RBSE Class 12th 2016 Philosophy-SS-85-2016 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2016 |
| Subject | Philosophy-SS-85-2016 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2016 Philosophy-SS-85-2016
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Rajasthan Board Class 12th Philosophy-SS-85-2016 2016 solved Previous Year Question Papers
उच्च माध्यमिक परीक्षा, 2016
SENIOR SECONDARY EXAMINATION, 2016
दर्शनशास्त्र
PHILOSOPHY
समय : 3¼ घण्टे पूर्णांक : 80
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
Candidate must write first his / her Roll No. on the question paper compulsorily. - सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
All the questions are compulsory. - प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
Write the answer to each question in the given answer-book only. - जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
For questions having more than one part the answers to those parts are to be written together in continuity.
नामांक / Roll No. : ___________ SLNo. : ___________
No. of Questions — 30 SS-85-PHILOSOPHY
No. of Printed Pages — 07
प्रश्न पत्र को खोलने के लिए यहाँ फाड़ें
TEAR HERE TO OPEN THE QUESTION PAPER
खण्ड - अ / SECTION - A
निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिये :
Define each of the following :
-
मोक्ष / Moksha
मोक्ष (Moksha) का अर्थ है आत्मा का जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाना। यह भारतीय दर्शन में जीवन का परम लक्ष्य माना जाता है, जिसमें आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है या अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है।
Moksha means liberation of the soul from the cycle of birth and death. It is considered the ultimate goal of life in Indian philosophy, where the soul merges with the Supreme or abides in its pure nature.
-
लोकसंग्रह / Loksangraha
लोकसंग्रह (Loksangraha) का अर्थ है समाज के कल्याण और व्यवस्था के लिए कर्म करना। यह गीता में वर्णित एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसके अनुसार व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए समाज के हित का ध्यान रखना चाहिए।
Loksangraha means acting for the welfare and order of society. It is an important principle described in the Gita, according to which a person should perform their duties while keeping the welfare of society in mind.
SS-85-Philosophy 435
खण्ड - ब / SECTION - B
अति लघुत्तरात्मक प्रश्न (Very Short Answer Questions)
-
3) नय (Naya)
जैन दर्शन में 'नय' का अर्थ है किसी वस्तु के एक विशेष दृष्टिकोण से ज्ञान करने की विधि। यह सापेक्ष ज्ञान का एक रूप है जो वस्तु के एक पक्ष को ग्रहण करता है।
-
4) प्राणायाम (Pranayama)
प्राणायाम योग का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसमें श्वास (प्राण) को नियंत्रित किया जाता है। इसमें रेचक (श्वास छोड़ना), पूरक (श्वास लेना) और कुम्भक (श्वास रोकना) तीन क्रियाएँ शामिल हैं।
-
5) अद्वैतवाद (Absolute Monism)
अद्वैतवाद शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित वेदांत दर्शन का एक सिद्धांत है जो ब्रह्म को एकमात्र सत्य मानता है। इसके अनुसार जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है, और जगत माया है।
-
6) प्रत्यक्ष (Perception)
प्रत्यक्ष ज्ञान का वह रूप है जो इंद्रियों और मन के सीधे संपर्क से उत्पन्न होता है। यह प्रमाण का सबसे प्रमुख साधन माना जाता है।
-
7) निमित्त कारण (Instrumental Cause)
निमित्त कारण वह कारण है जो किसी कार्य को उत्पन्न करने में सहायक होता है, किंतु स्वयं उस कार्य में परिणत नहीं होता। उदाहरण: घड़ी बनाने में कुम्हार निमित्त कारण है।
-
8) प्रयोजन (Purpose)
प्रयोजन का अर्थ है किसी कार्य को करने का उद्देश्य या लक्ष्य। दर्शन में प्रयोजन को मानव जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति के रूप में देखा जाता है।
-
9) अन्तर्क्रियावाद (Interactionism)
अन्तर्क्रियावाद मन और शरीर के संबंध का एक सिद्धांत है जो मानता है कि मन और शरीर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। डेकार्टे इस सिद्धांत के प्रमुख प्रवर्तक हैं।
-
10) नैतिकता (Morality)
नैतिकता मानव आचरण के उन नियमों का समूह है जो अच्छे और बुरे, उचित और अनुचित का निर्धारण करते हैं। यह समाज में व्यवस्था और सद्भाव बनाए रखने में सहायक होती है।
लघुत्तरात्मक प्रश्न (Short Answer Question)
-
‘धर्म’ पुरुषार्थ के महत्त्व को स्पष्ट कीजिये।
Explain the significance of 'Dharma Purushartha'.
धर्म पुरुषार्थ का महत्त्व निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होता है:
- आधारभूत पुरुषार्थ: धर्म को चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में सबसे प्रमुख माना गया है क्योंकि यह अन्य पुरुषार्थों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
- सामाजिक व्यवस्था: धर्म समाज में न्याय, समानता और व्यवस्था बनाए रखने में सहायक होता है। यह व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा देता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: धर्म का पालन करने से व्यक्ति के मन में शुद्धता, सत्यनिष्ठा और दया जैसे गुणों का विकास होता है, जो आध्यात्मिक प्रगति में सहायक हैं।
- मोक्ष का साधन: धर्म का पालन करने से व्यक्ति कर्मों के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
- नैतिक मार्गदर्शन: धर्म व्यक्ति को सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता प्रदान करता है, जिससे वह जीवन में उचित निर्णय ले सकता है।
इस प्रकार, धर्म पुरुषार्थ मानव जीवन को सार्थक, व्यवस्थित और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
SS-85-Philosophy 435 | Turn Over
गीता के अनुसार निष्काम कर्म को समझाइये।
Explain the Nishkama Karma according to Geeta.
निष्काम कर्म का अर्थ है बिना किसी फल की इच्छा के कर्म करना। गीता के अनुसार, मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, लेकिन उसे कर्मों के फलों की चिंता नहीं करनी चाहिए। यह कर्मयोग का मूल सिद्धांत है। निष्काम कर्म करने से मनुष्य बंधनों से मुक्त हो जाता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। गीता में कहा गया है कि "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" अर्थात तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है, फलों में नहीं।
द्वादश निदान के अनुसार 'षडायतन' का वर्णन कीजिये।
Describe the 'Shadayatana' according to Dvadasha nidana.
बौद्ध दर्शन के अनुसार, द्वादश निदान (बारह कड़ियाँ) जन्म-मृत्यु के चक्र को समझाती हैं। षडायतन (छह आयतन) पाँचवीं कड़ी है। इसका अर्थ है छह इंद्रियाँ और उनके विषय: आँख (रूप), कान (शब्द), नाक (गंध), जीभ (रस), त्वचा (स्पर्श), और मन (धर्म)। यह स्पर्श (छठी कड़ी) का कारण है, जिससे वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति, और अंततः जरा-मरण होता है। षडायतन दुख के चक्र में एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
वैशेषिक दर्शन के अनुसार पंचमहाभूत का वर्णन कीजिये।
Describe Panchamahabhutas according to Vaisheshik philosophy.
वैशेषिक दर्शन के अनुसार, पंचमहाभूत पाँच मूलभूत तत्व हैं जो भौतिक जगत का निर्माण करते हैं:
- पृथ्वी (पृथ्वी) - गंध गुण वाला, ठोस पदार्थ।
- जल (जल) - रस गुण वाला, तरल पदार्थ।
- अग्नि (अग्नि) - रूप गुण वाला, ऊष्मा और प्रकाश देने वाला।
- वायु (वायु) - स्पर्श गुण वाला, गैसीय पदार्थ।
- आकाश (आकाश) - शब्द गुण वाला, सर्वव्यापी और निराकार।
ये सभी तत्व परमाणुओं से बने हैं और इनमें विशिष्ट गुण होते हैं।
पारमार्थिक जगत् क्या है? वर्णन कीजिये।
What is Trancendental world? Describe.
पारमार्थिक जगत् (ट्रान्सेंडेंटल वर्ल्ड) वह सत्य और शाश्वत सत्ता है जो अनुभवजन्य जगत से परे है। यह ब्रह्म, परमात्मा या निर्गुण ब्रह्म का क्षेत्र है, जो माया से रहित है। यह अद्वैत वेदांत के अनुसार एकमात्र सत्य है, जबकि व्यावहारिक जगत मिथ्या है। पारमार्थिक जगत में न कोई द्वैत है, न समय, न स्थान। इसे केवल ज्ञान और ध्यान के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है।
जन्मजात प्रत्यय की धारणा को समझाइये।
Explain the concept of Innate Idea.
जन्मजात प्रत्यय (इनेट आइडिया) वे विचार या ज्ञान हैं जो जन्म से ही मानव मन में विद्यमान होते हैं, न कि अनुभव से प्राप्त होते हैं। यह अवधारणा प्लेटो और डेकार्टे जैसे दार्शनिकों ने दी। प्लेटो के अनुसार, आत्मा में जन्म से पूर्व का ज्ञान होता है जो स्मरण (एनामनेसिस) द्वारा पुनः प्राप्त होता है। डेकार्टे ने ईश्वर, आत्मा और गणितीय सत्यों को जन्मजात माना। यह अनुभववाद के विपरीत है, जो सभी ज्ञान को इंद्रिय अनुभव से प्राप्त मानता है।
अरस्तु के अनुसार लक्ष्य / प्रयोजन कारण क्या है?
What is Final cause according to Aristotle.
अरस्तु के अनुसार, लक्ष्य कारण (फाइनल कॉज़) वह उद्देश्य या अंत है जिसके लिए कोई वस्तु अस्तित्व में आती है या कार्य करती है। यह चार कारणों (भौतिक, निमित्त, रूपात्मक, और लक्ष्य) में से एक है। उदाहरण के लिए, एक मूर्ति का लक्ष्य कारण उसकी सुंदरता या पूजा का उद्देश्य है। अरस्तु के अनुसार, प्रत्येक वस्तु का एक अंतर्निहित उद्देश्य (टेलोस) होता है, और यही उसके अस्तित्व की व्याख्या करता है।
ईश्वर के अस्तित्व के लिए दी गई सत्तामूलक युक्ति का वर्णन कीजिये।
Describe the Ontological argument to prove the existence of God.
सत्तामूलक युक्ति (ऑन्टोलॉजिकल आर्गुमेंट) ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने का एक तर्क है, जिसे सबसे पहले सेंट एंसेल्म ने प्रस्तुत किया। इसके अनुसार, ईश्वर की परिभाषा "सबसे महान सत्ता" है, जिससे बड़ी कोई और सत्ता नहीं हो सकती। यदि ईश्वर केवल मन में विद्यमान है, तो वह वास्तविकता में भी विद्यमान सत्ता से कम महान होगा। इसलिए, ईश्वर को वास्तविकता में भी अस्तित्व में होना चाहिए। डेकार्टे और स्पीनोजा ने भी इस तर्क का समर्थन किया।
स्पीनोजा के अनुसार मन व शरीर के समानान्तरवाद की धारणा को स्पष्ट कीजिये।
Explain the theory of mind - body parallalism according to Spinoza.
स्पीनोजा के अनुसार, मन और शरीर का समानान्तरवाद यह बताता है कि मन और शरीर दो अलग-अलग पदार्थ नहीं हैं, बल्कि एक ही पदार्थ (ईश्वर या प्रकृति) के दो गुण (एट्रीब्यूट) हैं। मन विचार का गुण है, जबकि शरीर विस्तार का गुण है। ये दोनों एक-दूसरे को प्रभावित नहीं करते, बल्कि समानांतर रूप से कार्य करते हैं। प्रत्येक शारीरिक घटना के समानांतर एक मानसिक घटना होती है, और इसके विपरीत। यह द्वैतवाद का एक रूप है जो कार्य-कारण संबंध को नकारता है।
पर्यावरण प्रदूषण के लिए मानव किस प्रकार उत्तरदायी है? टिप्पणी कीजिए।
How human beings are responsible for environmental pollution? Comment in brief.
मानव पर्यावरण प्रदूषण के लिए निम्नलिखित प्रकार से उत्तरदायी है:
- औद्योगिकीकरण: कारखानों से निकलने वाला धुआँ और रासायनिक अपशिष्ट वायु और जल प्रदूषण का कारण बनता है।
- वाहन प्रदूषण: वाहनों से निकलने वाली गैसें (कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड) वायु प्रदूषण बढ़ाती हैं।
- वनों की कटाई: पेड़ों को काटने से कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण कम होता है और जलवायु परिवर्तन होता है।
- प्लास्टिक का उपयोग: प्लास्टिक कचरा नदियों और महासागरों में जमा होकर जल प्रदूषण करता है।
- कृषि रसायन: कीटनाशकों और उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी और जल को प्रदूषित करता है।
इस प्रकार, मानव की गतिविधियाँ पर्यावरण प्रदूषण का मुख्य कारण हैं।
खण्ड - C
Section - C
21) भारतीय दर्शन को आध्यात्मिक कहा जाता है। क्यों? स्पष्ट कीजिये।
Indian philosophy is termed as spiritual philosophy. Explain why?
भारतीय दर्शन को आध्यात्मिक इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य आत्मा (स्व) और परमात्मा (ब्रह्म) के स्वरूप को समझना तथा मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) प्राप्त करना है। यह केवल भौतिक जगत या बाह्य वस्तुओं का अध्ययन नहीं करता, बल्कि आंतरिक चेतना, ध्यान, और आत्म-साक्षात्कार पर बल देता है। सभी भारतीय दर्शनों (जैसे वेदांत, योग, सांख्य) का लक्ष्य जीवन के अंतिम सत्य तक पहुँचना है, जो आध्यात्मिक अनुभव पर आधारित है।
अथवा / OR
ऋत के सिद्धान्त की व्याख्या कीजिये।
Explain the theory of Rta.
ऋत का सिद्धांत वैदिक दर्शन में ब्रह्मांडीय नैतिक और प्राकृतिक व्यवस्था का सिद्धांत है। यह सत्य, नियम और ऋतुचक्र का प्रतीक है। ऋत के अनुसार, ब्रह्मांड में हर घटना एक निश्चित क्रम और नियम से होती है, जो देवताओं और मनुष्यों दोनों पर लागू होता है। यह नैतिकता और धर्म का आधार है, जिसका उल्लंघन अव्यवस्था लाता है। उदाहरण के लिए, सूर्य का उदय और अस्त होना ऋत का ही परिणाम है।
22) गीता के अनुसार क्षत्रिय वर्ण के धर्म का वर्णन कीजिये।
Describe the Dharma of Kshtriya Varna according to Geeta.
गीता के अनुसार, क्षत्रिय वर्ण का धर्म (कर्तव्य) समाज की रक्षा करना, न्याय स्थापित करना, और युद्ध में शत्रुओं से लड़ना है। क्षत्रिय को निडरता, शौर्य, दृढ़ता, और नेतृत्व जैसे गुणों का पालन करना चाहिए। गीता (अध्याय 2, श्लोक 31-33) में कहा गया है कि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से पीछे हटना पाप है, क्योंकि यह उसका स्वाभाविक कर्तव्य है। उसे निष्काम भाव से अपने धर्म का पालन करना चाहिए, बिना फल की इच्छा के।
अथवा / OR
गीता के अनुसार सकाम एवं निष्काम कर्म के अन्तर को स्पष्ट कीजिये।
Distinguish Sakama and Nishkama action according to Geeta.
गीता के अनुसार, सकाम कर्म वह है जो फल की इच्छा से किया जाता है, जबकि निष्काम कर्म बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की आशा के, केवल कर्तव्य समझकर किया जाता है। सकाम कर्म बंधन का कारण बनता है और पुनर्जन्म देता है, जबकि निष्काम कर्म मोक्ष की ओर ले जाता है। गीता (अध्याय 2, श्लोक 47) में कहा गया है: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" – अर्थात, तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं। निष्काम कर्म में आसक्ति और अहंकार का त्याग होता है।
23) अष्टांगिक मार्ग के अनुसार सम्यक् - समाधि का वर्णन कीजिये।
Describe Samyak - Samadhi according to eight fold Path. (Ashtangik Marga).
अष्टांगिक मार्ग में सम्यक् समाधि (सही ध्यान) आठवां अंग है। यह ध्यान की वह अवस्था है जिसमें मन पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है और सभी विक्षेपों से मुक्त हो जाता है। बौद्ध दर्शन के अनुसार, सम्यक् समाधि चार ध्यान (झान) अवस्थाओं में विभाजित है: पहले में आनंद और विचार होता है, दूसरे में आनंद और एकाग्रता, तीसरे में समता और स्मृति, और चौथे में शुद्ध समता। इसका उद्देश्य निर्वाण प्राप्त करना है, जहाँ दुख और इच्छाओं का अंत होता है।
अथवा / OR
स्याद्वाद का सोदाहरण वर्णन कीजिये।
Describe Syadvada with example.
स्याद्वाद जैन दर्शन का सिद्धांत है जो कहता है कि सत्य सापेक्ष है और किसी भी वस्तु को अनेक दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है। इसके अनुसार, हर कथन केवल एक निश्चित दृष्टिकोण से सत्य होता है, और इसे "स्यात्" (शायद) शब्द से व्यक्त किया जाता है। उदाहरण: एक घड़ा मिट्टी से बना है, लेकिन दूसरे दृष्टिकोण से वह खोखला है। स्याद्वाद कहता है कि घड़ा "स्यात् अस्ति" (शायद है) और "स्यात् नास्ति" (शायद नहीं है) दोनों ही सत्य हैं, क्योंकि यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।
24) न्याय दर्शन के अनुसार अनुमान का सोदाहरण वर्णन कीजिये।
Describe the Inference with appropriate example according to Nyaya Philosophy.
न्याय दर्शन में अनुमान (इन्फरेंस) ज्ञान का एक प्रमुख साधन है, जो व्याप्ति (सार्वभौमिक संबंध) पर आधारित होता है। इसमें तीन अंग होते हैं: पक्ष (जिसके बारे में अनुमान लगाया जाए), हेतु (कारण), और साध्य (निष्कर्ष)। उदाहरण: पर्वत पर आग है (साध्य), क्योंकि वहाँ धुआँ है (हेतु), और जहाँ धुआँ होता है वहाँ आग होती है (व्याप्ति)। यहाँ पर्वत पक्ष है, धुआँ हेतु है, और आग साध्य है। न्याय के अनुसार, अनुमान तभी वैध है जब हेतु और साध्य के बीच अविनाभाव (अटूट संबंध) हो।
अथवा / OR
योग दर्शन के अनुसार यम एवं नियम का वर्णन कीजिये।
Describe Yama and Niyama according to Yoga philosophy.
योग दर्शन (पतंजलि योगसूत्र) के अनुसार, यम और नियम अष्टांग योग के पहले दो अंग हैं। यम (सामाजिक नियम) में पाँच अंग हैं: अहिंसा (हिंसा न करना), सत्य (सच बोलना), अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य (संयम), और अपरिग्रह (संग्रह न करना)। नियम (व्यक्तिगत नियम) में भी पाँच अंग हैं: शौच (शुद्धता), संतोष (संतुष्टि), तप (तपस्या), स्वाध्याय (आत्म-अध्ययन), और ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण)। ये दोनों मिलकर योग साधना की नींव हैं, जो मन को शुद्ध और एकाग्र बनाते हैं।
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प्रश्न 25
दर्शन के अनुसार सगुण एवं निर्गुण ब्रह्म का वर्णन कीजिये।
Describe the Saguna and Nirguna Brahman according to Vedanta.
सगुण ब्रह्म: सगुण ब्रह्म वह ब्रह्म है जिसमें गुण (सत्त्व, रजस, तमस) और रूप (साकार) होते हैं। यह ईश्वर के रूप में जाना जाता है, जो सृष्टि का कर्ता, पालक और संहारक है। सगुण ब्रह्म की उपासना मूर्ति या प्रतीकों के माध्यम से की जाती है।
निर्गुण ब्रह्म: निर्गुण ब्रह्म वह ब्रह्म है जो सभी गुणों और रूपों से परे है। यह निराकार, अव्यक्त और अद्वैत है। निर्गुण ब्रह्म की उपासना निराकार ध्यान और ज्ञान के माध्यम से की जाती है। यह ब्रह्म सच्चिदानंद स्वरूप है और सभी द्वैत से परे है।
सारांश: सगुण ब्रह्म साकार और गुणयुक्त है, जबकि निर्गुण ब्रह्म निराकार और गुणातीत है। दोनों एक ही ब्रह्म के दो पहलू हैं।
अथवा / OR
पारमार्थिक एवं प्रातिभासिक जगत् के अन्तर को स्पष्ट कीजिये।
Explain the difference between Parmarthik and Pratibhasik Jagat.
पारमार्थिक जगत्: यह वास्तविक और सत्य जगत् है, जो ब्रह्म का स्वरूप है। यह अद्वैत, नित्य और अपरिवर्तनीय है। इसे केवल ज्ञान के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है।
प्रातिभासिक जगत्: यह मिथ्या या भ्रामक जगत् है, जो अविद्या (अज्ञान) के कारण प्रतीत होता है। उदाहरण के लिए, रस्सी को साँप समझना प्रातिभासिक ज्ञान है। यह जगत् अस्थायी और परिवर्तनशील है।
अंतर: पारमार्थिक जगत् सत्य और नित्य है, जबकि प्रातिभासिक जगत् मिथ्या और अस्थायी है। पारमार्थिक जगत् का अनुभव ज्ञान से होता है, जबकि प्रातिभासिक जगत् का अनुभव अज्ञान से होता है।
प्रश्न 26
ह्यूम भौतिक द्रव्यों का खण्डन किस प्रकार करता है? समझाइये।
How does Hume refute physical substance? Explain.
ह्यूम के अनुसार, भौतिक द्रव्य (physical substance) की धारणा अनुभव पर आधारित नहीं है। वह कहते हैं कि हम केवल संवेदनाओं (impressions) और विचारों (ideas) को जानते हैं। भौतिक द्रव्य का कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता। हम केवल गुणों (जैसे रंग, आकार, स्पर्श) का अनुभव करते हैं, लेकिन इन गुणों के पीछे कोई स्थायी द्रव्य नहीं है। ह्यूम इसे "बंडल थ्योरी" (bundle theory) कहते हैं, जिसमें वस्तुएँ केवल गुणों का समूह हैं। इस प्रकार, ह्यूम भौतिक द्रव्य के अस्तित्व को खारिज करते हैं।
अथवा / OR
लाइबनिज के अनुसार चिदणु (मोनड) के स्वरूप को समझाइये।
Explain the nature of Monad according to Leibnitz.
लाइबनिज के अनुसार, मोनड (Monad) एक सरल, अविभाज्य और आध्यात्मिक इकाई है। मोनड में कोई भौतिक गुण नहीं होते; यह केवल आत्मिक या चेतन तत्व है। प्रत्येक मोनड अद्वितीय है और दूसरे मोनड से भिन्न है। मोनड में धारणा (perception) और इच्छा (appetition) होती है। यह ब्रह्मांड का दर्पण है, लेकिन एक-दूसरे से प्रभावित नहीं होता (पूर्व-स्थापित सामंजस्य)। मोनड न तो उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है; यह ईश्वर द्वारा निर्मित है।
प्रश्न 27
अरस्तु के उपादान एवं निमित्त कारण के भेद को उदाहरण सहित समझाइये।
Explain with example the difference of Material and instrumental cause according to Aristotle.
उपादान कारण (Material Cause): यह वह पदार्थ है जिससे कोई वस्तु बनती है। उदाहरण: मूर्ति बनाने के लिए कांस्य या मिट्टी उपादान कारण है।
निमित्त कारण (Efficient or Instrumental Cause): यह वह शक्ति या क्रिया है जो वस्तु को बनाती है। उदाहरण: मूर्तिकार का कौशल और हथौड़ा निमित्त कारण है।
अंतर: उपादान कारण वस्तु का भौतिक आधार है, जबकि निमित्त कारण वह साधन है जो उस भौतिक आधार को रूप देता है। दोनों मिलकर वस्तु का निर्माण करते हैं।
अथवा / OR
ह्यूम के कारणता सिद्धान्त का विवेचन कीजिये।
Discuss theory of causation according to Hume.
ह्यूम के अनुसार, कारणता (causation) का कोई आवश्यक संबंध नहीं है। वह कहते हैं कि हम केवल दो घटनाओं के बीच नियमित संयोग (constant conjunction) देखते हैं, जैसे आग और गर्मी। हम यह नहीं देख सकते कि एक घटना दूसरी को कैसे उत्पन्न करती है। कारणता की धारणा आदत (habit) और मानसिक संयोग (mental association) से उत्पन्न होती है। ह्यूम इसे "संशयवादी दृष्टिकोण" से देखते हैं और कहते हैं कि कारणता का कोई तार्किक आधार नहीं है।
प्रश्न 28
ईश्वर अस्तित्व के प्रयोजनमूलक प्रमाण का विवेचन कीजिये।
Discuss the Teleological proof of existence of God.
प्रयोजनमूलक प्रमाण (Teleological proof) के अनुसार, ब्रह्मांड में व्यवस्था, उद्देश्य और सुंदरता देखी जाती है, जो एक बुद्धिमान रचयिता (ईश्वर) की ओर संकेत करती है। उदाहरण: घड़ी की जटिल संरचना एक घड़ी बनाने वाले की आवश्यकता दर्शाती है, उसी प्रकार ब्रह्मांड की जटिलता एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की ओर इशारा करती है। यह प्रमाण प्रकृति में उद्देश्य और कार्य-कारण संबंध पर आधारित है। हालांकि, ह्यूम और कांट जैसे दार्शनिकों ने इसकी आलोचना की है, लेकिन यह अभी भी ईश्वर के अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण तर्क है।
अथवा / OR
"आद्य अचल चालक" की धारणा को स्पष्ट कीजिये।
Explain the concept of 'Prime unmoved mover.'
अरस्तू के अनुसार, "आद्य अचल चालक" (Prime Unmoved Mover) वह सत्ता है जो स्वयं अचल (गतिहीन) है, लेकिन सभी गतियों का कारण है। यह ईश्वर का रूप है, जो शुद्ध चेतना और शुद्ध क्रिया है। आद्य अचल चालक ब्रह्मांड को गति प्रदान करता है, लेकिन स्वयं किसी भी भौतिक या बाहरी प्रभाव से प्रभावित नहीं होता। यह सभी वस्तुओं का अंतिम लक्ष्य (final cause) है, जिसकी ओर सब कुछ गतिशील है। यह धारणा अरस्तू के आध्यात्मिक दर्शन का केंद्र है।
प्रश्न 29: वस्तुवाद की धारणा का विवेचन कीजिये।
Discuss the concept of Realism.
वस्तुवाद (Realism) की धारणा
वस्तुवाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जो मानता है कि वस्तुएँ और वास्तविकता हमारी चेतना या मन से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में हैं। इसके अनुसार, ज्ञान का स्रोत बाह्य जगत है, न कि केवल मानसिक विचार।
- मुख्य विशेषताएँ: वस्तुवाद भौतिक जगत की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करता है। यह अनुभव और इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान पर बल देता है।
- प्रमुख प्रतिपादक: अरस्तू, जॉन लॉक, बर्ट्रेंड रसेल आदि।
- शिक्षा में महत्व: वस्तुवाद के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को वास्तविक जगत का ज्ञान कराना है, जिसमें विज्ञान, गणित और व्यावहारिक विषयों पर जोर दिया जाता है।
वस्तुवाद के अनुसार, सत्य और वास्तविकता बाह्य जगत में विद्यमान हैं, और मनुष्य का कार्य उन्हें खोजना और समझना है।
अथवा / OR
प्रत्ययवाद की धारणा का विवेचन कीजिये।
Discuss the concept of Idealism.
प्रत्ययवाद (Idealism) की धारणा
प्रत्ययवाद एक दार्शनिक सिद्धांत है जो मानता है कि वास्तविकता मूलतः मानसिक या आध्यात्मिक है, और भौतिक जगत मन या चेतना पर निर्भर है। इसके अनुसार, विचार और आदर्श ही सत्य के मूल स्रोत हैं।
- मुख्य विशेषताएँ: प्रत्ययवाद आत्मा, मन और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता देता है। यह भौतिक जगत को माया या द्वितीयक मानता है।
- प्रमुख प्रतिपादक: प्लेटो, शंकराचार्य, हेगेल, स्वामी विवेकानंद आदि।
- शिक्षा में महत्व: प्रत्ययवाद के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार और नैतिक विकास है, जिसमें दर्शन, साहित्य और कला पर जोर दिया जाता है।
प्रत्ययवाद के अनुसार, सत्य और वास्तविकता मन या आत्मा में निहित हैं, और बाह्य जगत उनका प्रतिबिंब मात्र है।
प्रश्न 30: व्यावसायिक नैतिकता क्या है? समझाइये।
What is Business Ethics? Explain.
व्यावसायिक नैतिकता (Business Ethics)
व्यावसायिक नैतिकता उन नैतिक सिद्धांतों और मूल्यों का समूह है जो व्यवसाय और वाणिज्य के क्षेत्र में आचरण का मार्गदर्शन करते हैं। यह सुनिश्चित करती है कि व्यावसायिक गतिविधियाँ न्याय, ईमानदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ संचालित हों।
- मुख्य तत्व: ईमानदारी, पारदर्शिता, ग्राहकों के प्रति निष्ठा, श्रमिकों के अधिकारों का सम्मान, और पर्यावरण संरक्षण।
- महत्व: व्यावसायिक नैतिकता से कंपनी की प्रतिष्ठा बढ़ती है, ग्राहकों का विश्वास बढ़ता है, और दीर्घकालिक सफलता मिलती है।
- उदाहरण: उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना, विज्ञापन में सत्यता, और करों का उचित भुगतान।
व्यावसायिक नैतिकता का पालन करके व्यवसाय समाज में सकारात्मक योगदान दे सकता है और अनैतिक प्रथाओं से बच सकता है।
अथवा / OR
चिकित्सकीय नैतिकता क्या है? समझाइये।
What is Medical Ethics? Explain.
चिकित्सकीय नैतिकता (Medical Ethics)
चिकित्सकीय नैतिकता उन नैतिक सिद्धांतों और मूल्यों का समूह है जो चिकित्सा पेशे में आचरण का मार्गदर्शन करते हैं। यह डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के कर्तव्यों और रोगियों के अधिकारों को परिभाषित करती है।
- मुख्य सिद्धांत: रोगी की भलाई (beneficence), अहित न करना (non-maleficence), रोगी की स्वायत्तता (autonomy), और न्याय (justice)।
- महत्व: चिकित्सकीय नैतिकता रोगी और चिकित्सक के बीच विश्वास बनाए रखती है, गोपनीयता सुनिश्चित करती है, और चिकित्सा पद्धति को मानवीय बनाती है।
- उदाहरण: रोगी की सहमति लेना, चिकित्सा रहस्यों की रक्षा करना, और जीवन के अंत में नैतिक निर्णय लेना।
चिकित्सकीय नैतिकता का पालन करके स्वास्थ्यकर्मी रोगियों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं और चिकित्सा पेशे की गरिमा बनाए रखते हैं।
SS-85-Philosophy 435