RBSE Class 12th 2015 Rajasthani Sahitya-SS-26-2015 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2015 |
| Subject | Rajasthani Sahitya-SS-26-2015 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2015 Rajasthani Sahitya-SS-26-2015
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Rajasthan Board Class 12th Rajasthani Sahitya-SS-26-2015 2015 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2015
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2015
राजस्थानी साहित्य
(RAJASTHANI SAHITYA)
नामांक (Roll No.): _______________
प्रश्नों की संख्या (No. of Questions): 4
प्रश्न-पत्र कोड: SS—26-Raj. Sah.
मुद्रित पृष्ठों की संख्या (No. of Printed Pages): 7
समय (Time): 3 घंटे
पूर्णांक (Max. Marks): 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश:
- परीक्षार्थी सबसे पहले अपने उत्तर-पत्रक पर नामांक अवश्य लिखें।
- सभी प्रश्न हल करना अनिवार्य है।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर उत्तर-पुस्तिका में ही लिखना है।
- यदि किसी प्रश्न के एक से अधिक भाग हैं, तो उन सभी के उत्तर एक साथ लगातार लिखें।
- लेखन में शुद्धता और वैज्ञानिक विवेचन करने पर अधिक अंक दिए जाएंगे।
- वर्तनी, व्याकरण और सुलेख का विशेष ध्यान रखें और उसके अनुसार अंक दिए जाएंगे।
- उत्तर राजस्थानी भाषा में ही देने हैं।
- प्रश्नों के अंक और प्रश्नांक सही ढंग से अंकित हैं।
SS—26-Raj. Sah. | SS-6026 | [Turn over]
लिख्या गद्यावतरणां री सप्रसंग व्याख्या करो —
(क) शहर री ओक सांकड़ी वात में अक आंधे-सै ओरियै में अक बेवा पींजारी बरस पचास-पिचपनेक री अर बींरो बेटो हुसैनियो बरस तेरह-चवदैक रौ बसे। ऊमर सूं तो बाइसी डोकरी नीं हुई पण रोग भूख अर अणगिण चिंतावा बीनैं बेरहमी सूं कूट-कूट बींरा जीवण पान झड़का अकाल में ई ढंखर कर दी। धांसी अर लोही शरीर में खासो भलो सूकग्यो। चामड़ी चुस'र पींजरै रै चिपगी। सूखो-पाको साम्हों आबै जिसो पेट में नांखले, नई तो अल्ला-अल्ला खैर, बैठी मांख्यां सेरा अर मौत नै उडीकै।
सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश राजस्थानी साहित्य के एक प्रसिद्ध लेखक की रचना से लिया गया है। इसमें एक विधवा पींजारी (रुई धुनने वाली) और उसके बेटे हुसैनियो की दयनीय स्थिति का चित्रण है। लेखक ने गरीबी, भूख, रोग और चिंताओं से जूझते हुए इस परिवार के जीवन को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। 'बाइसी डोकरी नीं हुई' का अर्थ है कि वह उम्र में बूढ़ी नहीं थी, लेकिन कष्टों ने उसे बूढ़ा बना दिया। 'धांसी अर लोही शरीर में खासो भलो सूकग्यो' से तात्पर्य है कि शरीर की सारी ताकत और रक्त सूख गया। 'चामड़ी चुस'र पींजरै रै चिपगी' का आशय है कि त्वचा हड्डियों से चिपक गई। अंत में लेखक कहता है कि वह मौत की प्रतीक्षा कर रही है। इस गद्यांश में समाज के निचले तबके की पीड़ा को मार्मिकता से उकेरा गया है।
अथवा
टाबर उस अर नौकरी लाग ज्यावै, अफसर बण ज्यावै, परिवार बढण लागग्या, गांवां में ज्यान आवण लागगी, घर सुधरण लागग्या। घर सुधरै, परिवार सुधरै तो समाज सुधरै, देस सुधरै। फैर स्वामी जी रौ तो हॉसलो बधण लागग्यो। स्वामी जी कनै आदमी बणाणै री कला है, लोगां रौ जी जमग्यो, अबै लोग स्वामी जी नै आदमी सूं ऊपर मानण लागग्या, अबै स्वामी जी अद भी जांवता, धन री बिरखा होवण अम ज्यांवती।
सप्रसंग व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश में स्वामी जी के प्रयासों से हुए सकारात्मक परिवर्तनों का वर्णन है। बच्चे पढ़-लिखकर नौकरी करने लगे, अफसर बन गए, परिवार बढ़ने लगा, गाँवों में जान आ गई और घर सुधरने लगे। लेखक का मानना है कि घर और परिवार के सुधार से समाज और देश का सुधार होता है। स्वामी जी का हौसला बढ़ गया क्योंकि उनमें इंसान बनाने की कला है। लोग उन्हें सामान्य मनुष्य से ऊपर मानने लगे। अंत में कहा गया है कि अब स्वामी जी जहाँ भी जाते हैं, वहाँ धन की वर्षा होने लगती है। इस गद्यांश में एक समाज सुधारक के प्रभाव और उसके कार्यों की सफलता को दर्शाया गया है।
प्रश्न (ख)
गंगा तलाब री सीढ़ियां पर बैठा लोग जिण भावनां सूं आपरा बडैरा री अस्थियां नै विसरजित कर रहया हा वांने देख'र म्हनै हरद्वार री हर री पैड़ी याद आगी, अठै बी लोग आपणा दिवंगत लोगां रा अस्थि पुष्प लेर गंगा में विसर्जित करबा हरद्वार जावा। आस्था अर बिस्वास रौ अनूठौ संगम देख 'र म्है भाव विभोर हुयग्यो। धन है भारत भूमि ! धन है अठा रा लोग ! अर धन है अठा रा रीति रिवाज। बरसां पैली अठां सूं गियोड़ा लोगां रे अठारी आस्था, विस्वास, मानता आज भी अठारा मूल लोगां रै मन मांय ज्यूं री त्यूं बसी है।
व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने गंगा तलाब की सीढ़ियों पर बैठे लोगों को अपने पूर्वजों की अस्थियाँ विसर्जित करते देखा। यह दृश्य उन्हें हरद्वार की हर की पैड़ी की याद दिलाता है। लेखक भारत भूमि, उसके लोगों और उनकी रीति-रिवाजों की प्रशंसा करता है, क्योंकि वर्षों बाद भी लोगों की आस्था और विश्वास में कोई बदलाव नहीं आया है। यह आस्था और विश्वास का अनूठा संगम है जो लेखक को भावविभोर कर देता है।
अथवा
साहित्य में आनंद ही उपदेश और उपदेश ही आनंद बण जाबै, आनंद और उपदेश में कोई अंतर नहीं रह जावै। आनंद अर उपदेश रौ ऐसा ही साहित्य रौ प्रयोजन है। साचो साहित्य मन ने आप में रमायने जीवण नै उदात्ततारी दिशा में अग्रसर करै। वो जीवण में आनंद भरै, उल्लास भरै, सजीवता भरै। उण में भोग है, जठै कर्म भी है। उण में सत्य है, चैतन्य है, आनंद है। वो सत्य है, वो शिव है, वो सुंदर है। वो सत्य और ज्ञान रूप अनन्त ब्रह्म रौ रूप है।
व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश में साहित्य के प्रयोजन पर विचार किया गया है। लेखक के अनुसार, सच्चे साहित्य में आनंद और उपदेश में कोई भेद नहीं रहता; दोनों एक हो जाते हैं। साहित्य का उद्देश्य मन को रमाकर जीवन को उदात्त दिशा देना है। यह जीवन में आनंद, उल्लास और सजीवता भरता है। इसमें भोग और कर्म दोनों का समावेश है। सच्चा साहित्य सत्य, शिव और सुंदर का प्रतिनिधित्व करता है, जो अनन्त ब्रह्म का रूप है।
प्रश्न 4 (ग)
ईश्वर री लीला रो कई पार नीं, अपरम्पार है। जठै दांत है बठै चणा कोनी अर जठै चणा है वाँ दांत कोनी। जिकी बातां री संका मूलकी मासी नें खैती, सूरजड़ी रै हियै हबूकड़ो उठा, माधे है खिल्योड़े उणियारै नै कुम्हेला देवती, बै बातां सांप्रतेक दीखण लागली। इण बात रो परमाण भी मिलण लागग्यो कै भानो अंधे बढ़ग्यो है। बो रिण सूं खूब दब्योड़ो है। बो दारू बेसी पीवण लाग्यो है।
अथवा
लाचार हूँ। तूं नीं जाणै कै हूं अठै कित्तो फंदै में पड़ग्यो हूँ। ........... करज ई करज गिरी तो मारण ताईं री धमकी दे दी है। दोसे रा पांचसो लिखा लिया है। बेसी समझावूं अर भरोसो दूं तो कैवै .... थारी लुगाई ने म्हार कने भेज दे। आज म्हैं बीं रो गलो झाल लियो। Stet हालत में कियां रह सकूंला। मनै जाणो ई पड़ैलो, नीं तो लोग मनें बड़ै घर भेज दे वैला या भो भरो फोड़ देला।
व्याख्या: यह अंश राजस्थानी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक श्री विजयदान देथा की कहानी 'दुविधा' से लिया गया है। पहले भाग में ईश्वर की लीला की अपरम्पारता और विरोधाभासों (जैसे दांत-चणा का न होना) को दर्शाया गया है, जो मूलकी मासी और सूरजड़ी के माध्यम से व्यक्त होता है। दूसरे भाग में एक लाचार व्यक्ति की मानसिक दशा का चित्रण है, जो कर्ज के बोझ और धमकियों से घिरा हुआ है। यह कहानी मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ को उजागर करती है।
— पृष्ठ 4 का समाप्त —
प्रश्न 2 से 7
2. “अकल री वात” कहाणी में बुद्धि रौ चमत्कार अर महत्व दरसायौ गयौ है, इण कथन नै समझाओ।
उत्तर: “अकल री वात” कहाणी में बुद्धि के चमत्कार और महत्व को दर्शाया गया है। इस कहानी में एक गरीब ब्राह्मण अपनी बुद्धि के बल पर कठिन परिस्थितियों का सामना करता है और सफलता प्राप्त करता है। कहानी का मुख्य संदेश यह है कि बुद्धि ही सबसे बड़ी शक्ति है, जो मनुष्य को हर संकट से उबार सकती है। बुद्धि के प्रयोग से व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली बाधाओं को पार कर सकता है और समाज में सम्मान प्राप्त कर सकता है।
3. “गांव रा मास्टर जी” कहाणी मास्टर जी रै आरथिक संघर्ष री गाथा है, कहाणी रै कथानक रै आधार इण कथन नै सिद्ध करो।
उत्तर: “गांव रा मास्टर जी” कहानी में मास्टर जी के आर्थिक संघर्ष को प्रमुखता से दर्शाया गया है। कहानी का कथानक एक गाँव के शिक्षक के इर्द-गिर्द घूमता है, जो अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए अनेक कठिनाइयों का सामना करता है। उनकी कम आय और बढ़ती जिम्मेदारियों के कारण उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। कहानी में उनके संघर्ष, त्याग और समाज में शिक्षा के प्रति समर्पण को दर्शाया गया है, जो उनके आर्थिक संघर्ष की गाथा को सिद्ध करता है।
4. “दुनिया भर नै मढ़ौ पण पहल्यां अपणै आपने गढ़ो” इण कथन मांय निबंधकार रा क्या विचार है?
उत्तर: इस कथन में निबंधकार का विचार है कि व्यक्ति को दुनिया को बदलने या सुधारने से पहले स्वयं को सुधारना चाहिए। अर्थात् आत्म-सुधार ही सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है। जब तक व्यक्ति अपने आप को सही नहीं कर लेता, तब तक वह दूसरों या समाज को सही नहीं कर सकता। यह कथन आत्म-चिंतन और आत्म-विकास पर बल देता है, जो निबंधकार के दर्शन का मूल है।
5. “हूं गोरी किण पीव री” उपन्यास में भाना अर माधा में सूं किण ने नायक रूप में स्वीकार करो। तर्क रै साथे जबाब दो।
उत्तर: “हूं गोरी किण पीव री” उपन्यास में भाना को नायक के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। तर्क यह है कि भाना का चरित्र अधिक सशक्त, संघर्षशील और प्रभावशाली है। वह उपन्यास की कथा को आगे बढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभाता है। माधा की तुलना में भाना के कार्य और निर्णय कहानी की दिशा तय करते हैं। इसके अलावा, भाना के माध्यम से लेखक ने सामाजिक मुद्दों और मानवीय संवेदनाओं को अधिक गहराई से उजागर किया है, जो उसे नायक के रूप में स्थापित करता है।
6. आधुनिक राजस्थानी निबंध माथै आलेख लिखो।
उत्तर: आधुनिक राजस्थानी निबंध साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है, जिसने 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विशेष विकास किया। आधुनिक राजस्थानी निबंध में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है। इस विधा के प्रमुख लेखकों में विजयदान देथा, नरोत्तम स्वामी, और कन्हैयालाल सेठिया शामिल हैं। आधुनिक राजस्थानी निबंध की विशेषता है कि इसमें सरल और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग किया जाता है, जो आम जनता तक संदेश पहुँचाने में सहायक होती है। निबंधों में राजस्थान की संस्कृति, परंपराओं और समकालीन समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है, जिससे यह विधा जन-जागरण का माध्यम बनी है।
7. नीचै लिख्या विसयां मांय सूं किणी अक विसय माथै राजस्थानी भासा में निबंध लिखौ।
- राजस्थानी तीज त्यूंहार
- शिक्षा रौ मौलिक अधिकार
- विद्यालय रौ वार्षिकोत्सव
- आजादी रौ उच्छब (5 अगस्त)
उत्तर (राजस्थानी तीज त्यूंहार): राजस्थानी तीज त्यूंहार राजस्थान संस्कृति रौ अभिन्न अंग है। तीज रौ पर्व सावन मास मांय मनायौ जावै है। इण दिन सुहागण स्त्रियां व्रत रखै हैं अर सोलह श्रृंगार करै हैं। तीज रै दिन झूला झूलण, गीत गावण अर मेवा खावण री परंपरा है। इण पर्व मांय देवी पार्वती री पूजा करी जावै है, जे सुहाग री देवी मानी जावै है। तीज रौ पर्व राजस्थानी समाज मांय प्रेम, एकता अर सांस्कृतिक धरोहर नै जीवित राखण रौ माध्यम है। इण दिन गांव-गांव मांय मेले लागै हैं, जहां लोकनाट्य अर नृत्य रौ आयोजन होवै है। तीज राजस्थानी जीवनशैली रौ प्रतीक है, जे आज भी अपणी मौलिकता नै बनाए राख्यौ है।
8. नीचै लिख्यां पद्यांसां री सप्रसंग व्याख्या करो :
(अ) पद्यांश
नरग पड़इ का बापड़ा, कांह लगाड़॒इ Gifs |
रावण हुयो कुसीलियो, wees कवियण कोड़ि ॥
कां तूं परणी आपणी, छोडि कुलीनी नारि ।
परणी बांछइ पारकी, मूरख हियइ विचारि ॥
अथवा
de पड़ोस कायर नरां, हेली ! वास सुहाय |
बलिहारी जिण देसड़ै, माथा मोल बिकाय ॥
ढोल सुणंतां मंगली, मूंछा भूंह चढंत ।
चंवरी-में पीछाणियो, कंवरी मरणो कंत ॥
सप्रसंग व्याख्या
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश राजस्थानी साहित्य के एक प्रसिद्ध कवि द्वारा रचित है। इसमें नैतिकता, साहस और देशभक्ति के भावों को उजागर किया गया है।
व्याख्या: पहले पद्यांश में कवि कहता है कि नरक में पड़ने वाले व्यक्ति को क्या लगता है? रावण भी कुसील (दुर्गुणी) होने के कारण कवियों की कोड़ी (समूह) में गिना जाता है। वह अपनी कुलीन पत्नी को छोड़कर पराई स्त्री की इच्छा करता है, जो मूर्खों का विचार है। दूसरे पद्यांश में कवि कहता है कि कायर पुरुषों के पड़ोस में रहना सुखद नहीं होता। वह उस देश की बलिहारी करता है जहाँ सिर मोल बिकता है (अर्थात् वीरता का मूल्य है)। ढोल सुनते ही मूंछें और भौहें चढ़ जाती हैं, और चंवरी (युद्धक्षेत्र) में कंवरी (युवती) के पति की मृत्यु पहचानी जाती है।
(ब) पद्यांश
इण में हाड़ी लल॒कार करी, जद आंतड़ियां परनाली ही ।
मुरधर री बागडोर, इण में ही, दुरगादास संभाली ही ॥
इण में प्रताप रौ प्रण गूंज्यौ, जद भेंट करी भामासा है ।
सतवादी घणा सपूतां री, आ राजस्थानी भाषा है ॥
अथवा
दौड़ा-दौड़ मचाता साबा
मंदरा-मंदरा तपता आबा
काची महकी बेच ठगोरी, कतनी बार मरूं ?
Het बार मरूं ?
सप्रसंग व्याख्या
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश राजस्थानी भाषा की महिमा और वीरता के गौरव को दर्शाता है। इसमें राजस्थान के वीर सपूतों और उनके बलिदानों का वर्णन है।
व्याख्या: पहले पद्यांश में कवि कहता है कि इसी राजस्थानी भाषा में हाड़ी (हाड़ा वंश) ने ललकारा, जब आंतड़ियाँ (अंतड़ियाँ) परनाली (बाहर निकल गईं) थीं। इसी भाषा में दुर्गादास ने मुरधर (मुगलों) की बागडोर संभाली। इसी भाषा में प्रताप का प्रण गूंजा, जब भामाशाह से भेंट हुई। यह राजस्थानी भाषा सत्यवादी और अनेक सपूतों की भाषा है। दूसरे पद्यांश में कवि व्यथा व्यक्त करता है कि साबा (साबा नामक व्यक्ति) दौड़-दौड़ कर मचाता है, मंदरा-मंदरा (धीरे-धीरे) तपता है, और कच्ची महकी बेचकर ठगोरी (ठगी) करता है, तो कितनी बार मरूं? हे ईश्वर, कितनी बार मरूं?
प्रश्न 9 से 14 (5 अंक प्रत्येक)
प्रश्न 9.
सांयाजी झूलारी काव्य कृति "नागदमण" रौ कथासार आपरै सबदां में लिखो।
उत्तर: "नागदमण" सांयाजी झूलारी द्वारा रचित एक प्रसिद्ध काव्य कृति है। इसका कथासार इस प्रकार है:
यह काव्य भगवान कृष्ण द्वारा कालिया नाग के दमन की कथा पर आधारित है। कालिया नाग यमुना नदी में विष फैलाकर जनजीवन को संकट में डाल रहा था। भगवान कृष्ण ने अपनी बाल लीलाओं के दौरान यमुना में कूदकर कालिया नाग का दमन किया और उसे यमुना छोड़ने का आदेश दिया। कालिया नाग ने कृष्ण की शरण ली और यमुना छोड़कर समुद्र में चला गया। इस प्रकार कृष्ण ने जनता को नाग के भय से मुक्ति दिलाई।
प्रश्न 10.
राजिया रा सोरठा वर्तमान समय रै यथार्थ री नीति रौ खरो चित्रण है, स्पष्ट करो।
उत्तर: राजिया के सोरठे वर्तमान समय के यथार्थ का सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। उनके सोरठों में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विसंगतियों का मार्मिक वर्णन मिलता है। वे गरीबी, शोषण, भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता जैसी समस्याओं को उजागर करते हैं। उनकी रचनाओं में जनसाधारण की पीड़ा और संघर्ष का यथार्थ चित्रण है, जो वर्तमान समय की नीति का खरा चित्रण प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 11.
संकरदान सामौर साचा अरथां में अक निरभीक राष्ट्रीय कवि हा, समझावो।
उत्तर: संकरदान सामौर सच्चे अर्थों में एक निर्भीक राष्ट्रीय कवि थे। उनकी कविताओं में देशभक्ति, स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक जागरण का भाव प्रमुखता से मिलता है। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनता को जागरूक करने का कार्य किया। उनकी रचनाओं में राजस्थानी भाषा और संस्कृति का गौरवगान मिलता है। वे किसी भी प्रकार के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ बिना किसी भय के अपनी बात कहने में सक्षम थे, इसलिए उन्हें निर्भीक राष्ट्रीय कवि कहा जाता है।
प्रश्न 12.
काव्य री परिभाषा देवतां थकां उण रौ प्रयोजन समझावौ।
उत्तर: काव्य की परिभाषा: काव्य वह साहित्यिक विधा है जिसमें भावनाओं, विचारों और अनुभवों को सौंदर्यपूर्ण भाषा में अभिव्यक्त किया जाता है। प्राचीन आचार्यों के अनुसार "रसात्मक वाक्य ही काव्य है" अर्थात जिस वाक्य में रस की अनुभूति होती है, वह काव्य कहलाता है।
काव्य का प्रयोजन: काव्य का मुख्य प्रयोजन मनोरंजन के साथ-साथ जीवन में सत्य, शिव और सुंदर का बोध कराना है। यह मानवीय भावनाओं को परिष्कृत करता है, नैतिक मूल्यों का विकास करता है और समाज में जागरूकता लाता है। काव्य व्यक्ति को संवेदनशील बनाकर जीवन को अधिक सार्थक बनाने में सहायक होता है।
प्रश्न 13.
वेन छंद री परिभासा देतां थकां उदाहरण देवौ।
उत्तर: वेन छंद की परिभाषा: वेन छंद एक मात्रिक छंद है जिसमें प्रत्येक चरण में 21 मात्राएँ होती हैं। इसके चार चरण होते हैं और प्रत्येक चरण के अंत में गुरु-लघु का विशेष क्रम होता है।
उदाहरण:
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन देखी।
तिनहीं को रूप धरि प्रभु, दीन्ही दरस सुख देखी॥"
इस उदाहरण में प्रत्येक चरण में 21 मात्राएँ हैं और छंद के नियमों का पालन किया गया है।
प्रश्न 14.
रूपक अलंकार री परिभासा दाखला देय'र समझावौ।
उत्तर: रूपक अलंकार की परिभाषा: जहाँ उपमेय पर उपमान का आरोप किया जाता है, अर्थात उपमेय को उपमान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसमें दोनों में अभेद दिखाया जाता है।
उदाहरण:
"चरण कमल बंदौ हरि राई।"
यहाँ चरण (उपमेय) को कमल (उपमान) के रूप में प्रस्तुत किया गया है, अतः रूपक अलंकार है।
स्पष्टीकरण: इस उदाहरण में भगवान के चरणों को कमल के समान नहीं बताया गया, बल्कि सीधे कमल कह दिया गया है, जो रूपक अलंकार का लक्षण है।