार्य करने वाले व्यक्तियों के आचरण को नियंत्रित करते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि पेशेवर अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी, निष्पक्षता और जिम्मेदारी से करें। उदाहरण के लिए, चिकित्सकों के लिए रोगी की गोपनीयता बनाए रखना और वकीलों के लिए न्याय के प्रति वफादार रहना।
उत्तर (शिक्षा दर्शन के मुख्य कार्य): शिक्षा दर्शन (Philosophy of Education) के मुख्य कार्य हैं: (1) शिक्षा के उद्देश्यों का निर्धारण करना, जैसे ज्ञान, नैतिकता और कौशल का विकास। (2) पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियों का मार्गदर्शन करना। (3) शिक्षा के मूल्यों और आदर्शों की व्याख्या करना। (4) शिक्षा प्रणाली की आलोचना और सुधार के लिए दार्शनिक आधार प्रदान करना। (5) शिक्षा और समाज के बीच संबंधों को स्पष्ट करना।