RBSE Class 12th 2015 Philosophy-SS-85-2015 Previous Year Papers

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Paper details

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Board RBSE
Class Class 12th
Exam year 2015
Subject Philosophy-SS-85-2015
Resource type Previous Year Papers
Category RBSE Previous Year Question Papers
Website RBSE Solution

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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-85-2015 2015 solved Previous Year Question Papers

उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2015
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2015

दर्शनशास्त्र
PHILOSOPHY

समय : 3 घण्टे   |   पूर्णांक : 80


परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :

  1. परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्नपत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
    Candidate must write first his/her Roll No. on the question paper compulsorily.
  2. सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
    All the questions are compulsory.
  3. प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
    Write the answer to each question in the given answer-book only.
  4. जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
    For questions having more than one part, the answers to those parts are to be written together in continuity.
  5. प्रश्न-पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपान्तर में किसी प्रकार की त्रुटि / अन्तर / विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को सही मानें।
    If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.

(Page 1 of 7 — No. of Questions: 30 | No. of Printed Pages: 7 | SS—85—Philosophy | SS - 6085)

खण्ड - अ / SECTION - A

निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिये :
Define each of the following :

  1. कर्मयोग / Karmayoga

    कर्मयोग का अर्थ है फल की आसक्ति के बिना कर्तव्य का पालन करना। यह भगवद्गीता में वर्णित तीन योगों में से एक है, जिसमें व्यक्ति अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देता है और सफलता-असफलता में समभाव रखता है।

    Karmayoga means performing one's duty without attachment to the results. It is one of the three yogas described in the Bhagavad Gita, where a person dedicates all actions to God and remains equanimous in success and failure.

  2. स्यादवाद / Syadvada

    स्यादवाद जैन दर्शन का एक सिद्धांत है जो कहता है कि किसी भी वस्तु के बारे में सत्य को विभिन्न दृष्टिकोणों से व्यक्त किया जा सकता है। 'स्यात्' शब्द का अर्थ है 'शायद' या 'किसी अपेक्षा से'। यह सापेक्ष सत्य का सिद्धांत है।

    Syadvada is a doctrine of Jain philosophy which states that truth about any object can be expressed from multiple perspectives. The word 'syat' means 'perhaps' or 'relatively'. It is the theory of relative truth.

  3. प्रकृति (सांख्य दर्शन) / Prakriti (Sankhya philosophy)

    सांख्य दर्शन में प्रकृति मूल प्रकृति या जड़ जगत का मूल कारण है। यह तीन गुणों (सत्व, रजस, तमस) से युक्त अव्यक्त अवस्था है, जिससे सृष्टि का विकास होता है। प्रकृति नित्य, अचेतन और सक्रिय है।

    In Sankhya philosophy, Prakriti is the primordial nature or the root cause of the material world. It is the unmanifest state comprising three gunas (sattva, rajas, tamas), from which the entire creation evolves. Prakriti is eternal, unconscious, and active.

  4. ऋत / Rta

    ऋत का अर्थ है ब्रह्मांडीय नियम या प्राकृतिक व्यवस्था। यह वैदिक काल में सत्य और नैतिक व्यवस्था का प्रतीक था, जो ऋतुओं के चक्र, सूर्योदय-सूर्यास्त आदि में दिखाई देता है। बाद में इसे धर्म का पर्याय माना गया।

    Rta means cosmic order or natural law. In the Vedic period, it was the symbol of truth and moral order, visible in the cycle of seasons, sunrise-sunset, etc. Later it was considered synonymous with Dharma.

  5. अनुभववाद / Empiricism

    अनुभववाद एक ज्ञानमीमांसीय सिद्धांत है जो कहता है कि सभी ज्ञान का स्रोत इंद्रिय अनुभव है। इसके अनुसार मनुष्य का मन जन्म के समय कोरी स्लेट (टैबुला रस) होता है और अनुभव से ही ज्ञान प्राप्त होता है। लॉक, ह्यूम इसके प्रमुख समर्थक हैं।

    Empiricism is an epistemological theory which states that all knowledge originates from sensory experience. According to it, the human mind is a blank slate (tabula rasa) at birth and knowledge is acquired only through experience. Locke and Hume are its main proponents.

  6. जन्मजात प्रत्यय / Innate ideas

    जन्मजात प्रत्यय वे विचार या ज्ञान हैं जो जन्म से ही मानव मन में विद्यमान होते हैं, न कि अनुभव से प्राप्त होते हैं। डेकार्टेस और प्लेटो इस सिद्धांत के समर्थक थे। डेकार्टेस के अनुसार ईश्वर, आत्मा और गणितीय सत्य जन्मजात प्रत्यय हैं।

    Innate ideas are those ideas or knowledge that are present in the human mind from birth, not derived from experience. Descartes and Plato were supporters of this theory. According to Descartes, God, soul, and mathematical truths are innate ideas.


प्रश्न संख्या और अंक विभाजन / Question Numbers and Marks Distribution

खण्ड / Section प्रश्न संख्या / Question Nos. प्रति प्रश्न अंक / Marks per question उत्तर की शब्द सीमा / Word limit of answer
अ / A 1-10 1 20 शब्द / 20 words
ब / B 11-20 2 50 शब्द / 50 words
स / C 21-30 5 100-150 शब्द / 100-150 words

नोट: प्रश्न संख्या 21 से 30 तक में आंतरिक विकल्प हैं।
Note: There are internal choices for Q. Nos. 21 to 30.

खण्ड - ब (Section - B)

11. पुरुषार्थ की धारणा समझाइए।

Explain the concept of Purushartha.

उत्तर: पुरुषार्थ का अर्थ है मनुष्य के जीवन के चार मुख्य लक्ष्य या उद्देश्य। ये चार पुरुषार्थ हैं:

  1. धर्म: नैतिकता, कर्तव्य और सदाचार का पालन।
  2. अर्थ: धन, संपत्ति और भौतिक साधनों की प्राप्ति।
  3. काम: इच्छाओं और भावनाओं की संतुष्टि।
  4. मोक्ष: आत्मा का जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना और परम सत्य की प्राप्ति।

ये चारों पुरुषार्थ मनुष्य के जीवन को संतुलित और सार्थक बनाते हैं।

12. गीता के अनुसार स्वधर्म क्या है?

What is Svadharma according to Geeta?

उत्तर: गीता के अनुसार स्वधर्म का अर्थ है व्यक्ति का अपना कर्तव्य, जो उसकी प्रकृति, जाति, वर्ण और आश्रम के अनुसार निर्धारित होता है। स्वधर्म का पालन करना ही श्रेष्ठ है, भले ही वह दूसरे के धर्म से कमतर लगे। गीता में कहा गया है कि "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" अर्थात अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, जबकि दूसरे का धर्म भय उत्पन्न करने वाला है।

13. चार आर्य-सत्यों को समझाइए।

Explain four Noble truths.

उत्तर: बौद्ध दर्शन के चार आर्य सत्य इस प्रकार हैं:

  1. दुःख सत्य: संसार में दुःख है। जन्म, जरा, मृत्यु, शोक, दुःख, दौर्मनस्य, उपायास आदि सभी दुःख हैं।
  2. दुःख समुदय सत्य: दुःख का कारण तृष्णा (इच्छा) है। तृष्णा ही पुनर्जन्म का कारण है।
  3. दुःख निरोध सत्य: तृष्णा के पूर्ण निरोध से दुःख का निरोध होता है, जिसे निर्वाण कहते हैं।
  4. दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा सत्य: दुःख निरोध का मार्ग आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जिसमें सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि शामिल हैं।

14. न्याय दर्शन के अनुसार मान्य सभी प्रमाणों की परिभाषा दीजिए।

Define all Pramanas accepted by Nyaya Philosophy.

उत्तर: न्याय दर्शन चार प्रमाणों को मान्यता देता है:

  1. प्रत्यक्ष प्रमाण: इंद्रियों और मन के संयोग से उत्पन्न ज्ञान। यह सबसे प्रमुख प्रमाण है।
  2. अनुमान प्रमाण: पूर्व ज्ञान के आधार पर नए ज्ञान का निर्माण। जैसे धुआँ देखकर आग का अनुमान लगाना।
  3. उपमान प्रमाण: सादृश्य या समानता के आधार पर ज्ञान। जैसे गाय के समान जंगली जानवर को गवय कहना।
  4. शब्द प्रमाण: विश्वसनीय व्यक्ति के वचन या आगम (शास्त्र) से प्राप्त ज्ञान।

15. शंकराचार्य के अनुसार माया का स्वरूप क्या है?

What is the nature of Maya according to Sankaracharya?

उत्तर: शंकराचार्य के अनुसार माया एक अविद्या या अज्ञान है जो ब्रह्म (परम सत्य) को ढक लेती है और जगत को सत्य प्रतीत कराती है। माया का स्वरूप अनिर्वचनीय है - इसे न सत कहा जा सकता है (क्योंकि यह ब्रह्म की तरह सत्य नहीं है) और न असत (क्योंकि यह प्रतीत होती है)। माया दो शक्तियों से युक्त है: आवरण शक्ति (ढकने वाली) और विक्षेप शक्ति (विकार उत्पन्न करने वाली)। माया के कारण ही ब्रह्म में जगत का भ्रम होता है, जैसे रस्सी में साँप का भ्रम।

खण्ड - ब (Section - B)

6. लाइबनिज के दर्शन में चिद्वस्तुओं की गवाक्षहीनता से क्या तात्पर्य है ?

What is the meaning of windowlessness of Monads in Leibnitz's philosophy ?

उत्तर: लाइबनिज के अनुसार, चिद्वस्तु (Monad) एक सरल, अविभाज्य आत्मिक इकाई है। 'गवाक्षहीनता' (Windowlessness) का तात्पर्य है कि चिद्वस्तुएँ एक-दूसरे से कोई भौतिक या कारणात्मक संबंध नहीं रखतीं। वे बाहरी जगत से किसी भी प्रकार का प्रभाव ग्रहण नहीं कर सकतीं। प्रत्येक चिद्वस्तु अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र होती है, और उसकी सारी अवस्थाएँ उसके अपने आंतरिक स्वभाव से उत्पन्न होती हैं। यह 'पूर्व-स्थापित सामंजस्य' (Pre-established Harmony) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें ईश्वर ने सभी चिद्वस्तुओं को इस प्रकार सृजित किया है कि वे बिना किसी पारस्परिक प्रभाव के एक-दूसरे के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से कार्य करती हैं।

7. ह्यूम बाह्य जगत के अस्तित्व को अस्वीकार क्यों करता है ?

Why does Hume refute the existence of external world ?

उत्तर: ह्यूम (David Hume) अपने अनुभववादी दृष्टिकोण के कारण बाह्य जगत के अस्तित्व को अस्वीकार करता है। उसके अनुसार, हमारा सारा ज्ञान इंद्रिय-अनुभवों (impressions) और उनके प्रतिबिंबों (ideas) पर आधारित है। हम केवल अपनी संवेदनाओं (sensations) को जानते हैं, न कि उनके कारणों को। बाह्य जगत का कोई प्रत्यक्ष अनुभव संभव नहीं है। हम जिसे 'बाह्य वस्तु' कहते हैं, वह वास्तव में हमारी संवेदनाओं का एक समूह मात्र है। इसलिए, बाह्य जगत के अस्तित्व का कोई तार्किक प्रमाण नहीं है; यह केवल आदत और कल्पना पर आधारित एक विश्वास है।

8. संश्लेषणात्मक निर्णय क्या है ?

What is the synthetic judgement ?

उत्तर: संश्लेषणात्मक निर्णय (Synthetic Judgement) वह निर्णय है जिसमें विधेय (predicate) कर्ता (subject) में निहित नहीं होता, बल्कि उसमें कुछ नया जोड़ा जाता है। यह अनुभव पर आधारित होता है और इसकी सत्यता अनुभव द्वारा सत्यापित की जाती है। उदाहरण के लिए, "यह फूल लाल है" — यहाँ 'लाल' विशेषण फूल के अर्थ में निहित नहीं है, बल्कि अनुभव से ज्ञात होता है। कांट (Kant) के अनुसार, संश्लेषणात्मक निर्णय हमारे ज्ञान का विस्तार करते हैं, जबकि विश्लेषणात्मक निर्णय केवल पहले से ज्ञात को स्पष्ट करते हैं।

9. मनुष्य जीवन में आध्यात्मिक पर्यावरण क्यों आवश्यक है ?

Why is spiritual environment required in human life ?

उत्तर: मनुष्य जीवन में आध्यात्मिक पर्यावरण इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह मनुष्य को भौतिक सुखों से परे जीवन के गहरे अर्थ और उद्देश्य को समझने में सहायता करता है। यह नैतिक मूल्यों, करुणा, सहानुभूति और आंतरिक शांति का विकास करता है। आध्यात्मिक पर्यावरण मनुष्य को तनाव, अहंकार और भौतिक आसक्तियों से मुक्त कर आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाता है। यह सामाजिक सद्भाव और वैश्विक कल्याण की भावना को भी बढ़ावा देता है, जो एक सार्थक और संतुलित जीवन के लिए अनिवार्य है।

10. व्यापार का क्या उद्देश्य है — सेवा या लाभ ?

What is the aim of Business — Service or Profit ?

उत्तर: व्यापार का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना भी है। आधुनिक दृष्टिकोण में, व्यापार को एक सामाजिक संस्था माना जाता है जिसका उत्तरदायित्व ग्राहकों, कर्मचारियों, समाज और पर्यावरण के प्रति होता है। लाभ व्यापार की निरंतरता और विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन यह अंतिम उद्देश्य नहीं होना चाहिए। एक सफल व्यवसाय वही है जो सेवा और लाभ के बीच संतुलन स्थापित करता है, जहाँ सेवा से प्राप्त संतुष्टि ही दीर्घकालिक लाभ का आधार बनती है। इस प्रकार, व्यापार का वास्तविक उद्देश्य सेवा के माध्यम से लाभ अर्जित करना है।


खण्ड - ग (Section - C)

11. भारतीय दर्शन के मौलिक प्रत्ययों को समझाइए।

Explain the basic issues of Indian philosophy.

उत्तर: भारतीय दर्शन के मौलिक प्रत्यय निम्नलिखित हैं:

  1. आत्मा (Self/Soul): यह शाश्वत, अविनाशी और चेतन तत्व है जो शरीर से भिन्न है। सभी भारतीय दर्शन आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं।
  2. ब्रह्म (Ultimate Reality): यह सृष्टि का मूल कारण और परम सत्य है। अद्वैत वेदांत में ब्रह्म और आत्मा को एक माना गया है।
  3. कर्म और पुनर्जन्म (Karma and Rebirth): प्रत्येक कर्म का फल मिलता है, जो जीवन के चक्र (संसार) को निर्धारित करता है। अच्छे कर्मों से उत्तम जन्म और बुरे कर्मों से निम्न जन्म मिलता है।
  4. मोक्ष (Liberation): यह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति और परमानंद की अवस्था है। मोक्ष ही सभी दर्शनों का अंतिम लक्ष्य है।
  5. प्रमाण (Means of Knowledge): भारतीय दर्शन में ज्ञान प्राप्ति के विभिन्न साधन माने गए हैं, जैसे प्रत्यक्ष (perception), अनुमान (inference), शब्द (testimony) आदि।
  6. दुःख और उसका निवारण (Suffering and its Removal): अधिकांश भारतीय दर्शन संसार को दुःखमय मानते हैं और दुःख से मुक्ति के उपाय बताते हैं।

अथवा (OR)

भारतीय दर्शन में मोक्ष का पुरुषार्थ के रूप में क्या स्थान है ?

What is the status of Moksha as Purushartha in Indian Philosophy ?

उत्तर: भारतीय दर्शन में चार पुरुषार्थ (Purusharthas) माने गए हैं — धर्म (righteousness), अर्थ (wealth), काम (desire) और मोक्ष (liberation)। इनमें मोक्ष को सर्वोच्च और अंतिम पुरुषार्थ माना गया है। मोक्ष का अर्थ है जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) से पूर्ण मुक्ति और आत्म-साक्षात्कार। यह अन्य तीन पुरुषार्थों से इस प्रकार भिन्न है:

  • धर्म, अर्थ और काम सांसारिक जीवन से संबंधित हैं और इनका पालन मोक्ष प्राप्ति के साधन के रूप में किया जाता है।
  • मोक्ष इन तीनों से परे है और यह आत्मा की परम शांति और आनंद की अवस्था है।
  • सभी भारतीय दर्शन (चार्वाक को छोड़कर) मोक्ष को जीवन का परम लक्ष्य मानते हैं।
  • मोक्ष की प्राप्ति के लिए ज्ञान, भक्ति, कर्म या योग का मार्ग अपनाया जाता है।

इस प्रकार, मोक्ष का स्थान सर्वोच्च है और यह मानव जीवन की चरम सिद्धि है।

प्रश्न 22

निष्काम कर्म की धारणा को समझाइए ।

अथवा

गीता में स्थितप्रज्ञ पुरुष द्वारा किये जाने वाले कर्मों का क्या प्रयोजन है ? समझाइए ।

Explain the concept of Nishkama Karma.

OR

What is the purpose of actions (Karmas) performed by Sthitapragya person according to Geeta ? Explain.

निष्काम कर्म की धारणा: निष्काम कर्म का अर्थ है फल की इच्छा न रखते हुए कर्तव्य का पालन करना। गीता के अनुसार, मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी व्यक्तिगत लाभ या फल की आकांक्षा के करना चाहिए। यह कर्मयोग का मूल सिद्धांत है।

स्थितप्रज्ञ पुरुष के कर्मों का प्रयोजन: स्थितप्रज्ञ पुरुष वह है जो स्थिर बुद्धि वाला होता है। वह सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित करके करता है। उसके कर्मों का प्रयोजन लोकसंग्रह (समाज के कल्याण) और आत्मशुद्धि है, न कि व्यक्तिगत सुख या फल प्राप्ति। वह सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहता है और अपने कर्तव्य का पालन निरंतर करता है।

प्रश्न 23

प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त को समझाइए ।

अथवा

अनेकान्तवाद के सिद्धान्त को समझाइए ।

Explain the theory of Pratityasamutpada.

OR

Explain the theory of Anekantavada.

प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धान्त: यह बौद्ध दर्शन का मूल सिद्धांत है। इसका अर्थ है "कारणों के समुत्पन्न होने पर प्रभाव उत्पन्न होता है"। इसके अनुसार, संसार की सभी वस्तुएँ और घटनाएँ परस्पर कारण-कार्य संबंधों से जुड़ी हैं। कोई भी वस्तु स्वतंत्र रूप से उत्पन्न नहीं होती। यह सिद्धांत बारह अंगों (द्वादश निदान) के रूप में समझाया जाता है, जो जन्म, जरा, मरण और दुख के चक्र को स्पष्ट करता है।

अनेकान्तवाद का सिद्धान्त: यह जैन दर्शन का प्रमुख सिद्धांत है। इसका अर्थ है "अनेक पक्षों या दृष्टिकोणों का सिद्धांत"। इसके अनुसार, किसी भी वस्तु या सत्य को केवल एक दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता। प्रत्येक वस्तु में अनेक गुण और पहलू होते हैं। यह सिद्धांत स्याद्वाद (शायदवाद) के रूप में प्रसिद्ध है, जो सापेक्षिक सत्य को स्वीकार करता है और किसी एक पक्ष को पूर्ण सत्य नहीं मानता।

प्रश्न 24

योग क्या है ? इसके आठ अंगों (अष्टांग योग) को समझाइए ।

अथवा

अनुमान प्रमाण क्या है ? इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए ।

What is Yoga ? Explain the eight-fold path of Yoga.

OR

What is Inference (Anumana-Pramana) ? Describe its various kinds.

योग: योग का अर्थ है "जुड़ना" या "एकाग्रता"। पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार, योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। यह शरीर, मन और आत्मा के संतुलन और एकीकरण की विधि है।

अष्टांग योग के आठ अंग:

  1. यम: सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे नैतिक नियम।
  2. नियम: शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान जैसे व्यक्तिगत अनुशासन।
  3. आसन: शारीरिक मुद्राएँ जो शरीर को स्थिर और स्वस्थ रखती हैं।
  4. प्राणायाम: श्वास नियंत्रण की क्रिया।
  5. प्रत्याहार: इंद्रियों को विषयों से हटाना।
  6. धारणा: मन को एक बिंदु पर केंद्रित करना।
  7. ध्यान: निरंतर एकाग्रता की स्थिति।
  8. समाधि: आत्मा और परमात्मा के मिलन की अवस्था।

अनुमान प्रमाण: अनुमान का अर्थ है "अनुभव के आधार पर निष्कर्ष निकालना"। यह न्याय दर्शन का दूसरा प्रमाण है। इसमें किसी व्याप्ति (सामान्य नियम) के आधार पर अप्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होता है।

अनुमान के प्रकार:

  • स्वार्थानुमान: अपने लिए अनुमान लगाना।
  • परार्थानुमान: दूसरों को समझाने के लिए अनुमान प्रस्तुत करना।
  • पूर्ववत् अनुमान: कारण से कार्य का अनुमान (जैसे बादल देखकर वर्षा का अनुमान)।
  • शेषवत् अनुमान: कार्य से कारण का अनुमान (जैसे नदी में बाढ़ देखकर वर्षा का अनुमान)।
  • सामान्यतोदृष्ट अनुमान: सामान्य नियम के आधार पर अनुमान (जैसे इंद्रियों के स्थानांतरण से आत्मा का अनुमान)।

25.

“ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या” शंकराचार्य के इस कथन से क्या अभिप्राय है ? समझाइए ।

अथवा

विवेकानन्द के अनुसार वेदान्त के मानव जीवन में व्यावहारिक महत्त्व को समझाइए ।


“Brahman satyam, Jagat mithya.” Explain the meaning of this statement of Sankaracharya.

OR

Explain the practical importance of Vedanta in Human life according to Vivekananda.

Solution (First option): शंकराचार्य के अनुसार, “ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या” का अर्थ है कि केवल ब्रह्म (परम सत्य) ही सत्य है, जबकि यह जगत (संसार) मिथ्या या भ्रामक है। ब्रह्म नित्य, अपरिवर्तनीय और एकमात्र सत्य है, जबकि जगत अस्थायी, परिवर्तनशील और अविद्या (अज्ञान) के कारण प्रतीत होता है। यह अद्वैत वेदांत का मूल सिद्धांत है, जो बताता है कि जगत का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, बल्कि यह ब्रह्म का ही एक भ्रमपूर्ण रूप है।

Solution (Second option): विवेकानन्द के अनुसार, वेदांत का मानव जीवन में व्यावहारिक महत्त्व यह है कि यह आत्म-साक्षात्कार, एकता, और सेवा पर बल देता है। वेदांत सिखाता है कि सभी प्राणियों में एक ही आत्मा निवास करती है, जिससे मानव में करुणा, सहिष्णुता और निःस्वार्थ सेवा की भावना जागृत होती है। यह व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ सामाजिक कल्याण के लिए प्रेरित करता है, जिससे जीवन सार्थक बनता है।

26.

डेकार्ट के अनुसार मन-शरीर सम्बन्ध को समझाइए ।

अथवा

स्पिनोजा के द्रव्य (ईश्वर) की धारणा को समझाइए ।


Explain mind-body relation according to Descartes.

OR

Explain the concept of substance (God) according to Spinoza.

Solution (First option): डेकार्ट के अनुसार, मन और शरीर दो अलग-अलग पदार्थ हैं। मन (आत्मा) चेतन, अविस्तारित और विचारशील है, जबकि शरीर अचेतन, विस्तारित और यांत्रिक है। ये दोनों परस्पर क्रिया करते हैं, विशेषकर पीनियल ग्रंथि के माध्यम से। डेकार्ट का मानना था कि मन शरीर को प्रभावित कर सकता है और शरीर मन को, लेकिन यह संबंध द्वैतवादी है। इसे “द्वैतवाद” (Cartesian Dualism) कहा जाता है।

Solution (Second option): स्पिनोजा के अनुसार, द्रव्य (ईश्वर) एकमात्र स्वतंत्र और अनंत सत्ता है, जो स्वयं का कारण है (Causa Sui)। ईश्वर ही एकमात्र द्रव्य है, जिसमें अनंत गुण (Attributes) हैं, जिनमें से मनुष्य केवल दो—चिंतन (Thought) और विस्तार (Extension)—को जान सकता है। स्पिनोजा का ईश्वर प्रकृति के समान है (Deus sive Natura), और सभी वस्तुएं ईश्वर के ही रूपांतरण हैं। यह एकेश्वरवादी और सर्वेश्वरवादी (Pantheistic) दृष्टिकोण है।

27.

लॉक के सरल प्रत्यय व जटिल प्रत्यय की धारणा को समझाइए ।

अथवा

बर्कले भौतिक पदार्थ का खण्डन किस प्रकार करता है ? समझाइए ।


Explain the concept of simple ideas and complex ideas according to Locke.

OR

How did Berkeley refute Matter ? Explain.

Solution (First option): लॉक के अनुसार, सभी विचार अनुभव से आते हैं। सरल प्रत्यय (Simple Ideas) वे हैं जो इंद्रियों या मनन (Reflection) से सीधे प्राप्त होते हैं, जैसे रंग, गंध, स्वाद, आकार आदि। ये अविभाज्य और मिश्रित नहीं होते। जटिल प्रत्यय (Complex Ideas) सरल प्रत्ययों के संयोजन से बनते हैं, जैसे पदार्थ (Substance), संबंध (Relation), और मोड (Mode) के विचार। मन सरल प्रत्ययों को जोड़कर, तुलना करके या अलग करके जटिल प्रत्यय बनाता है।

Solution (Second option): बर्कले भौतिक पदार्थ का खण्डन इस प्रकार करता है कि वह कहता है कि “अस्तित्व का अर्थ है अनुभव किया जाना” (Esse est percipi)। उनके अनुसार, कोई भी भौतिक पदार्थ स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं है; केवल मन और उसके विचार ही वास्तविक हैं। जिसे हम पदार्थ कहते हैं, वह केवल संवेदनाओं का समूह है। बर्कले तर्क देते हैं कि प्राथमिक और द्वितीयक गुणों में कोई अंतर नहीं है, दोनों ही मन पर निर्भर हैं। इस प्रकार, वह भौतिक पदार्थ के अस्तित्व को नकारते हैं और आदर्शवाद (Idealism) का समर्थन करते हैं।

प्रश्न 28

काण्ट का दर्शन समीक्षावाद क्यों कहलाता है ? समझाइए।

काण्ट का दर्शन समीक्षावाद (Criticalism) इसलिए कहलाता है क्योंकि उन्होंने ज्ञान की सीमाओं और संभावनाओं की गहन समीक्षा की। उन्होंने यह जांचा कि मानव बुद्धि क्या जान सकती है और क्या नहीं। काण्ट ने शुद्ध बुद्धि की समीक्षा करके यह स्थापित किया कि ज्ञान इंद्रिय अनुभव और बुद्धि की श्रेणियों के संयोग से संभव है। वे अनुभववाद और तर्कवाद दोनों की सीमाओं को पार करते हुए एक समीक्षात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें ज्ञान की वैधता और सीमाओं का निर्धारण किया जाता है।

अथवा

पूर्वानुभविक संश्लेषणात्मक निर्णय क्या होते हैं ? क्या काण्ट के अनुसार ये संभव है ?

पूर्वानुभविक संश्लेषणात्मक निर्णय (Apriori Synthetic Judgement) वे निर्णय होते हैं जिनमें विधेय कर्ता में निहित नहीं होता, बल्कि उसमें नई जानकारी जोड़ी जाती है, और यह निर्णय अनुभव से स्वतंत्र होता है। उदाहरण के लिए, "हर घटना का एक कारण होता है" – यह निर्णय अनुभव से पहले ही सत्य है और इसमें नई जानकारी (कारणता) जुड़ती है। काण्ट के अनुसार ये निर्णय संभव हैं क्योंकि ये गणित और प्राकृतिक विज्ञान के आधार हैं। वे इंद्रिय अनुभव और बुद्धि की श्रेणियों के संयोग से संभव होते हैं।


प्रश्न 29

अरस्तु के लक्ष्य कारण के सम्प्रत्यय को समझाइए।

अरस्तु के अनुसार, किसी भी वस्तु या घटना के चार कारण होते हैं: उपादान कारण, निमित्त कारण, रूप कारण और लक्ष्य कारण (Final Cause)। लक्ष्य कारण वह उद्देश्य या अंत है जिसके लिए कोई वस्तु अस्तित्व में आती है या कोई क्रिया होती है। उदाहरण के लिए, एक मूर्ति का लक्ष्य कारण उसका सौंदर्य या पूजा का उद्देश्य है। अरस्तु के अनुसार, प्रत्येक वस्तु का एक अंतर्निहित उद्देश्य (Telos) होता है, और यही लक्ष्य कारण उस वस्तु के विकास और गति को निर्धारित करता है।

अथवा

कारणता के परवर्तिता सिद्धान्त को समझाइए।

कारणता का परवर्तिता सिद्धान्त (Theory of Succession) डेविड ह्यूम द्वारा प्रतिपादित है। ह्यूम के अनुसार, कारणता का कोई आंतरिक संबंध नहीं है, बल्कि यह केवल घटनाओं के नियमित क्रम (Regular Succession) का परिणाम है। जब हम दो घटनाओं को बार-बार एक के बाद एक होते देखते हैं, तो हमारे मन में यह आदत बन जाती है कि पहली घटना कारण है और दूसरी कार्य। इस प्रकार, कारणता एक मानसिक आदत मात्र है, न कि वस्तुगत सत्य।


प्रश्न 30

विधिक नैतिकता को समझाइए।

विधिक नैतिकता (Legal Ethics) उन नैतिक सिद्धांतों और मानकों का समूह है जो कानूनी पेशे से जुड़े व्यक्तियों (जैसे वकील, न्यायाधीश) के आचरण को नियंत्रित करते हैं। इसमें ईमानदारी, निष्पक्षता, गोपनीयता, और न्याय के प्रति समर्पण जैसे मूल्य शामिल हैं। विधिक नैतिकता यह सुनिश्चित करती है कि कानूनी पेशेवर अपने कर्तव्यों का पालन नैतिक रूप से करें और न्याय प्रणाली में विश्वास बनाए रखें।

अथवा

पर्यावरण नैतिकता को समझाइए।

पर्यावरण नैतिकता (Environment Ethics) नैतिक दर्शन की वह शाखा है जो मनुष्य और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन करती है। यह बताती है कि मनुष्य का प्रकृति, जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों और पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति क्या नैतिक कर्तव्य हैं। पर्यावरण नैतिकता के अनुसार, प्रकृति का आंतरिक मूल्य है और मनुष्य को उसका संरक्षण करना चाहिए। यह पर्यावरणीय संकटों जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान के समाधान के लिए नैतिक दृष्टिकोण प्रदान करती है।