RBSE Class 12th 2020 -SS-85-2020 Previous Year Papers
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Paper details
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| Board | RBSE |
|---|---|
| Class | Class 12th |
| Exam year | 2020 |
| Subject | -SS-85-2020 |
| Resource type | Previous Year Papers |
| Category | RBSE Previous Year Question Papers |
| Website | RBSE Solution |
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RBSE Class 12th 2020 -SS-85-2020
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Rajasthan Board Class 12th -SS-85-2020 2020 solved Previous Year Question Papers
दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY)
उच्च माध्यमिक पूरक परीक्षा, 2020
समय : ३ घण्टे १५ मिनट पूर्णांक : 80
प्रश्नों की संख्या : 30 मुद्रित पृष्ठ : 8
प्रश्न-पत्र कोड : SS-85-Philosophy (Supp.)
परीक्षार्थियों के लिए सामान्य निर्देश :
- परीक्षार्थी सर्वप्रथम अपने प्रश्न-पत्र पर नामांक अनिवार्यतः लिखें।
- सभी प्रश्न करने अनिवार्य हैं।
- प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दी गई उत्तर-पुस्तिका में ही लिखें।
- जिन प्रश्नों में आन्तरिक खण्ड हैं, उन सभी के उत्तर एक साथ ही लिखें।
GENERAL INSTRUCTIONS TO THE EXAMINEES :
- Candidate must write first his/her Roll No. on the question paper compulsorily.
- All the questions are compulsory.
- Write the answer to each question in the given answer-book only.
- For questions having more than one part, the answers to those parts are to be written together in continuity.
निर्देश (Instructions)
(5) प्रश्न-पत्र के हिन्दी व अंग्रेजी रूपांतर में किसी प्रकार की त्रुटि/अंतर/विरोधाभास होने पर हिन्दी भाषा के प्रश्न को ही सही मानें ।
If there is any error / difference / contradiction in Hindi & English versions of the question paper, the question of Hindi version should be treated valid.
(6)
| खण्ड (Section) | प्रश्न संख्या (Q. Nos.) | अंक प्रत्येक प्रश्न (Marks per question) | उत्तर की शब्द सीमा (Words limit of answer) |
|---|---|---|---|
| क (A) | 1 | 1 | 20 शब्द (20 words) |
| ख (B) | 2-20 | 2 | 50 शब्द (50 words) |
| ग (C) | 21-30 | 3 | 100-150 शब्द (100-150 words) |
(7) प्रश्न क्रमांक 2 से 30 तक में आंतरिक विकल्प हैं ।
There are internal choices for Question Nos. 2 to 30.
SS-85-Philosophy (Supp.)
खण्ड-अ / SECTION-A
निम्नलिखित में से प्रत्येक को परिभाषित कीजिए : (20 शब्दों में)
Define each of following in 20 words :
-
संचीयमान कर्म / Sanchiyman Karma
वह कर्म जो वर्तमान जीवन में किए जा रहे हैं और जिनका फल भविष्य में मिलेगा, संचीयमान कर्म कहलाता है। यह कर्मों का संचय है।
-
कारणता / Causation
कारणता का अर्थ है कार्य और कारण के बीच का नियमित संबंध। प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण होता है, यही कारणता का सिद्धांत है।
-
सुशिक्षित चार्वाक / Sushikshit Charvak
सुशिक्षित चार्वाक वह है जो चार्वाक दर्शन का ज्ञाता हो, परंतु वह केवल इंद्रिय सुखों में न लिप्त होकर सामाजिक और नैतिक मूल्यों का पालन करता है।
-
योग / Yoga
योग का अर्थ है चित्त की वृत्तियों का निरोध। यह आत्मा और परमात्मा के मिलन का साधन है, जिसमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास शामिल हैं।
-
त्रिपिटक / Tripitak
त्रिपिटक बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख ग्रंथ हैं – विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक। इनमें बुद्ध के उपदेश और नियम संग्रहीत हैं।
-
ज़रा-मरण / Jara Maran
ज़रा-मरण का अर्थ है बुढ़ापा और मृत्यु। बौद्ध दर्शन में यह दुख का एक कारण है, जो जन्म के चक्र का परिणाम है।
-
समाधि / Samadhi
समाधि योग की अंतिम अवस्था है जिसमें चित्त पूर्णतः एकाग्र हो जाता है और साधक को आत्म-साक्षात्कार होता है। यह अति चेतना की अवस्था है।
SS-85-Philosophy (Supp.)
खण्ड-ब (शब्द सीमा = 50)
SECTION - B (Word limit = 50)
-
भारतीय दर्शन को परिभाषित कीजिए।
Define Indian Philosophy.भारतीय दर्शन वह ज्ञान-विज्ञान है जो जीवन, जगत और परम सत्य के स्वरूप का तार्किक एवं आध्यात्मिक विवेचन करता है। इसका उद्देश्य दुःखों से मुक्ति (मोक्ष) प्राप्त करना है।
Indian Philosophy is the knowledge and science that logically and spiritually discusses the nature of life, the world, and the ultimate truth. Its aim is to attain liberation (Moksha) from sufferings.
-
ज्ञान-योग की अवधारणा का विवेचन कीजिए।
Discuss the doctrine of ‘Gyan Yoga’.ज्ञान-योग आत्मा और परमात्मा के एकत्व का बोध कराने वाला मार्ग है। इसमें विवेक, वैराग्य, शम-दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधि जैसे साधनों द्वारा सत्य का साक्षात्कार किया जाता है। यह 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति पर आधारित है।
Gyan Yoga is the path that leads to the realization of the oneness of the individual soul (Atma) and the Supreme Soul (Brahman). It involves the realization of truth through means like discrimination, detachment, calmness, self-control, forbearance, faith, and meditation. It is based on the experience of 'I am Brahman'.
-
“अनेकान्तवाद' से आप क्या समझते हैं ? समझाइये।
What do you mean by ‘Anekantvada’ ? Explain.अनेकान्तवाद जैन दर्शन का सिद्धांत है जो कहता है कि किसी भी वस्तु या सत्य के अनेक पहलू होते हैं। कोई एक दृष्टिकोण पूर्ण सत्य नहीं होता। यह सापेक्षता और अहिंसक दृष्टिकोण पर बल देता है। इसके अनुसार, सत्य को समझने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों (नयों) का समन्वय आवश्यक है।
Anekantvada is a principle of Jain philosophy which states that any object or truth has many aspects. No single viewpoint is the complete truth. It emphasizes relativity and a non-violent perspective. According to it, a synthesis of different viewpoints (Nayas) is necessary to understand the truth.
-
प्राणायाम एवं प्रत्याहार में क्या अन्तर है ? समझाइये।
What is the difference between Pranayam and Pratyahar ? Explain.प्राणायाम: यह श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करने की क्रिया है, जिसमें रेचक (श्वास छोड़ना), पूरक (श्वास लेना) और कुम्भक (श्वास रोकना) शामिल हैं। इसका उद्देश्य मन को स्थिर करना और प्राण शक्ति को नियंत्रित करना है।
प्रत्याहार: यह इंद्रियों को उनके विषयों से हटाकर मन को अंतर्मुखी करने की प्रक्रिया है। इसमें इंद्रियों को बाहरी वस्तुओं से विरत करके मन को आत्म-चिंतन में लगाया जाता है।
Pranayam: It is the practice of controlling the breath, involving exhalation (Rechaka), inhalation (Puraka), and retention (Kumbhaka). Its aim is to steady the mind and control the life force (Prana).
Pratyahar: It is the process of withdrawing the senses from their objects and turning the mind inward. In this, the senses are detached from external objects and the mind is engaged in self-contemplation.
-
निर्गुण एवं सगुण ब्रह्म के बीच क्या भिन्नता है ? समझाइये।
What is the difference between Nirgun Brahma and Sagun Brahma ? Explain.निर्गुण ब्रह्म: यह गुणों से रहित, निराकार, अव्यक्त, अद्वैत और अवर्णनीय परम सत्य है। इसकी उपासना निराकार ध्यान और ज्ञान के माध्यम से की जाती है।
सगुण ब्रह्म: यह गुणों (सत्त्व, रज, तम) से युक्त, साकार, ईश्वर रूप में व्यक्त होता है। इसकी उपासना मूर्ति, मंत्र और भक्ति के माध्यम से की जाती है।
Nirgun Brahma: It is the ultimate reality without any attributes, formless, unmanifest, non-dual, and indescribable. It is worshipped through formless meditation and knowledge.
Sagun Brahma: It is the ultimate reality with attributes (Sattva, Rajas, Tamas), manifested in a form as God (Ishwara). It is worshipped through idols, mantras, and devotion.
6. ज्ञानमीमांसा से आप क्या समझते हैं ? विवेचन करें |
What do you understand by Epistemology ? Discuss.
ज्ञानमीमांसा (Epistemology) दर्शन की वह शाखा है जो ज्ञान की प्रकृति, स्रोत, सीमा और वैधता का अध्ययन करती है। यह निम्नलिखित प्रश्नों पर विचार करती है:
- ज्ञान क्या है?
- ज्ञान के स्रोत क्या हैं (जैसे अनुभव, तर्क, अंतर्ज्ञान)?
- हम कैसे जान सकते हैं कि कोई बात सत्य है?
- ज्ञान की सीमाएँ क्या हैं?
ज्ञानमीमांसा के प्रमुख सिद्धांतों में अनुभववाद (Empiricism), तर्कवाद (Rationalism), और समालोचनात्मक दर्शन (Critical Philosophy) शामिल हैं। यह दर्शन की अन्य शाखाओं जैसे तत्वमीमांसा और नीतिशास्त्र के लिए आधार प्रदान करती है।
7. सर्वेश्वरवाद का सिद्धान्त किसे कहते हैं ? समझाइये |
What is the theory of Pantheism ? Explain.
सर्वेश्वरवाद (Pantheism) वह सिद्धांत है जो ईश्वर और ब्रह्मांड को एक ही तत्व मानता है। इसके अनुसार, ईश्वर ब्रह्मांड से अलग कोई सत्ता नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड ही ईश्वर का स्वरूप है।
प्रमुख बिंदु:
- ईश्वर सर्वव्यापी है और सभी वस्तुओं में समाहित है।
- ब्रह्मांड ईश्वर की अभिव्यक्ति है, न कि उसकी रचना।
- यह सिद्धांत अद्वैत वेदांत और स्पिनोज़ा के दर्शन में पाया जाता है।
8. देकार्त की संदेह-विधि की व्याख्या कीजिए |
Discuss method of doubt in context of Descartes. Explain.
देकार्त की संदेह-विधि (Method of Doubt) एक दार्शनिक पद्धति है जिसमें वह सभी चीजों पर संदेह करता है जब तक कि उनकी सत्यता सिद्ध न हो जाए। इसके चरण:
- इंद्रियों पर संदेह: इंद्रियाँ कभी-कभी हमें धोखा देती हैं, इसलिए उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
- स्वप्न तर्क: हम सपने में भी वास्तविकता का अनुभव करते हैं, इसलिए यह निश्चित नहीं कि हम जाग रहे हैं या सपना देख रहे हैं।
- दुष्ट प्रतिभा (Evil Demon): एक काल्पनिक दुष्ट प्रतिभा हमें धोखा दे सकती है, यहाँ तक कि गणितीय सत्यों में भी।
इस विधि का अंतिम परिणाम है: "कोगिटो एर्गो सुम" (Cogito ergo sum) – "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।" यह एक अटल सत्य है जिस पर संदेह नहीं किया जा सकता।
9. बौद्ध धर्म के अनात्मवाद सिद्धान्त की व्याख्या कीजिए |
Explain the Doctrine of No-self of Buddhism.
अनात्मवाद (Anātman or No-self) बौद्ध धर्म का एक मूल सिद्धांत है जो स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा (आत्मन्) के अस्तित्व को नकारता है। इसके अनुसार:
- व्यक्ति पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) का संयोग मात्र है।
- इन स्कंधों में कोई स्थायी तत्व नहीं है; वे निरंतर परिवर्तनशील हैं।
- आत्मा की धारणा दुख का कारण है; अनात्मवाद को समझना निर्वाण की ओर ले जाता है।
यह सिद्धांत हिंदू धर्म के आत्मवाद से भिन्न है और बौद्ध धर्म के क्षणिकवाद (Momentariness) से जुड़ा है।
20. अशुभ के विभिन्न प्रकारों को समझाइये |
Explain different kinds of Evil.
दर्शन में अशुभ (Evil) के तीन प्रमुख प्रकार माने जाते हैं:
- भौतिक अशुभ (Physical Evil): प्राकृतिक आपदाएँ, रोग, दुर्घटनाएँ आदि जो मनुष्य को दुख देती हैं।
- नैतिक अशुभ (Moral Evil): मनुष्य द्वारा किए गए बुरे कर्म, जैसे झूठ, हिंसा, चोरी आदि।
- आध्यात्मिक अशुभ (Metaphysical Evil): सृष्टि में अपूर्णता और सीमाएँ, जैसे मृत्यु और अज्ञान।
यह वर्गीकरण दार्शनिकों जैसे लाइबनिज और ह्यूम के विचारों पर आधारित है।
खण्ड-स (शब्द सीमा = 00-50)
SECTION — C (Word limit = 00-50)
21. भारतीय दर्शन के विभिन्न सम्प्रदायों का वर्गीकरण आप किस प्रकार करेंगे ?
How will you classify the different schools of Indian Philosophy ?
भारतीय दर्शन के सम्प्रदायों को मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है:
- आस्तिक दर्शन (Orthodox Schools): जो वेदों के अधिकार को स्वीकार करते हैं – न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदांत।
- नास्तिक दर्शन (Heterodox Schools): जो वेदों को नहीं मानते – चार्वाक, बौद्ध, जैन।
यह वर्गीकरण वैदिक प्रामाण्य के आधार पर किया जाता है।
अथवा
चार्वाक दर्शन के जड़वाद (भौतिकवाद) सिद्धान्त पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए |
Write short note on “Doctrine of Materialism” according to Charvak Philosophy.
चार्वाक दर्शन का भौतिकवाद (Materialism) यह सिद्धांत है कि केवल भौतिक जगत ही सत्य है। इसके अनुसार:
- आत्मा, ईश्वर, परलोक जैसी कोई अभौतिक सत्ता नहीं है।
- ज्ञान का एकमात्र स्रोत प्रत्यक्ष अनुभव (प्रत्यक्ष) है।
- जीवन का उद्देश्य सुख प्राप्त करना और दुख से बचना है (हेडोनिज्म)।
- मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता; यह एक नास्तिक और भौतिकवादी दर्शन है।
22. उपनिषदों के सन्दर्भ में ब्रह्म की अवधारणा' की संक्षेप में व्याख्या कीजिए |
अथवा
“भक्तियोग के सिद्धान्त' पर भगवद्गीता के विचारों की विवेचना कीजिए |
Explain briefly the “Concept of Brahma” in context of Upanishadas.
OR
Describe Bhagwatgita’s views on theory of “Bhakti Yoga”.
उत्तर (विकल्प 1): उपनिषदों में ब्रह्म को सर्वोच्च, अविनाशी, निराकार, सर्वव्यापी और सत्य-चित-आनन्द स्वरूप माना गया है। यह सृष्टि का मूल कारण है और आत्मा से अभिन्न है। ब्रह्म को 'एकमेवाद्वितीयम्' (एक और अद्वितीय) कहा गया है। यह शब्दों और इंद्रियों से परे है, केवल अनुभव से जाना जा सकता है।
उत्तर (विकल्प 2): भगवद्गीता के अनुसार भक्तियोग में ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का मार्ग है। गीता में कहा गया है कि भक्ति द्वारा ही मनुष्य परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। इसमें निष्काम भाव से भगवान की उपासना, उनके गुणों का स्मरण और उनकी इच्छा में समर्पण शामिल है। गीता के अनुसार भक्तियोग सबसे सरल और सुलभ मार्ग है।
23. बौद्ध दर्शन में प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धान्त की विवेचना कीजिए |
अथवा
जैन-दर्शन में त्रिरत्नों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए |
Discuss the ‘Theory of Pratityasamutpad’ in Buddhism.
OR
Explain Ratnatraya in Jain Philosophy in detail.
उत्तर (विकल्प 1): प्रतीत्यसमुत्पाद (आश्रित उत्पत्ति) बौद्ध दर्शन का मूल सिद्धांत है। इसके अनुसार सभी घटनाएँ कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर होकर उत्पन्न होती हैं। यह द्वादशांग (12 अंगों) में विभाजित है: अविद्या, संस्कार, विज्ञान, नाम-रूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भव, जाति, जरा-मरण। यह दुःख के कारण और निरोध को समझाता है।
उत्तर (विकल्प 2): जैन दर्शन में त्रिरत्न (तीन रत्न) मोक्ष के मार्ग हैं: (1) सम्यक् दर्शन (सत्य पर सही आस्था), (2) सम्यक् ज्ञान (सत्य का सही ज्ञान), (3) सम्यक् चारित्र (सही आचरण)। ये तीनों एक साथ मिलकर आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाते हैं। इन्हें 'रत्नत्रय' कहा जाता है।
24. स्वामी विवेकानन्द के व्यावहारिक वेदान्त की अवधारणा' को स्पष्ट करें |
अथवा
योग दर्शन के अनुसार ध्यान, धारणा एवं समाधि के प्रत्यय' की विस्तृत विवेचना कीजिए |
Explain the ‘Concept of Practical Vedant’ in context of Swami Vivekanand.
OR
Describe in detail the concept of Dhyan, Dharna and Samadhi according to Yoga Philosophy.
उत्तर (विकल्प 1): स्वामी विवेकानन्द के अनुसार व्यावहारिक वेदान्त का अर्थ है वेदान्त के सिद्धांतों को दैनिक जीवन में लागू करना। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति में दिव्यता है, और इस दिव्यता को प्रकट करना ही जीवन का लक्ष्य है। इसमें सेवा, त्याग, निस्वार्थ कर्म और सभी प्राणियों में ईश्वर का दर्शन शामिल है। यह केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन का मार्ग है।
उत्तर (विकल्प 2): योग दर्शन के अनुसार ध्यान, धारणा और समाधि योग के आंतरिक अंग (अंतरंग साधन) हैं। धारणा का अर्थ है मन को एक बिंदु पर केंद्रित करना। ध्यान उस केंद्रित मन की निरंतरता है। समाधि वह अवस्था है जहाँ ध्याता, ध्यान और ध्येय एक हो जाते हैं। ये तीनों मिलकर 'संयम' कहलाते हैं और इनके द्वारा योगी समस्त सिद्धियों और अंततः कैवल्य (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
SS-85-Philosophy (Supp.)
25.
वर्तमान जीवन में दर्शनशास्त्र के महत्त्व पर चर्चा कीजिए।
अथवा
द्वन्द्वात्मक पद्धति के चार चरण विस्तार से बताइये। (प्लेटो)
Discuss the importance of philosophy in modern life.
OR
Write in detail four steps of dialectical method. (Plato)
Solution (वर्तमान जीवन में दर्शनशास्त्र का महत्त्व):
दर्शनशास्त्र का वर्तमान जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। यह मनुष्य को आलोचनात्मक सोच, तार्किक विश्लेषण और नैतिक मूल्यों की समझ प्रदान करता है। आधुनिक जीवन की जटिल समस्याओं जैसे तकनीकी विकास, पर्यावरण संकट, और सामाजिक अन्याय के समाधान में दर्शनशास्त्र मार्गदर्शन करता है। यह व्यक्ति को जीवन के उद्देश्य, सत्य और वास्तविकता की खोज में सहायता करता है, जिससे वह एक सार्थक और संतुलित जीवन जी सके।
Solution (प्लेटो की द्वन्द्वात्मक पद्धति के चार चरण):
- प्रश्न (Question): किसी विषय पर प्रश्न उठाना और उसकी परिभाषा मांगना।
- उत्तर (Answer): प्रश्न का उत्तर देना, जो प्रायः अपूर्ण या विरोधाभासी होता है।
- खंडन (Refutation): उत्तर में निहित दोषों और विरोधाभासों को उजागर करना।
- निष्कर्ष (Conclusion): खंडन के बाद अधिक सत्य और स्पष्ट ज्ञान तक पहुँचना।
यह विधि संवाद के माध्यम से सत्य की खोज करती है और प्लेटो के अनुसार, यही सच्चा ज्ञान प्राप्त करने का मार्ग है।
26.
इहलौकिकवाद (धर्मनिरपेक्षवाद) किसे कहते हैं? हार्वे कॉक्स द्वारा दी गई इसकी मुख्य विशेषताएँ बताइये।
अथवा
रिलिजन (पंथ) के अर्थ एवं स्वरूप की विवेचना कीजिए।
What do you understand by Secularism? Explain its main features given by Harvey Cocks.
OR
Discuss the meaning and nature of religion.
Solution (इहलौकिकवाद/धर्मनिरपेक्षवाद):
इहलौकिकवाद या धर्मनिरपेक्षवाद एक ऐसा सिद्धांत है जिसमें राज्य और धर्म को अलग-अलग रखा जाता है। इसका अर्थ है कि राज्य किसी विशेष धर्म को संरक्षण नहीं देता और सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण रखता है। हार्वे कॉक्स के अनुसार इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं:
- धर्मनिरपेक्षीकरण (Secularization): सामाजिक और राजनीतिक जीवन से धार्मिक प्रभाव का कम होना।
- बहुलवाद (Pluralism): विभिन्न धर्मों और विश्वासों का सह-अस्तित्व।
- तर्कसंगतता (Rationality): निर्णय लेने में तर्क और विज्ञान को प्राथमिकता।
- स्वतंत्रता (Freedom): व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म मानने या न मानने की स्वतंत्रता।
Solution (रिलिजन/पंथ का अर्थ एवं स्वरूप):
रिलिजन या पंथ का अर्थ है ईश्वर, आत्मा और परलोक में विश्वास पर आधारित एक व्यवस्था। इसका स्वरूप निम्नलिखित है:
- विश्वास (Faith): किसी अलौकिक शक्ति में आस्था।
- अनुष्ठान (Rituals): पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाएँ।
- नैतिकता (Morality): अच्छे-बुरे के मानदंड।
- समुदाय (Community): समान विश्वास रखने वालों का समूह।
- ग्रंथ (Scriptures): धार्मिक नियमों और कथाओं का संग्रह।
यह मनुष्य को जीवन का उद्देश्य और नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करता है।
27.
संवर, निर्जरा एवं मोक्ष सम्बन्धी जैन सिद्धान्तों की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
अथवा
बौद्ध धर्म के हीनयान एवं महायान सम्प्रदायों के बीच मूल भेदों की व्याख्या कीजिए।
Explain the Jain principles of Sanvara, Nirjara and Moksha in detail.
OR
Explain main points of difference between Hinyana and Mahayana schools of Buddhism.
Solution (जैन सिद्धान्त: संवर, निर्जरा और मोक्ष):
जैन दर्शन में कर्म सिद्धांत महत्वपूर्ण है। संवर, निर्जरा और मोक्ष इसी से संबंधित हैं:
- संवर (Sanvara): इसका अर्थ है नए कर्मों के आगमन को रोकना। यह आत्म-संयम, सत्य, अहिंसा और ध्यान के माध्यम से प्राप्त होता है। संवर का उद्देश्य आत्मा को कर्मों के प्रवाह से बचाना है।
- निर्जरा (Nirjara): इसका अर्थ है पहले से संचित कर्मों को नष्ट करना। यह तपस्या, उपवास, प्रायश्चित और कठोर साधना के द्वारा होता है। निर्जरा से आत्मा शुद्ध होती है।
- मोक्ष (Moksha): यह आत्मा का पूर्ण मुक्ति का अवस्था है। जब सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं और आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है, तब मोक्ष प्राप्त होता है। मोक्ष में जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है।
ये तीनों सिद्धांत आत्मा की शुद्धि और मुक्ति के मार्ग के चरण हैं।
Solution (हीनयान और महायान में मूल भेद):
| बिंदु | हीनयान | महायान |
|---|---|---|
| लक्ष्य | अर्हत बनना (व्यक्तिगत मुक्ति) | बोधिसत्व बनना (सभी की मुक्ति) |
| बुद्ध का स्वरूप | ऐतिहासिक व्यक्ति | अलौकिक और अनेक बुद्ध |
| ग्रंथ | पालि त्रिपिटक | संस्कृत सूत्र (जैसे सद्धर्मपुण्डरीक) |
| पूजा पद्धति | सरल, मूर्तिपूजा नहीं | मूर्तिपूजा और अनुष्ठान प्रचलित |
| प्रचार | दक्षिण एशिया (श्रीलंका, थाईलैंड) | पूर्वी एशिया (चीन, जापान, तिब्बत) |
हीनयान रूढ़िवादी है जबकि महायान उदार और लोकप्रिय है।
प्रश्न 28
ईसाई धर्म के सम्प्रदायों की विस्तृत विवेचना कीजिए।
ईसाई धर्म के प्रमुख सम्प्रदाय:
- रोमन कैथोलिक सम्प्रदाय: यह सबसे बड़ा सम्प्रदाय है, जो पोप को अपना सर्वोच्च धर्मगुरु मानता है। इसमें सात संस्कारों (बपतिस्मा, यूखरिस्ट, पुष्टिकरण, पश्चाताप, बीमारों का अभिषेक, पवित्र आदेश और विवाह) पर विश्वास किया जाता है। मैरी और संतों की पूजा भी इसकी विशेषता है।
- पूर्वी रूढ़िवादी सम्प्रदाय: यह सम्प्रदाय पोप की सर्वोच्चता को नहीं मानता। इसमें पवित्र आत्मा केवल पिता से निकलता है (फिलिओक विवाद)। यहाँ आइकनों (प्रतिमाओं) की पूजा महत्वपूर्ण है और यूखरिस्ट में खमीरयुक्त रोटी का उपयोग होता है।
- प्रोटेस्टेंट सम्प्रदाय: 16वीं शताब्दी में मार्टिन लूथर द्वारा शुरू किया गया सुधार आंदोलन। यह केवल बाइबिल को अधिकार मानता है (सोला स्क्रिप्टुरा) और केवल विश्वास द्वारा मुक्ति (सोला फाइड) पर जोर देता है। इसमें केवल दो संस्कार (बपतिस्मा और प्रभु भोज) स्वीकार्य हैं। इसके अंतर्गत लूथरन, एंग्लिकन, केल्विनिस्ट, बैपटिस्ट आदि उपसम्प्रदाय आते हैं।
ये तीनों सम्प्रदाय ईसा मसीह को उद्धारकर्ता मानने में एक हैं, लेकिन धर्मशास्त्र, संस्कारों और चर्च प्रशासन में भिन्नताएँ रखते हैं।
अथवा
यहूदी धर्म के नैतिक विचारों पर चर्चा कीजिए।
यहूदी धर्म के नैतिक विचार:
- दस आज्ञाएँ: यह यहूदी नैतिकता का आधार है, जिसमें एक ईश्वर की उपासना, माता-पिता का सम्मान, हत्या, चोरी, झूठ और व्यभिचार से बचने का आदेश दिया गया है।
- तज़ेदाका (न्याय और दान): यहूदी धर्म में दान को न्याय का कार्य माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपनी आय का एक भाग गरीबों को दे।
- तिक्कुन ओलम (दुनिया का सुधार): यह सिद्धांत मनुष्य को सामाजिक न्याय, शांति और पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है।
- कश्रुत (आहार नियम): कोषेर भोजन नियम शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धता पर बल देते हैं।
- शब्बत: सप्ताह का सातवाँ दिन विश्राम और आध्यात्मिक चिंतन के लिए समर्पित है, जो कार्य और विश्राम में संतुलन सिखाता है।
यहूदी नैतिकता का मूल सिद्धांत है "अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो", जो सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों पर आधारित है।
प्रश्न 29
पारसी धर्म के 'नीति विषयक विचारों' की व्याख्या कीजिए।
पारसी धर्म के नीति विषयक विचार:
- हुमता, हुख्ता, हुवरश्ता (अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म): यह पारसी नैतिकता का त्रिसूत्रीय आधार है। मनुष्य को सदैव अच्छा सोचना, अच्छा बोलना और अच्छा करना चाहिए।
- अशा (सत्य और ऋत): ब्रह्मांडीय व्यवस्था और सत्य का सिद्धांत। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह सत्य के मार्ग पर चले और असत्य (द्रुज) से दूर रहे।
- स्वतंत्र इच्छा और नैतिक जिम्मेदारी: पारसी धर्म में मनुष्य को अच्छाई (स्पेंटा मैन्यु) और बुराई (अंग्रा मैन्यु) के बीच चुनाव करने की स्वतंत्रता दी गई है। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के लिए स्वयं जिम्मेदार है।
- पर्यावरण संरक्षण: अग्नि, जल, पृथ्वी और वायु को पवित्र माना जाता है। इन तत्वों को प्रदूषित करना पाप माना जाता है।
- सामाजिक नैतिकता: दान, परोपकार, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को महत्व दिया जाता है। पारसी समुदाय में सामूहिक कल्याण पर विशेष बल है।
पारसी नीति का अंतिम लक्ष्य "फ्रशोकरेति" (दुनिया का नवीनीकरण और बुराई पर अच्छाई की अंतिम विजय) है।
अथवा
गुरु नानक देव के प्रमुख उपदेशों को समझाइये।
गुरु नानक देव के प्रमुख उपदेश:
- एक ईश्वर (इक ओंकार): ईश्वर एक, निराकार, सर्वव्यापी और सत्य है। उसकी उपासना किसी मूर्ति या स्थान विशेष से बंधी नहीं है।
- नाम जपो (ईश्वर का स्मरण): ईश्वर के नाम का जाप करना और उसकी महिमा का गुणगान करना मुक्ति का मार्ग है।
- किरत करो (ईमानदारी से काम करो): मनुष्य को अपने परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए ईमानदारी से जीविका कमानी चाहिए।
- वंड छको (बाँटकर खाओ): अपनी कमाई का एक भाग जरूरतमंदों और समाज के साथ बाँटना चाहिए। यह सेवा और समानता का सिद्धांत है।
- सभी मनुष्य समान हैं: जाति, धर्म, लिंग या ऊँच-नीच का भेदभाव मिथ्या है। सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं।
- सत्संग और संगत: अच्छे लोगों की संगति में रहना और सच्चे गुरु के उपदेशों का पालन करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।
गुरु नानक ने कर्मकांड, मूर्तिपूजा और अंधविश्वास का विरोध किया और सादगी, प्रेम और भाईचारे पर बल दिया।
प्रश्न 30
सनातन धर्म के अनुसार निर्वाण प्राप्ति के लिए बौद्ध दर्शन में प्रस्तावित 'आष्टांगिक मार्ग' की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
आष्टांगिक मार्ग (अष्टांगिक मार्ग) की संक्षिप्त व्याख्या:
बौद्ध दर्शन में निर्वाण प्राप्ति के लिए बुद्ध द्वारा प्रतिपादित आष्टांगिक मार्ग को 'मध्यम मार्ग' भी कहा जाता है। यह आठ अंगों में विभाजित है:
- सम्यक दृष्टि (सही दृष्टिकोण): चार आर्य सत्यों (दुःख, दुःख का कारण, दुःख निरोध, और मार्ग) को समझना और स्वीकार करना।
- सम्यक संकल्प (सही विचार): अहिंसा, त्याग और करुणा से युक्त विचार रखना। कामना, द्वेष और हिंसा से मुक्त होना।
- सम्यक वाक्य (सही वाणी): झूठ, चुगली, कठोर वचन और व्यर्थ की बातें न बोलना। सत्य, मधुर और लाभदायक वाणी बोलना।
- सम्यक कर्म (सही आचरण): हत्या, चोरी, व्यभिचार और नशीले पदार्थों से दूर रहना। शील और सदाचार का पालन करना।
- सम्यक आजीविका (सही जीविका): ऐसे व्यवसाय से दूर रहना जो हिंसा, धोखाधड़ी या अनैतिकता पर आधारित हो। ईमानदारी से जीविका कमाना।
- सम्यक व्यायाम (सही प्रयास): अकुशल मनोवृत्तियों को रोकना और कुशल मनोवृत्तियों को उत्पन्न करने का निरंतर प्रयास करना।
- सम्यक स्मृति (सही स्मृति/सजगता): शरीर, वेदना, चित्त और धर्मों के प्रति सजग रहना। वर्तमान क्षण में जागरूक रहना।
- सम्यक समाधि (सही एकाग्रता): ध्यान के माध्यम से चित्त को एकाग्र करना और चार ध्यान (झान) अवस्थाओं को प्राप्त करना।
यह मार्ग नैतिकता (शील), ध्यान (समाधि) और प्रज्ञा (ज्ञान) के तीन प्रशिक्षणों में विभाजित है। इस मार्ग का अनुसरण करके व्यक्ति दुःख से मुक्त होकर निर्वाण प्राप्त कर सकता है।
अथवा
'सर्व धर्म समभाव' सिद्धान्त को समझाइये।
'सर्व धर्म समभाव' सिद्धान्त की व्याख्या:
सर्व धर्म समभाव का अर्थ है सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखना। यह सिद्धांत किसी एक धर्म को श्रेष्ठ नहीं मानता, बल्कि सभी धर्मों को सत्य तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग स्वीकार करता है। इसके प्रमुख बिंदु हैं:
- सभी धर्मों का सम्मान: प्रत्येक धर्म की अपनी विशिष्टता और मूल्य हैं। किसी भी धर्म को हीन या तुच्छ नहीं समझना चाहिए।
- धार्मिक सहिष्णुता: दूसरे धर्मों के प्रति सहनशीलता और उनकी मान्यताओं का आदर करना।
- एक ही लक्ष्य: सभी धर्मों का अंतिम लक्ष्य एक ही है - ईश्वर प्राप्ति, मोक्ष या सत्य की खोज। भिन्नता केवल मार्गों और विधियों में है।
- संवाद और समझ: विभिन्न धर्मों के बीच संवाद को बढ़ावा देना और आपसी समझ विकसित करना।
- राष्ट्रीय एकता: यह सिद्धांत भारत जैसे बहुधार्मिक समाज में सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है।
यह सिद्धांत महात