RBSE Class 12th 2014 Rajasthani Sahitya-SS-26-2014 Previous Year Papers

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Paper details

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Board RBSE
Class Class 12th
Exam year 2014
Subject Rajasthani Sahitya-SS-26-2014
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

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RBSE Class 12th 2014 Rajasthani Sahitya-SS-26-2014

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Rajasthan Board Class 12th Rajasthani Sahitya-SS-26-2014 2014 solved Previous Year Question Papers

उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2014
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2014

राजस्थानी साहित्य
(RAJASTHANI SAHITYA)

समय : 3 घण्टे पूर्णांक : 80

परीक्षार्थियों सारू सामान्य निर्देश :

  1. परीक्षार्थी सबसूं पैली सेट वाले पत्र माथे नामांक जरूर लिखे।
  2. सगला सवाल करना जरूरी है।
  3. हरेक सवाल रौ उत्तर पुस्तिका में ईज लिखणो है।
  4. जद सवाल रा अक सूं अधिक भाग है तो वां सगव्ठा रा उत्तर अक साथे लगातार लिखौ।
  5. लेखन मांय सुद्धता अर वैज्ञानिक विवेचन करियां ज्यादा अंक दिरीजैला।
  6. वर्तनी, व्याकरण अर सुलेख रौ विसेस ध्यान राखौ अर ओपतौ ध्यान देवौ।
  7. उत्तर राजस्थानी भासा में ईज देवणा है।
  8. सवाल रा ठावी ढौड़ अंकित है।

SS—26-Raj. Sah. [ SS-5526 ] [ Turn over

प्रश्न L. नीचे लिखे गद्यावतरणों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए —

(क) पहला गद्यांश

स्वामी जी रौ माथो ओकदम घूमग्यो, बै अक ही बात कैवता कै संस्था बिगड़गी। म्हूं आदमी बणाणै की साधना करी, अब तो हैवान त्यार होवण लागग्या अर बै कुटिया सूं निकल, संस्था सूं निकल। बीं नगर सूं निकल, गाड़ी में बैठग्या, चालता रहया। वारै मन में शांति कोनी, चैन कोनी, शांति ढूंढता फिरै, गांव गांव, नगर-नगर।

सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश राजस्थानी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक की कृति से लिया गया है। इसमें स्वामी जी के मन की व्यथा और अशांति का चित्रण है। स्वामी जी को लगता है कि उनकी साधना का उद्देश्य मनुष्य बनाना था, परंतु लोग हैवान बनते जा रहे हैं। इस कारण वे कुटिया, संस्था और नगर छोड़कर चल देते हैं। उनके मन में शांति और चैन नहीं है, वे गाँव-गाँव, नगर-नगर शांति की खोज में भटक रहे हैं। यह अंश मानवीय मूल्यों के ह्रास और आध्यात्मिक अशांति को दर्शाता है।

अथवा

बाबूजी पैलांई करजा में कव्ठीज गए हैं नै हमै फेर औ उणां नै पूरा ई डुबावणी चा। वै सो औ काम सगा-गनायतां रा नही। औ तौ दुस्मणां का काम है इण रै कारण म्है जीवती माखी नहीं गिटूंला अर म्हनै चाहै जिता दुख देखणा पड़ै, पण म्है यां लोगां रै पाने नीं पडूला। ओ ब्या' व म्है रद करूं हूं।

सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश में वक्ता बाबूजी के ऋण में फँसने और उनके द्वारा पूरी तरह डुबाने की बात करता है। वक्ता कहता है कि यह काम सगे-संबंधियों का नहीं, बल्कि दुश्मनों का है। वह प्रतिज्ञा करता है कि वह जीवित रहते हुए ऐसा नहीं होने देगा, चाहे उसे कितना भी दुख क्यों न उठाना पड़े। वह इन लोगों के पैरों नहीं पड़ेगा और विवाह को रद्द करने की बात कहता है। यह अंश आत्मसम्मान और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।

(ख) दूसरा गद्यांश

दिवलो जले, उजास करै। सही: पण कुणनै सरावां? दिवलो स्नेह रै पाण जले, पण स्नेह परायो। घाणी में तो विचारा तिल पिसे, स्नेह रस रो दान करै। बाती भी पराई री। तो पराई कुरबाणी रै पाण जो जस रो चानणो होवै उण में कपट लागणी ही चाहीजै। त्याग में कपट रौ कव्ठांस सदा ही लागै। तो कपट रो ही नाम है माया।

सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश में दीपक के माध्यम से त्याग और माया के स्वरूप पर विचार किया गया है। दीपक जलता है और उजाला करता है, परंतु उसका स्नेह (तेल) पराया होता है। घानी में तिल पिसता है और स्नेह (तेल) का दान करता है, बाती भी पराई होती है। लेखक कहता है कि पराई कुर्बानी से जो यश का चाँदनी होती है, उसमें कपट लगना ही चाहिए। त्याग में कपट का कंठस्वर (आवाज) सदा लगता है। अतः कपट का ही नाम माया है। यह अंश त्याग और माया के द्वंद्व को दर्शाता है।

प्रश्न (ग)

निम्नलिखित गद्यांश की सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए :

"आपंां नै अठै सुख-सांती दीखै है, चोखा-चोखा मन में मोवणिया चित्राम है, बे तो कोरा चिलकारा है। हियै री आंखड़ल्या सूं जोवो तो रिंद रोही-रिंद रोही दीखैली। इण सुख मांय कोरो दुख है। आणंद मांय पीड़ा है। आ पीड़ा कदेई कोनी मरै, अजर है, अमर है।"

सन्दर्भ : प्रस्तुत गद्यांश राजस्थानी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक 'रामू' की कृति से लिया गया है। इसमें जीवन के सुख-दुख के गहरे दार्शनिक पक्ष को उजागर किया गया है।

प्रसंग : लेखक यहाँ बताना चाहता है कि बाहरी दिखावटी सुख और आनंद वास्तव में भ्रम मात्र हैं। यदि हृदय की आँखों से देखा जाए तो हर सुख में दुख और हर आनंद में पीड़ा छिपी है। यह पीड़ा अमर और अजर है, जो कभी समाप्त नहीं होती।

व्याख्या : लेखक कहता है कि हमें यहाँ (संसार में) सुख और शांति दिखाई देती है, मन में अच्छे-अच्छे चित्र बनते हैं, पर ये सब केवल दिखावा (चिलकारा) हैं। यदि हृदय की आँखों से देखें तो हर ओर सिर्फ रेगिस्तान (रिंद रोही) ही दिखाई देता है। इस सुख में केवल दुख है, आनंद में पीड़ा है। यह पीड़ा कभी नहीं मरती, यह अजर (जिसका बुढ़ापा न हो) और अमर (जो कभी न मरे) है। इस प्रकार लेखक जीवन की क्षणभंगुरता और दुख की शाश्वतता पर गहरा चिंतन प्रस्तुत करता है।

अथवा

निम्नलिखित गद्यांश की सन्दर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या कीजिए :

"फेर बे जीवण अर जगत रौ जाणै मरम जाण लियौ। सैंग विरथा है। पाप-पुन्न, चोखो-कोजो, काव्ठो-धोव्ठो सैंग बिरथा। फालतू पणै रौ सगव्ठा रै आगे है। जीवण रै चरम सार रूप में मिले है अक पीड़। अणंत ... रंग-रगीली, रूपाली, ... पीड़ावां रो ई समन्दर है ओ जीवण।"

सन्दर्भ : यह गद्यांश राजस्थानी साहित्य के एक महत्वपूर्ण पाठ से उद्धृत है, जिसमें जीवन और जगत के रहस्य को समझने का प्रयास किया गया है।

प्रसंग : लेखक यहाँ जीवन के अंतिम सत्य को उजागर करता है। वह कहता है कि जब मनुष्य जीवन और जगत का मर्म जान लेता है, तो उसे सब कुछ व्यर्थ लगने लगता है। पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा, काला-सफेद सब व्यर्थ हैं। जीवन का चरम सार केवल एक पीड़ा है, और यह जीवन पीड़ाओं का समुद्र है।

व्याख्या : लेखक का कहना है कि जब मनुष्य जीवन और जगत का गहरा रहस्य जान लेता है, तो उसे सब कुछ निरर्थक प्रतीत होता है। पाप-पुण्य, अच्छाई-बुराई, काला-सफेद जैसे सभी द्वंद्व व्यर्थ हैं। यह सब केवल व्यर्थ के आडंबर (फालतू पणै) हैं, जो सत्य (सगव्ठा) के सामने तुच्छ हैं। जीवन का अंतिम सार (चरम सार) केवल एक पीड़ा है, जो अनंत है। यह जीवन रंग-बिरंगा, सुंदर और आकर्षक दिखता है, पर वास्तव में यह पीड़ाओं का समुद्र है। इस प्रकार लेखक जीवन की दुखमयी प्रकृति पर गहन दार्शनिक चिंतन प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 2

कहाणी रा तत्वां रै आधार 'सूरज री मौत' कहाणी री समीक्षा करौ।

समीक्षा: 'सूरज री मौत' कहाणी मांय कहाणी रा सगळा तत्व – कथानक, पात्र, संवाद, वातावरण, उद्देश्य – स्पष्ट रूप मांय दिखाई देवै हैं। कहाणी मांय सूरज नामक पात्र री मौत रै माध्यम सूं समाज री कुरीतियां अर मानवीय संवेदना ने उजागर करण रौ प्रयास कीनौ गयौ है। कहाणी रौ कथानक सुगठित अर प्रभावशाली है, पात्रां रौ चरित्र-चित्रण स्वाभाविक है, अर भाषा सरल अर प्रवाहपूर्ण है।

प्रश्न 3

मुहणोत नैणसी रौ चरित्र-चित्रण करौ।

चरित्र-चित्रण: मुहणोत नैणसी राजस्थानी साहित्य अर इतिहास रा एक प्रमुख व्यक्तित्व हैं। ऊ एक कुशल प्रशासक, इतिहासकार अर लेखक था। नैणसी री रचनाओं मांय राजस्थान रा इतिहास, संस्कृति अर समाज री झलक मिलै है। ऊ सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय अर दूरदर्शी शासक था। उणकौ लेखन शैली सरल अर प्रभावशाली है, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यां री प्रामाणिकता बणी रहै है।

प्रश्न 4

देश बदल्या सूं काई आदमी रौ मन बदल जावै? जातरा संस्मरण सूं उदाहरण देय'र खुलासौ करो।

उत्तर: हां, देश बदल्या सूं आदमी रौ मन बदल सकै है। 'जातरा संस्मरण' मांय लेखक ने अपणै विदेश प्रवास रै दौरान देख्यां अलग-अलग देशां री संस्कृति, रहन-सहन अर सोच ने अपणायौ। उदाहरणार्थ, जद लेखक विदेश गयौ तो उणै तांता री जगह पश्चिमी पोशाक पहनण लाग्यौ, अर खाण-पाण री आदतां भी बदल गईं। ऊ अपणी मातृभाषा री जगह अंग्रेजी बोलण लाग्यौ। इस प्रकार, देश बदल्या सूं आदमी री सोच, व्यवहार अर आदतां मांय बदलाव आवै सकै है।

प्रश्न 5

"हूं गोरी किण ते री" उपन्यास मांय किण-किण सामाजिक समस्यावां ने उजागर कीवी है? स्पष्ट करो।

स्पष्टीकरण: "हूं गोरी किण ते री" उपन्यास मांय मुख्य रूप सूं निम्न सामाजिक समस्यावां ने उजागर कीवी गई है:

  • स्त्री शिक्षा री कमी: समाज मांय औरतां ने शिक्षा सूं वंचित राखण री परंपरा ने दिखायौ गयौ है।
  • दहेज प्रथा: दहेज री कुप्रथा रै कारण औरतां री जीवन मांय आवण आली कठिनाइयां ने उजागर कीनौ गयौ है।
  • बाल विवाह: कम उम्र मांय लड़कियां रा विवाह करण री समस्या ने दर्शायौ गयौ है।
  • पितृसत्तात्मक सोच: समाज मांय पुरुष प्रधान सोच रै कारण औरतां ने दबाये राखण री प्रवृत्ति ने दिखायौ गयौ है।

इन समस्यावां रै माध्यम सूं उपन्यासकार ने समाज सुधार री आवश्यकता पर बल दियौ है।

प्रश्न 6

आधुनिक राजस्थानी काव्य में प्रगतिशील काव्यधारा रौ परिचय दिरावौ।

परिचय: आधुनिक राजस्थानी काव्य मांय प्रगतिशील काव्यधारा रौ प्रभाव 20वीं सदी रै मध्य सूं देखण मांय आवै है। यह धारा समाजवादी विचारधारा सूं प्रभावित है अर समाज री विषमताओं, शोषण अर अन्याय रै विरुद्ध आवाज उठावै है। प्रगतिशील कवियां ने किसान, मजदूर, अर शोषित वर्ग री समस्यावां ने अपणी कविता रौ विषय बणायौ। यह काव्यधारा यथार्थवादी दृष्टिकोण अपणावै है अर समाज मांय बदलाव री आवश्यकता पर बल देवै है। प्रमुख प्रगतिशील कवियां मांय कन्हैयालाल सेठिया, नरसिंह राजपुरोहित, अर भंवरसिंह सांभरिया रा नाम उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 7

नीचै लिख्यां विसयां मांय सूं किणी अक विषय माथे राजस्थानी भासा में निबन्ध लिखौ:

  1. राजस्थानी लोक-गीत
  2. बेरोजगारी अर निराकरण रा उपाय
  3. रंगीलो तिवार-होली
  4. सच्च सुख निरोगी काया

निबन्ध (विषय: राजस्थानी लोक-गीत): राजस्थानी लोक-गीत राजस्थान री समृद्ध सांस्कृतिक विरासत रा अभिन्न अंग हैं। ये गीत जीवन रै हर पड़ाव – जन्म, विवाह, त्योहार, अर मृत्यु – सूं जुड़े हैं। राजस्थानी लोक-गीतां मांय प्रेम, वीरता, भक्ति अर प्रकृति री झलक मिलै है। प्रमुख लोक-गीतां मांय 'पीपली री पात', 'केसरिया बालम', 'गोरबंद', अर 'हीड़ौ' शामिल हैं। ये गीत सरल भाषा, मधुर धुन अर लयबद्धता रै कारण जन-जन री जुबान पर चढ़े हैं। राजस्थानी लोक-गीत न केवल मनोरंजन रौ साधन हैं, बल्कि ये समाज री भावनाओं, आकांक्षाओं अर संघर्षां ने भी अभिव्यक्त करै हैं।

8. नीचे दिए गए पदों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :

(अ) प्रभू मोकूँ एक बेर दरसन दइये ।
तुम कारन मैं भइ रे दिवानी, उपहास जगत की सहिये ॥
हाथ लकुटिया कांधे कमव्ठिया, मुख पर मुरली बजैये ॥
हीरा मानिक गरथ भंडारा, माल मुलक नहिं चहिये ॥
गवरी के ठाकर सुख के सागर, मेरे उर अन्तर रहिये ॥

प्रसंग : प्रस्तुत पद राजस्थानी साहित्य के प्रसिद्ध कवि मीराबाई द्वारा रचित है। यह भक्ति काल की कृष्ण भक्ति शाखा का पद है, जिसमें मीरा अपने आराध्य श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति और विरह व्यथा को व्यक्त कर रही हैं।

व्याख्या : मीरा कहती हैं कि हे प्रभु! मुझे एक बार अपने दर्शन दीजिए। आपके कारण मैं दीवानी हो गई हूँ और संसार के उपहास को सह रही हूँ। आप हाथ में लकुटी (छड़ी) और कंधे पर कमंडलु धारण करते हैं तथा मुख पर मुरली बजाते हैं। मुझे हीरा, माणिक, धन-संपत्ति या राज्य की कोई इच्छा नहीं है। हे गोपियों के स्वामी, सुख के सागर! आप मेरे हृदय में सदा निवास करें।

विशेष : इस पद में मीरा की कृष्ण के प्रति गहरी आसक्ति, वैराग्य भावना और सांसारिक मोह-माया से विरक्ति स्पष्ट झलकती है। भाषा सरल एवं भावपूर्ण है।

अथवा

हिम्मत कीमत होय, बिन हिम्मत कीमत नहीं ।
करे न आदर कोय, रद कागद ज्यूं राजिया ॥
कारज सरै न कोय, बल-प्राक्रम-हिम्मत बिना ।
साहस की होय, रंग्या वीर राजिया ॥

प्रसंग : प्रस्तुत पद राजस्थानी साहित्य के कवि द्वारा रचित है, जिसमें हिम्मत और साहस के महत्व को प्रतिपादित किया गया है। यह वीर रस का पद है।

व्याख्या : कवि कहते हैं कि हिम्मत से ही मनुष्य की कीमत (महत्त्व) होती है, बिना हिम्मत के उसकी कोई कीमत नहीं है। जो व्यक्ति हिम्मत नहीं रखता, उसका कोई आदर नहीं करता, वह त्यागे हुए कागज के समान बेकार होता है। बल, पराक्रम और हिम्मत के बिना कोई भी कार्य सफल नहीं होता। हे राजा! साहस से ही सब कुछ प्राप्त होता है।

विशेष : इस पद में साहस और हिम्मत को जीवन की सफलता का मूल मंत्र बताया गया है। भाषा सरल, प्रभावशाली एवं उपदेशात्मक है।

प्रश्न 8 (ब)

आ परदेसण पांवणीजी, यूँ सुख नी वेवस्था
आलीजा रा आंगणै में करै मनां रा मेव्ठा
झिरमिर गीत सुणाती है, मनड़ै नै भरमाती
छठ्ठती अर बिरखा बीनणी ।

अथवा

थें करी असांयत आसरा ।
थिर सांयत थापवा सारू,
थारी बाढ़ावठी है -
रगत-वाब्ठा,
क्ररूण आंखियां ढव्ठता -
अरूण-आसू ढ़ाबवा सारू ॥

प्रश्न 9

वीर सतसई रा पठित छंदा रै आधार माथे वीर-नारी रै मनगत-भावां रो बखाण करो ।

उत्तर: वीर सतसई के पठित छंदों में वीर-नारी के मनोगत भावों का सजीव चित्रण मिलता है। वीर-नारी अपने पति या प्रेमी के युद्ध में जाने पर उसकी वीरता और पराक्रम की कामना करती है। वह उसे शत्रु पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद देती है। उसके मन में गर्व, चिंता और प्रेम का मिश्रण होता है। वह अपने वीर को युद्धभूमि में अमर कीर्ति अर्जित करते देखना चाहती है। उसके मन में यह भाव होता है कि वीर यदि युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो तो भी वह उसे स्वीकार है, क्योंकि वीर की मृत्यु भी देश के लिए गौरवपूर्ण होती है। इस प्रकार वीर-नारी के मन में त्याग, बलिदान और वीरता के प्रति अटूट श्रद्धा के भाव प्रमुख हैं।

प्रश्न 10

“सपनो आयो” कविता रै माध्यम सूं कवि लोगा ने कोई संदेश दियौ है ?

उत्तर: “सपनो आयो” कविता के माध्यम से कवि ने लोगों को यह संदेश दिया है कि सपने केवल रात में नहीं देखे जाते, बल्कि जाग्रत अवस्था में भी मनुष्य अपने लक्ष्यों और आकांक्षाओं के सपने देखता है। कवि कहता है कि सपना हमारे जीवन का अभिन्न अंग है, जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सपने ही मनुष्य को उसकी मंजिल तक पहुँचाने का मार्ग दिखाते हैं। कवि का संदेश है कि हमें अपने सपनों को कभी त्यागना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। सपने ही जीवन को सार्थक और सुंदर बनाते हैं।

प्रश्न पत्र – राजस्थानी साहित्य (SS-26) 2014

  1. “कतनी बार ते” कविता का मूल भाव अपने शब्दों में लिखो।

    इस कविता का मूल भाव मानव जीवन की अनिश्चितता और समय के निरंतर बीतने पर आधारित है। कवि ने यह दर्शाया है कि जीवन में कितनी ही बार सुख-दुख, मिलन-वियोग के क्षण आते हैं, लेकिन मनुष्य को इन सबको समभाव से स्वीकार करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। कविता में जीवन की क्षणभंगुरता और संसार की नश्वरता का गहरा चित्रण किया गया है।

  2. काव्य की परिभाषा देते हुए उसके तत्वों का खुलासा करो।

    काव्य की परिभाषा: काव्य वह साहित्यिक विधा है जिसमें भावों और विचारों को रसात्मक एवं चमत्कारपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया जाता है।

    काव्य के तत्व:

    • रस: काव्य में श्रृंगार, वीर, करुण आदि रसों का समावेश
    • भाव: कवि के मनोभावों की अभिव्यक्ति
    • अलंकार: शब्द और अर्थ के चमत्कार के साधन
    • गुण: माधुर्य, प्रसाद, ओज आदि काव्यगुण
    • रीति: अभिव्यक्ति की शैली
    • वृत्ति: काव्य की प्रवृत्ति
  3. कुंडलिया छंद का उदाहरण सहित परिचय दिरावौ।

    कुंडलिया छंद का परिचय: यह हिंदी एवं राजस्थानी साहित्य का एक प्रमुख छंद है। इसमें 6 पंक्तियाँ होती हैं। प्रथम दो पंक्तियाँ दोहे में तथा अंतिम चार पंक्तियाँ रोला छंद में होती हैं। इसकी विशेषता यह है कि अंतिम पंक्ति का अंतिम शब्द प्रथम पंक्ति के प्रारंभिक शब्द के समान होता है।

    उदाहरण:

    रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
    जहाँ काम आवै सुई, कहाँ करै तलवारि॥
    तलवारि करै न काम, सुई काम बहु करै है।
    कह रहीम इस बात, बड़न सों लघु न डरै है॥

  4. उपमा अलंकार की परिभाषा उदाहरण सहित समझावौ।

    परिभाषा: उपमा अलंकार में दो वस्तुओं या व्यक्तियों के बीच समानता दिखाई जाती है। इसमें उपमेय (जिसकी तुलना की जाए) और उपमान (जिससे तुलना की जाए) के बीच सादृश्य स्थापित किया जाता है।

    उदाहरण: "पीपर पात सरिस मन डोला" – यहाँ मन (उपमेय) की तुलना पीपल के पत्ते (उपमान) से की गई है, जो सदा हिलता रहता है।

    उपमा के अंग: उपमेय, उपमान, साधारण धर्म, वाचक शब्द (जैसे- सरिस, सम, ज्यों, सदृश आदि)